Shamsher ALI Siddiquee: Health

Shamsher ALI Siddiquee

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विश्व थैलेसिमिया दिवस - अस्थि मज़्ज़ा ट्रांसप्लांटेशन ही ईलाज़!

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"हँसने-खेलने और मस्ती करने की उम्र में बच्चों को लगातार अस्पतालों के, ब्लड बैंक के चक्कर काटने पड़ें तो सोचिए उनका और उनके परिजनों का क्या हाल होगा! सूखता चेहरा, लगातार बीमार रहना, वजन ना ब़ढ़ना और इसी तरह के कई लक्षण बच्चों में थेलेसीमिया रोग होने पर दिखाई देते हैं। माता-पिता से अनुवांशिकता के तौर पर मिलने वाली इस बीमारी की विडंबना है कि इसके कारणों का पता लगाकर इससे बचा नहीं जा सकता।"

क्या है थेलेसीमिया:- यह एक ऐसा रोग है जो बच्चों में जन्म से ही मौजूद रहता है। तीन माह की उम्र के बाद ही इसकी पहचान होती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इसमें बच्चे के शरीर में खून की भारी कमी होने लगती है, जिसके कारण उसे बार-बार बाहरी खून की जरूरत होती है। खून की कमी से हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है एवं बार-बार खून चढ़ाने के कारण मरीज के शरीर में अतिरिक्त लौह तत्व जमा होने लगता है, जो हृदय में पहुँचकर प्राणघातक साबित होता है।

आनुवांशिक बीमारी :- प्रत्येक वर्ष 8 मई को मनाया जाता है। थैलेसिमिया रोग के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। यह बीमारी आनुवांशिक है, रिश्तेदारी के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। बीमारी का जन्म शिशु के साथ होता है, जो उम्रभर साथ नहीं छोड़ती। इसका सिर्फ एक समाधान है, रिश्तों में सावधानी। यह बीमारी कुछ विशेष समुदायों में है। उन समुदायों के रिवाज ही इस बीमारी को रोक सकते हैं। थैलेसिमिया एक आनुवांशिक बीमारी है, जो माता-पिता से संतान को होती है। इस रोग के होने पर शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है जिसके कारण रक्तक्षीणता के लक्षण प्रकट होते हैं। इसकी पहचान तीन माह की आयु के बाद ही होती है। इसमें रोगी बच्चे के शरीर में रक्त की भारी कमी होने लगती है जिसके कारण उसे बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। इस बीमारी से ग्रस्त शरीर में लाल रक्त कण बनने बंद हो जाते हैं। इससे शरीर में रक्त की कमी आ जाती है। बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। रंग पीला पड़ जाता है। इस रोग से बच्चों में जिगर, तिल्ली और हृदय की साइज बढ़ने, शरीर में चमड़ी का रंग काला पड़ने जैसी विकट स्थितियां पैदा होती हैं। इस रोग को लेकर महिला के प्रसव से पूर्व ध्यान रखने की जरूरत है। एक शोध के मुताबिक भारत में प्रति वर्ष लगभग 8 से 10 थैलेसिमिया रोगी जन्म लेते हैं। वर्तमान में भारत में लगभग 2,25,000 बच्चे थैलेसिमिया रोग से ग्रस्त हैं। बच्चे में 6 माह, 18 माह के भीतर थैलेसिमिया का लक्षण प्रकट होने लगता है। बच्चा पीला पड़ जाता है, पूरी नींद नहीं लेता, खाना-पीना अच्छा नहीं लगता है, बच्चे को उल्टियां, दस्त और बुखार से पीड़ित हो जाता है। आनुवांशिक मार्गदर्शन और थैलेसिमिया माइनर का दवाइयों से उपचार संभव है। थैलेसिमिया रोग से बचने के लिए माता-पिता का डीएनए परीक्षण कराना अनिवार्य होता है। साथ ही रिश्तेदारों का भी डीएनए परीक्षण करवाकर रोग पर प्रभावी नियंत्रण संभव है। विवाह से पूर्व जन्मपत्री मिलाने के साथ-साथ दूल्हे और दुल्हन का एचबीए- 2 का टेस्ट कराना चाहिए। सावधानियाँ रोगी को बार-बार खून चढ़ाने से शरीर में लौह तत्त्व की मात्रा बढ़ जाती है। इसलिए रोगी को हरी पत्तेदार सब्जी, गुड़, मांस, अनार, तरबूज, चीकू कम देना चाहिए। बोन मेरो ट्रांसप्लांट(Bone Marrow Transplantation) से इसका इलाज संभव है। इलाज की यह पद्धति काफी महंगी है। अब वैज्ञानिक नई तकनीक पर प्रयोग कर रहे हैं, जिसका नाम स्टेम सैल थैरेपी है।
दो प्रकार:- थैलासीमिया दो प्रकार का होता है। यदि पैदा होने वाले बच्चे के माता-पिता दोनों के जींस में माइनर थेलेसीमिया होता है, तो बच्चे में मेजर थेलेसीमिया हो सकता है, जो काफी घातक हो सकता है। किन्तु पालकों में से एक ही में माइनर थेलेसीमिया होने पर किसी बच्चे को खतरा नहीं होता। यदि माता-पिता दोनों को माइनर रोग है तब भी बच्चे को यह रोग होने के 25 प्रतिशत संभावना है। अतः यह अत्यावश्यक है कि विवाह से पहले महिला-पुरुष दोनों अपनी जाँच करा लें।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत देश में हर वर्ष सात से दस हजार थैलीसीमिया पीडि़त बच्चों का जन्म होता है। केवल दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ही यह संख्या करीब 1500 है। भारत की कुल जनसंख्या का 3.4 प्रतिशत भाग थैलेसीमिया ग्रस्त है। इंग्लैंड में केवल 360 बच्चे इस रोग के शिकार हैं, जबकि पाकिस्तान में 1 लाख और भारत में करीब 10 लाख बच्चे इस रोग से ग्रसित हैं। थेलेसीमिया से पी‍डि़त अधिकांश गरीब बच्चे 8-10 वर्ष से ज्यादा नहीं जी पाते है। बिहार में पी‍डि़त की संख्या 700 है। बीमारी के कारण अब तक 300 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। वर्ष 2016 में पटना शहर में 76 थेलेसीमिया पी‍डि़त बच्चों ने जन्म लिया है। 2018 में 30 से ज्यादा पी‍डि़त बच्चों की मौत हुई है। अन्य राज्यों की अपेक्षा थेलेसीमिया पी‍डि़त बच्चों के प्रति बिहार सरकार उदासीन है, इसकी रोकथाम हेतु सरकारी योजनाओं की जरूरत है।
इस रोग का फिलहाल कोई ईलाज नहीं है। हीमोग्लोबीन दो तरह के प्रोटीन से बनता है अल्फा ग्लोबिन और बीटा ग्लोबिन। थैलीसीमिया इन प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी होने से होता है। जिसके कारण लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से नष्ट होती है। रक्त की भारी कमी होने के कारण रोगी के शरीर में बार-बार रक्त चढ़ाना पड़ता है। रक्त की कमी से हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है एवं बार-बार रक्त चढ़ाने के कारण रोगी के शरीर में अतिरिक्त लौह तत्व जमा होने लगता है, जोहृदय, यकृत और फेफड़ों में पहुँचकर प्राणघातक होता है। मुख्यतः यह रोग दो वर्गों में बांटा गया है:

1.मेजर थैलेसेमिया:-यह बीमारी उन बच्चों में होने की संभावना अधिक होती है, जिनके माता-पिता दोनों के जींस में थैलीसीमिया होता है। जिसे थैलीसीमिया मेजर कहा जाता है।
2.माइनर थैलेसेमिया:-थैलीसीमिया माइनर उन बच्चों को होता है, जिन्हें प्रभावित जीन माता-पिता दोनों में से किसी एक से प्राप्त होता है। जहां तक बीमारी की जांच की बात है तो सूक्ष्मदर्शी यंत्र पर रक्त जांच के समय लाल रक्त कणों की संख्या में कमी और उनके आकार में बदलाव की जांच से इस बीमारी को पकड़ा जा सकता है।
पूर्ण रक्तकण गणना (कंपलीट ब्लड काउंट) यानि सीबीसी से रक्ताल्पता या एनीमिया का पता लगाया जाता है। एक अन्य परीक्षण जिसे हीमोग्लोबिन इलैक्ट्रोफोरेसिस कहा जाता है से असामान्य हीमोग्लोबिन का पता लगता है। इसके अलावा म्यूटेशन एनालिसिस टेस्ट (एमएटी) के द्वारा एल्फा थैलीसिमिया की जांच के बारे में जाना जा सकता है। मेरूरज्जा ट्रांसप्लांट से भी इस बीमारी के उपचार में मदद मिलती है।

लक्षण:-सूखता चेहरा, लगातार बीमार रहना, वजन ना ब़ढ़ना और इसी तरह के कई लक्षण बच्चों में थेलेसीमिया रोग होने पर दिखाई देते हैं। बार-बार बीमारी होना, सर्दी, जुकाम बने रहना, कमजोरी और उदासी रहना, आयु के अनुसार शारीरिक विकास न होना, शरीर में पीलापन बना रहना व दाँत बाहर की ओर निकल आना, साँस लेने में तकलीफ होना और कई तरह के संक्रमण होना होता है।

बचाव एवं सावधानी:- अस्थि मज़्ज़ा ट्रांसप्लांटेशन (एक किस्म का ऑपरेशन) इसमें काफी हद तक फायदेमंद होता है, लेकिन इसका खर्च काफी ज्यादा होता है। मप्र और छत्तीसग़ढ़ में थेलेसीमिया, सिकल सेल, सिकलथेल, हिमोफेलिया आदि से पी‍डि़त बच्चों की संख्या 30 हजार से ज्यादा है।
थेलेसीमिया पी‍डि़त के इलाज में काफी बाहरी रक्त चढ़ाने और दवाइयों की आवश्यकता होती है। इस कारण सभी इसका इलाज नहीं करवा पाते, जिससे 12 से 15 वर्ष की आयु में बच्चों की मृत्य हो जाती है। विवाह से पहले महिला-पुरुष की रक्त की जाँच कराएँ,गर्भावस्था के दौरान इसकी जाँच कराएँ, मरीज की हीमोग्लोबिन 11 या 12 बनाए रखने की कोशिश करें और समय पर दवाइयाँ लें और इलाज पूरा लें। सही इलाज करने पर 25 वर्ष व इससे अधिक जीने की आशा होती है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, रक्त की जरूरत भी बढ़ती जाती है। विवाह से पहले महिला-पुरुष की रक्त की जाँच कराएँ। गर्भावस्था के दौरान इसकी जाँच कराएँ,रोगी की हीमोग्लोबिन 11 या 12 बनाए रखने की कोशिश करें और समय पर दवाइयाँ लें और इलाज पूरा लें। विवाह पूर्व जांच को प्रेरित करने हेतु एक स्वास्थ्य कुण्डली का निर्माण किया गया है, जिसे विवाह पूर्व वर-वधु को अपनी जन्म कुण्डली के साथ साथ मिलवाना चाहिये। स्वास्थ्य कुंडली में कुछ जांच की जाती है, जिससे शादी के बंधन में बंधने वाले जोड़े यह जान सकें कि उनका स्वास्थ्य एक दूसरे के अनुकूल है या नहीं। स्वास्थ्य कुंडली के तहत सबसे पहली जांच थैलीसीमिया की होगी। एचआईवी, हेपाटाइटिस बी और सी। इसके अलावा उनके रक्त की तुलना भी की जाएगी और रक्त में RH फैक्टर की भी जांच की जाएगी। इस प्रकार के रोगियों के लिए कितनी ही संस्थायें रक्त प्रबंध कराती हैं। इसके अलावा बहुत से रक्तदान आतुर सज्जन तत्पर रहते हैं।

शोध और विकास :-थैलेसीमिया पर विश्व भर में शोध अनुसंधान अन्वरत जारी हैं। इन प्रयासों से ही थैलीसीमिया पीड़ितों के लिए एक दवाई अविष्कृत हुई थी। इस दवाई से बच्चों को अब इंजेक्शन के दर्द को नहीं झेलना पड़ेगा। जल्दी ही भारतीय बाजार में ये दवा आने वाली है, जिसे खाने से ही शरीर में लौह मात्रा नियंत्रित हो जाएगी। असुरां नाम की यह दवा पश्चिमी देशों में एक्स जेड नाम से पहले से ही प्रयोग हो रही है। इससे इलाज का खर्च भी कम हो जाएगा, किंतु इसके दुष्प्रभावों (साइड एफ़ेक्ट्स) में इससे किडनी प्रभावित होने का एक परसेंट खतरा बना रहता है। दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के थैलीसीमिया इकाई के अध्यक्ष डॉ॰ वीरेंद खन्ना के अनुसार भारत में अतिरिक्त लौह निकालने के लिए दो तरीके प्रचलन में हैं। पहले तरीके में डेसोरॉल (इंजेक्शन) के जरिए आठ से दस घण्टे तक लौह निकाला जाता है। यह प्रक्रिया बहुत महंगी और कष्टदायक होती है। इसमें प्रयोग होने वाले एक इंजेक्शन की कीमत 164 रुपए होती है। इस प्रक्रिया में हर साल पचास हजार से डेढ़ लाख रुपए तक खर्च आता है। दूसरी प्रक्रिया में कैलफर नामक दवा (कैप्सूल) दी जाती है। यह दवा सस्ती तो है लेकिन इसका इस्तेमाल करने वाले 30 प्रतिशत रोगियों को जोड़ों में दर्द की समस्या हो जाती है। साथ ही इनमें से एक प्रतिशत बच्चे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। ऐसे में नई दवा असुरां काफ़ी लाभदायक होगी। यह दवा फलों के रस के साथ मिलाकर पिलाई जाती है और इसकी कीमत 100 रुपये प्रति डोज है। 
मेरु रज्जू ट्रांस्प्लांट :-थैलेसीमिया के लिये स्टेम सेल से उपचार की भी संभावनाएं हैं। इसके अलावा इस रोग के रोगियों के मेरु रज्जु (बोन मैरो) ट्रांस्प्लांट हेतु अब भारत में भी बोनमैरो डोनर रजिस्ट्री खुल गई है। मैरो डोनर रजिस्ट्री इंडिया (एम.डी.आर.आई) में बोनमैरो दान करने वालों के बारे में सभी आवश्यक जानकारियां होगी जिससे देश के ही नहीं वरन विदेश से इलाज के लिए भारत आने वाले रोगियों का भी आसानी से उपचार हो सकेगा। यह केंद्र मुंबई में स्थापित किया जाएगा। ऐसे केंद्र वर्तमान में केवल अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशो में ही थे। ल्यूकेमिया और थैलीसीमिया के रोगी अब बोनमैरो या स्टेम सेल प्राप्त करने के लिए इस केंद्र से संपर्क कर मेरुरज्जु दान करने वालों के बारे में जानकारी के अलावा उनके रक्त तथा लार के नमूनों की जांच रिपोर्ट की जानकारी भी ले पाएंगे। जल्दी ही इसकी शाखाएं महानगरों में भी खुलने की योजना है।
थैलेसीमिया चिल्ड्रन सोसायटी, जयपुर के तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय थैलेसीमिया दिवस 8 मई को दो स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। अध्यक्ष नरेश भाटिया ने बताया कि पहला कार्यक्रम सुबह 9 बजे जेके लोन अस्पताल के सभाग्रह में थैलेसीमिया रोग संबंधित समस्याओं और निदान पर जेके लोन एसएमएस अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा व्याख्यान दिया जाएगा। दूसरे कार्यक्रम के तहत दोपहर 3 बजे संतोकबा दुर्लभजी के हेमलता दुर्लभजी सभाग्रह में थैलेसीमिया बच्चों की निशुल्क शारीरिक जांच, शरीर में लोहे की मात्रा की जांच आदि के लिए रक्त के सैम्पल लिए जाएंगे। सायं 6 बजे से थैलेसीमिया बच्चों अन्य कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

रक्तदान सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी

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रक्त मानव शरीर का एक प्रकार का तरल पदार्थ है, जो शरीर के कोशिकाओ / cells को आवश्यक पोषक तत्व और प्राणवायु / oxygen पहुचाने का काम करता है और कोशिकाओ से खराब पदार्थ को शरीर से बाहर निकलने का कार्य करता है। रक्त की कमी के कारण देश भर में हर साल लाखो लोगो की मृत्यु हो जाती है।
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आंकड़ो के अनुसार देश में हर साल 4 करोड़ यूनिट खून की आवश्यकता होती है, पर मुश्किल से 40 से 50 लाख यूनिट रक्त ही Blood Donation द्वारा एकत्रित हो पाता है। हर 2 सेकंड में किसी न किसी को रक्त की जरुरत होती है और ऐसे में हर दिन 38000 रक्तदाताओ / Blood Donor की जरुरत है, लेकिन Blood Donation को लेकर समाज में फैली भ्रांतियों और जागरूकता के अभाव में लोग Blood donate करने के लिए आगे नहीं आते है।
Blood Donation के प्रति जागरूकता फ़ैलाने के लिए और समाज में Blood Donation को लेकर जो भ्रान्तिया है उसे दूर करने के लिए, रक्तदान / Blood Donation के बारे में विस्तृत जानकारी निचे दी गयी है :

The Gift of BLOOD is Gift of LIFE...!!
Blood Donation की जरुरत क्यों है ?Blood Donation in Hindi
रक्त जीवन रक्षक है ! अब तक किसी ऐसी मशीन का शोध नहीं लगा है जो की कृत्रिम रक्त तैयार कर सके। किसी रक्तदाता / Blood donor द्वारा Blood Donation करने पर ही रक्त की कमी या जरुरत को पूरा किया जा सकता है।
हर साल करोडो लोगो को रक्त की जरुरत होती है पर कुछ लाखो नसीबवालो को ही रक्त मिल पाता है।
Sickle Cell  के मरीज को कई बार Blood Donation की जरुरत पड़ती है।
अकेले एक Car Accident में ही 100 यूनिट रक्त की जरुरत पड सकती है।
एक बार  Blood Donation कर आप 3 लोगो की जिंदगी बचा सकते है।
अगर आप 18 साल की उम्र से 60 साल की उम्र तक हर 90 दिन बाद Blood Donation करते है, तो लग भग 30 gallon Blood Donate कर चुके होंगे जो की 500 लोगो की जान बचा सकता है।
भारत में सिर्फ 7% लोगो का  Blood group 'O Negative' है। 'O Negative' Blood Group को Universal Donor भी कहते है। किसी भी  Blood group के लोगो को 'O Negative' Blood Group का रक्त दिया जा सकता है। Emergency के समय या नवजात बालक जिनका Blood Group पता न हो, ऐसे समय 'O Negative' रक्त बहुत उपयोग में आता है।
भारत में सिर्फ 0.4 % लोगो का Blood group 'AB' होता है। इस Blood group के Plasma का उपयोग किसी भी Blood group के लोगो को emergency में लगा सकते है।
कई प्रकार के operation, emergency या बीमारी में  Blood Transfusion की जरुरत पड़ती है। अगर पर्याप्त मात्रा में समय पर रक्त न मिले तो रोगी व्यक्ति को काफी तकलीफ हो सकती है और उनकी मृत्यू भी हो सकती है।
Blood Donation कैसे किया जाता है ?

एक औसत व्यक्ति के शरीर में 10 यूनिट  (5 से 6 लीटर) रक्त मौजूद होता है। Blood Donation के समय सिर्फ 1 यूनिट रक्त ही लिया जाता है।  Blood donation की प्रक्रिया काफी सरल है और इसमें डरने की ज़रा भी जरुरत नहीं है। Blood donation किस तरह किया जाता है इसकी जानकारी निचे दी गयी है :
सबसे पहले आपका Registration होता है। आपका नाम, उम्र, पता इत्यादि जानकारी ली जाती है।
आपकी Medical history ली जाती है।
आपका Mini-physical परिक्षण किया जाता है जिसमे आपका Blood pressure, Pulse, Weight, Temperature के बाद Blood group और Hemoglobin level की जाँच की जाती है।
Blood donation करने योग्य पाए जाने पर आपको Blood donation कक्ष में टेबल पर लिटाया जाता है। आप के हाथ में एक निर्जन्तुक सुई (sterile needle) द्वारा 1 यूनिट खून 10 से 15 मिनिट में लिया जाता है।
Blood donation करने के बाद, एक बार फिर से आपका  Blood pressure और Pulse परिक्षण किया जाता है।
आपके रूचि अनुसार Blood donation के बाद आपको चाय-बिस्कुट या कोल्ड ड्रिंक दिया जाता है।
Blood Donation के बाद १/२ घंटे तक वाहन न चलाए।
आपको आपका Blood group card और Blood Donation Certificate भी दिया जाता है।     
Blood Donation कौन कर सकता है ?

अगर आप निचे दिए गए श्रेणी में आते है तो आप Blood Donation कर सकते है।
आपकी उम्र 18 से 60 साल के बिच है।
आपका वजन (Weight) 45 Kg या उससे ज्यादा है।
आपकी Pulse Rate 50 से 100 / min के बिच होनी चाहिए।
शरीर का तापमान / temperature 99.5°F से कम होना चाहिए।
Diastolic Blood Pressure 100 mm/Hg से कम होना चाहिए। 
Systolic Blood Pressure 160 mm/Hg से कम होना चाहिए। 
रक्त में Hemoglobin (Hb) की मात्रा 12.5 gm/dl से ज्यादा होना चाहिए।
पुरुष 90 दिन और महिलाए 120 दिन बाद दोबारा Blood Donation कर सकते है।
आप स्वस्थ है और आपको मलेरिया, टाइफाइड, हेपेटाइटिस इत्यादि संक्रामक बीमारी नहीं है या काफी समय से नहीं हुई है। 
" वे युवा बधाई के पात्र है जिन्होंने अपने रक्त से जीवनदान दिया है एवं जो दे सकते है ! "

Blood Donation कौन नहीं कर सकता है ?
अगर आप निचे दिए गए श्रेणी में आते है तो आप Blood Donation नहीं कर सकते है।
पिछले Blood Donation के समय काफी चक्कर या थकावट महसूस की हो।
अगर आपको बार-बार Blood Donate किया हो।
मासिक रक्तस्त्राव के समय Blood Donation से परहेज करे .
आप को कोई drug addiction या व्यसन हो।
24 घंटे के भीतर शराब का सेवन किये हुए व्यक्ति।
कई लोगो (High risk individual) के साथ शारीरिक सम्बन्ध होना या वेश्यागमन किया है ।
आप HIV Positive है या आप में AIDS के निचे दिए गए लक्षण मौजूद है। जैसे की :
बेवजह वजन कम होना / Unexplained weight loss
रात के समय काफी पसीना आना।
शरीर या मुंह में नीले, जामुनी या लम्बे समय से सफ़ेद दाग या धब्बे होना।
गर्दन / बगल या शरीर के किसी हिस्से में लम्बे समय से गांठ (swollen lymph node) होना।   
बार-बार बीमार होना या 99.5°F से ज्यादा का बुखार आना।
1 महीने से ज्यादा समय तक दवा लेने के बाद भी दस्त / loose motions की तकलीफ ठीक न होना।
HIV antigen / antibody test Positive आना।
आप कुछ बीमारी या विशेष अवस्था में कुछ समय तक रक्तदान / Blood donation नहीं कर सकते। इस क़ि जानकारी निचे तालिका में दी गयी है :

                   Disease
Postpone Blood Donation Period
Jaundice
1 year
Malaria
3 months
Dog Bite / Rabies vaccination
1 year
Abortion
3 months
Pregnancy - Till duration of pregnancy
1 year
Breast feeding
1 year after delivery
History of blood transfusion
6 months
Major Surgery
6 months
Minor surgery
3 months
Immunization - Typhoid,Diptheria,Tetanus
15 days
Immunoglobulin injections
12 months
Tatoo / Ear piercing
6 months
Dental extraction
72 hours
Drugs - Antibiotic / steroid / aspirin
72 hours
Respiratory tract infection
After recovery and 1 week after last dose of antibiotic
Tuberculosis (TB)
After 2 years of completion or course
Chicken Pox
After 1 year
कुछ प्रकार की दवाइया लेने के बाद भी आप Blood Donation नहीं कर सकते है। इसकी जानकारी निचे तालिका में दी गयी है :

                   Drugs
Postpone Blood Donation Period
Etreinate - used to treat Psoriasis
Not allowed to donate for lifetime
Finasteride – used to treat BPH
1 month after last dose
Isotretionoin – used to treat acne
1 month after last dose
Aspirin
72 hours after last dose
Contraceptive pills
Can donate anytime
Thyroxine
Can donate anytime
Human growth hormone
Not allowed to donate for lifetime
Taking regular parenteral drugs like Insulin
Not allowed to donate for lifetime
निचे दी गई बीमारी से ग्रसित लोग Blood donation नहीं कर सकते है।
कर्क रोग / Cancer
ह्रदय रोग / Heart Disease
मधुमेह के मरीज जो लगातार Insulin के injection  ले रहे है
संक्रामक पीलिया / Infectious Hepatitis
किडनी की बीमारी / Chronic Nephritis
कुष्ठ रोगी / Leprosy
मिरगी / Epilepsy
Liver की बीमारी
AIDS रोगी
" स्वेच्छा से रक्तदान कीजिए क्योंकि आपके द्वारा किया गया रक्तदान,
किसी को जीवनदान दे सकता है ! "

Blood Donation करने के फायदे :
Research से यह पता चला है की, Blood Donation करने से Heart Attack और Cancer होने की आशंका कम हो जाती है। शरीर में cholesterol की मात्रा घटती है।
Blood Donation करना Weight loss करने वालो के लिए भी फायदेमंद है। एक बार Blood Donation करने पर लगभग 650 calories खर्च हो जाती है।
Blood Donation करने से जरुरत से ज्यादा की Iron level की मात्रा कम हो जाती है। बहुत ज्यादा Iron level होना भी रक्तवाहिनियो के लिए नुक्सानदेह होता है।
Blood Donation करने वालो में ह्रदय रोग की आशंका 33% कम हो जाती है।
मानव शरीर Blood Donation के रूप में किए गए रक्त की मात्रा की पूर्ति 24 घंटे में और कोशिकीय भाग की पूर्ति 1 से 2 माह के अन्दर पूरा कर लेता है। इससे शरीर की कार्यक्षमता और रोग प्रतिकार शक्ति बढती है।
Blood Donation करने से अस्थि मज्जा / Bone marrow सक्रीय बना रहता है, जो रक्त निर्माण में साहायक होता है। Blood Donation करने से शरीर में रक्त बनने की प्रक्रिया में तेजी आती है।
नियमित रक्तदाता में रक्त बनने की क्षमता उम्र के बढ़ने पर भी लगभग सामान्य बनी रहती है।
Blood Donation के वक्त आप का मुफ्त में physical जाँच और laboratory जाँच भी होती है।
Blood Donation कर के आप किसी को पुनर्जीवन प्रदान करते है। आप सिर्फ एक जिंदगी नहीं बल्कि उनसे जुडी कई अन्य जिंदगियो की भी मदद करते है। Blood Donation कर हम कई जिंदगीया बचाने का पुण्य कार्य करने का मौक़ा मिलता है।
Blood Donation से शरीर पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता है और न ही किसी प्रकार की हानि होती है।
Blood Donation / रक्तदान महादान है !! यह दान करने पर मिलनेवाली ख़ुशी और संतोष को शब्दों में बया नहीं किया जा सकता है।
मेरी आप सभी से प्रार्थना है की, आज ही Blood Donation / रक्तदान करने का संकल्प ले और किसी जरूरतमंद की सहायता करने की हर संभव कोशिश करे। आप जरुरत पड़ने पर  Blood Donation करने के लिए निचे दिए गए विकल्प चुन सकते है।
अपने शहर के Blood Bank में अपना नाम, पता, Blood group और Mobile number दर्ज करे ताकि किसी व्यक्ति को खून की जरुरत के समय आपसे संपर्क हो सके।
आपके Family Doctor के पास अपना नाम, पता, Blood group और Mobile number दर्ज करे ताकि किसी व्यक्ति को खून की जरुरत के समय आपसे संपर्क हो सके।
आप अपने अपने मित्रो या रिश्तेदारों के साथ मिलकर अपने society में या Whatsapp, Facebook और Google Plus पर Blood Donor group बना सकते है। 
हमारा ग्रुप नाम है: DBDTgopalganj
आप कुछ हमारे online website: http://www.dbdt.in पर अपना नाम register करा सकते है।
या आप हमारे एंड्राइड ऍप के द्वारा भी register कर सकते हैं पता है: https://play.google.com/store/apps/details?id=dbdtgopalganj.ali
Donate Blood ! Save a Life !!

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प्रेग्‍नेंसी: इन संकेतों से समझ‍िए क‍ि शुरू हो गया है ‘लेबर पेन’

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महिलाओं के लिए प्रेग्नेंसी का सबसे कठिन दौर तब होता है जब उन्हें लेबर पेन यानी कि प्रसव पीड़ा शुरू होती है। हर महिला के लिए लेबर पेन अलग-अलग तरह का होता है। बहुत सी ऐसी महिलाएं होती हैं जिनमें यह दर्द बहुत कम समय के लिए होता है जबकि बहुत सी महिलाएं ऐसी होती हैं जिनमें यह दर्द लंबे समय तक होता है। लेकिन हर महिला को लेबर पेन से होकर गुजरना ही पड़ता है। अक्सर ऐसा होता है कि महिलाएं अपने लेबर पेन को पहचान नहीं पाती। कभी कभी ऐसा भी होता है जब वह फाल्स लेबर पेन को वास्तविक लेबर पेन समझ लेती हैं। इसलिए उन्हें उन लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है जो लेबर पेन के बारे में सही जानकारी देते हैं। आज हम आपको ऐसे ही लक्षणों के बारे में बताने जा रहे हैं।
1. पानी निकलना – प्रसव पीड़ा का यह सबसे सटीक लक्षण है। इस दौरान वह द्रव्य जिनमें शिशु लिपटे होते हैं, वह बाहर निकलने लगता है। इन द्रवों को एमनियोटिक द्रव कहते हैं जिनका बाहर निकलना इस बात का सूचक है कि अब आपका बच्चा बाहर आने ही वाला है।
2. श्लेम का निकलना – खून जैसे रंग वाले या फिर भूरे रंग का श्लेम यानी कि म्यूकस का निकलना भी लेबर पेन का लक्षण है। गर्भाशय की ग्रीवा पर लगे श्लेम का डाट बाहर आ जाना भी प्रसव के नजदीक होने की सूचना देता है।
3. पीठ में दर्द होना – प्रेग्नेंसी के दौरान पीठ दर्द की समस्या हो सकती है। लेकिन अगर यह पीठ दर्द लंबे समय तक हो या फिर ज्यादा दर्द हो तो समझ लीजिए कि यह लेबर पेन का लक्षण है।
4. बच्चे का नीचे खिसकना – जब बच्चे का सिर आपके श्रोणि से नीचे की ओर खिसकना शुरू हो जाए तब समझ जाइए कि आपको लेबर पेन शुरू होने वाला है। इसके अलावा अगर लगातार दबाव के साथ-साथ दर्द महसूस हो रहा हो और बार बार पेशाब के लिए जाना पड़ रहा हो तो यह भी लेबर पेन का संकेत होता है।
डॉक्टर से कब मिलें – अगर आपको लगातार दर्द हो रहा हो और दर्द कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा हो तो आपको तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके अलावा अगर शिशु की हलचल कम लग रही हो या फिर योनि से पानी या ब्लड निकल रहा हो ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क 
करना चाहिए।

डॉक्टर या दाई को कब बुलाएं:

अगर आप निश्चित तौर पर प्रसव-पीड़ा के बारे में नहीं जानती, तो डॉक्टर या दाई को बुलाएं. वह उन महिलाओं के बुलावे के आदी होते हैं, जो प्रसव में हैं लेकिन इसके बारे में जानती नहीं हैं, साथ ही वे यह भी जानते हैं कि किनको सलाह देनी चाहिए.

अपने डॉक्टर या दाई को बुलाएं यदिः-
• आपके गर्भ के तरल पदार्थ की थैली टूट गई हो

• आपकी योनि से खून बह रहा है

• आपको बुखार, तीखा सरदर्द हो, देखने में पहले के मुकाबले बदलाव आया हो या पेट में दर्द हो

क्या हरेक दर्द प्रसव-पीड़ा नहीं भी हो सकता है.

हां आपको झूठी प्रसव-पीड़ा भी हो सकती है अगर आपका सर्विक्स नहीं खुलता (आपका डॉक्टर या दाई आपकी जांच कर इसे बेहतर बता सकते हैं) और आपका खिंचाव लगातार और तीखा नहीं है और आपके पेट या पीठ का कोई भी दर्द एक गरम स्नान या मसाज से ही ठीक हो जाता है.

क्या पहले से प्रसव-पीड़ा को समझा जा सकता है.

शायद. हालांकि आप इसके बारे में बाखबर नहीं होंगे, लेकिन आपका शरीर बच्चों को जन्म देने के एक महीने पहले ही तैयार होने लगता है. कुछ महिलाओं में—
• सर्विक्स पहले ही खुलने लगता है

• बच्चे का सिर जन्म की स्थिति में आने लगता है

• योनि से होने वाला रिसाव बढ़ने लगता है

• ब्रेक्सटन हिक्स कांट्रैक्शंस (जिसे अभ्यासी खिंचाव के नाम से भी जाना जाता है जिसमें गर्भ की पेशियां गर्भावस्था के बीच से ही 30 से60 सेकंड के लिए खिंचने लगती हैं) नियमित और तीव्र हो जाती हैं.

इंसानी पाद के बारे में सबसे महत्वपूर्ण जानकारियां

    


पाद होती क्या है?
हवा होती है. वो, जो आप खाते-खाते निकल जाते हैं या दूसरी वजहों से फेफड़ों की जगह पेट में चली जाती है. इसके अलावा आपका खाया खाना जब पचते हुए आंत में पहुंचता है, तो उस पर बैक्टीरिया काम करने लगते हैं. ये बैक्टीरिया हानिकारक नहीं होते, हमारे दोस्त होते हैं, उस स्टार्च और शक्कर को पचाते हैं जिसे हमारा शरीर आसानी से नहीं पचा पाता. इस दौरान भी गैस निकलती है. आमतौर पर इस प्रक्रीया में दो से छह कप तक गैस पैदा होती है. अब गैस शरीर के अंदर जाएगी (और पैदा होगी) तो वो बाहर भी निकलेगी. ये गैस आपके ‘गुदा द्वार’ (अंग्रेज़ी में एनस बेहतर शब्द जानते हों तो बताएं) से बाहर निकलती है. यही पाद है.
पादना बुरी आदत है क्या?
ऐसा लोग कहिते हैं. बचपन से आपको सिखा दिया गया है कि बुरा है तो आपने मान लिया कि बुरा होता है. और ऐसा पीढ़ी दर पीढ़ी हुआ है. (इसलिए आज तक किसी महापुरुष की जीवनी में उनके किए तमाम गैरज़रूरी कामों के ज़िक्र के बावजूद उनके पादने का ज़िक्र नहीं मिलता) इसलिए आपने मान लिया है कि पादना बुरा है. लेकिन सच इससे बिलकुल उलट है. पादना अच्छी सेहत की निशानी है. ये बताता है कि आप पर्याप्त मात्रा में फाइबर खा रहे हैं और आपके शरीर में पाचक बैक्टीरिया की अच्छी संख्या मौजूद है.
पादने पर बदबू क्यों आती है?
कुछ खाने-पीने की चीज़ें ऐसी होती हैं जिनमें सल्फर होता है. जब शरीर इस सल्फर को तोड़ती है (पचाना तोड़ना ही होता है), तो हाइड्रोजन सल्फाइड निकलती है. इसका फॉर्म्यूला होता है H2S. इसकी गंध होती है सड़े हुए अंडे जैसी (या उस से कुछ बुरी, आप जानते ही हैं.) तो अगर आपके खाने में सल्फर है, तो आपकी पाद से बदबू आएगी. जान लीजिए कि टूथपेस्ट में नमक हो न हो, खाने में सल्फर ज़रूर होना चाहिए.
कई सेहतमंद चीज़ों के पचने पर हाइड्रोजन सल्फाइड पैदा होती है- जैसे रेड मीट, पत्तागोभी, डेरी उत्पाद, बीन्स और हरी गोभी. इसलिए पाद में थोड़ी गंध हो, तो ये बुरा या अनचाहा कतई नहीं है. एक बात और है, H2S ज्वलनशील होती है. बाकी हम आपकी इमैजिनेशन पर छोड़ रहे हैं.
और ये बदबू सूंघना सेहत के लिए अच्छा होता है
पाद में हाइड्रोजन सल्फाइड की वजह से बदबू होती है. हाइड्रोजन सल्फाइड ज़्यादा मात्रा में हानिकारक हो सकती है. लेकिन 2014 में मेडिसिनल केमिस्ट्री कम्यूनिकेशन्स नाम के एक जर्नल में छपी यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सटर की रिसर्च में ये दावा किया गया कि बहुत छोटी मात्रा में (मिसाल के लिए जितनी पादने में निकलती है) हाइड्रोजन सल्फाइड माइटोकॉन्ड्रिया को होने वाले नुकसान से बचा सकती है. माइटोकॉन्ड्रिया हमारे शरीर में मौजूद सेल का पावरहाउस होता है.
इस आधार पर रीसर्च में संभावना जताई गई कि हाइड्रोजन सल्फाइड के माइटोकॉन्ड्रिया पर असर के बारे में और जानकारी इकट्ठा होने पर लकवे, अर्थराइटिस और दिल की बीमारी का बेहतर इलाज हो पाएगा. इस खोज का ज़िक्र टाइम मैगज़ीन के जुलाई 2014 अंक में भी था.
लेकिन ज़्यादा गंध भी ठीक नहीं
पाद वो गैस है जो आपके शरीर में कुछ देर रह कर निकली है. इसलिए वो आपकी सेहत का इंडिकेटर भी होती है. अगर आपकी पाद बेहद बदबूदार है तो आपकी सेहत खराब है, या डाइट पटरी से उतरी हुई है. यहां बात हाज़मा खराब होने से आगे जा सकती है. बेहद बदबूदार पाद लैक्टोस एलर्जी (लैक्टोस डेरी उत्पादों में पाया जाने वाला कंपाउंड) की निशानी हो सकती है. गंभीर मामलों में बात कोलॉन कैंसर तक जा सकती है.
बिना गंध वाली पाद
कभी-कभी शरीर सिर्फ वो हवा बाहर निकाल रहा होता है, जो खाते-खाते शरीर में चली गई. तो इसमें हाइड्रोजन सल्फाइड नहीं होती. तो इस तरह की पाद में गंध नहीं होती. ये डकार की तरह ही होती है, बस शरीर की दूसरी तरफ से निकल रही होती है.
कितनी बार पादना सेहतमंद है?
एक इंसान रोज़ औसतन 20 बार तक पादता है. वेजिटेरियन लोगों के शरीर में नॉन वेज खाने वालों से ज़्यादा गैस बनती है. ऐसा वेजिटेरियन डाइट में मौजूद कार्बोहाइड्रेट की वजह से होता है. कई सारी सब्ज़ियों में सल्फर भी होता है.
यदि आप बहुत ही कम पादते हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी डाइट में फाइबर की कमी है. इसी तरह पाद की अति भी खराब सेहत की निशानी होती है.
आवाज़ और बेआवाज़ पाद
पादते वक्त गैस की मात्रा और शरीर के पॉश्चर के आधार पर तय होता है पादने में आवाज़ होगी कि नहीं. तो दोनों तरह की पादें नॉर्मल हैं. पादने में ये अकेली चीज़ है, जिसका आपकी सेहत से ताल्लुक नहीं है. बस इतना है कि आवाज़ के डर से जो लोग पाद को कंट्रोल करते हैं, उन्हें ज़्यादा देर तक ऐसा नहीं करना चाहिए.
लड़कियां भी पादती हैं?
पादना एक बेहद सामान्य क्रिया है. लेकिन साफ सफाई के कुलीन कॉन्सेप्ट के तहत इसे ‘शर्म’ से जोड़ दिया गया है. इसलिए लड़के तो एकबारगी मान भी लें, लड़कियों से यही अपेक्षित होता है कि वो ‘लाज-शर्म रखें’, पादने जैसी ‘छिछली’ बातें करने से झिझकें. या फिर ये कह दें कि नहीं, हमारे शरीर में तो गैस बनती ही नहीं.
विज्ञान कहता है लड़कों की तरह लड़कियां भी पादती हैं और उनके जितना ही पादती हैं. लेकिन उनकी कंडीशनिंग इस तरह की कर दी गई है कि वो लड़कों जितना खुल कर इस बारे में कुछ कहती नहीं.
हम ये नहीं कह रहे कि माथे पर लिख लिया जाए कि मैं पादता/पादती हूं. लेकिन इसे लेकर डिनायल मोड से बाहर आ जाने से मानव जाति का भला ही होगा.
तो अब आप जान गए हैं कि पाद हल्की ज़रूर होती है लेकिन उसे हल्के में लेने की ज़रूरत कतई नहीं है.

सफेद दाग़: भ्रम और सच्चाई

    


सफेद दाग, यानी विटिलाइगो (vitiligo) को लेकर तरह-तरह के भ्रम हैं। लोग इसे लाइलाज बीमारी मानते हैं, जबकि डॉक्टरों के मुताबिक यह एक कॉस्मेटिक प्रॉब्लम है और इसका इलाज बहुत हद तक मुमकिन है।


क्या है सफेद दाग
- यह एक ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) शरीर को ही नुकसान पहुंचाने लगती है। इसमें स्किन का रंग बनाने वाले सेल्स मेलानोसाइट (Melanocyte) खत्म होने लगते हैं या काम करना बंद कर देते हैं, जिससे शरीर पर जगह-जगह सफेद-से धब्बे बन जाते हैं। यह समस्या मोटे तौर पर लिप-टिप यानी होठों और हाथों पर, एक्रोफेशियर यानी हाथ-पैर और चेहरे पर, फोकल यानी शरीर में एक-दो जगह पर, सेग्मेंटल यानी शरीर के एक पूरे हिस्से पर और जनरलाइज्ड यानी शरीर के कई हिस्सों पर दाग के रूप में सामने आती है।
ये हैं वजहें
- फैमिली हिस्ट्री, यानी अगर पैरंट्स सफेद दाग से पीड़ित रहे हैं तो बच्चों में इसके होने की आशंका रहती है। हालांकि ऐसे मामले 2 से 4 फीसदी ही होते हैं।
- एलोपेशिया एरियाटा (Alopecia Areata) यानी वह बीमारी, जिसमें छोटे-छोटे गोले के रूप में शरीर से बाल गायब होने लगते हैं।
- सफेद दाग मस्से या बर्थ मार्क (Halo Nevus) से। मस्सा या बर्थ मार्क बच्चे के बड़े होने के साथ-साथ आसपास की स्किन का रंग बदलना शुरू कर देता है।
- केमिकल ल्यूकोडर्मा (Chemical Leucoderma) यानी खराब क्वॉलिटी की चिपकाने वाली बिंदी या खराब प्लास्टिक की चप्पल इस्तेमाल करने से।
- ज्यादा केमिकल एक्सपोजर यानी प्लास्टिक, रबर या केमिकल फैक्ट्री में काम करने वाले लोगों को खतरा ज्यादा। कीमोथेरपी से भी इसकी आशंका रहती है।
- थाइरॉयड संबंधी बीमारी होने पर।
कैसे पहचानें इसे
अगर स्किन का रंग हल्का होने लगे और उस हिस्से के बाल भी सफेद होना शुरू हो जाएं तो समझिए कि सफेद दाग है। हालांकि इन दागों पर कोई खुजली या दर्द नहीं होता और संवेदनशीलता भी बनी रहती है, लेकिन पसीने और ज्यादा गर्मी की स्थिति में जलन पैदा हो सकती है। अगर सफेद दाग पर बाल काले रहें तो इलाज की गुंजाइश ज्यादा होती है। अगर दाग के ऊपर लगा स्क्रेच या घड़ी पहननेवाली जगह आदि भी सफेद होने लगे तो समझिए कि समस्या बढ़ रही है। अगर इसे बिल्कुल शुरुआती दौर में पकड़ना चाहते हैं तो हल्का-सा भी दाग होने पर डॉक्टर के पास जाएं। लोग अक्सर इसे कैल्शियम या आयरन की कमी से पैदा हुई समस्या मानकर इग्नोर कर देते हैं, लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए। एक्सपर्ट वुड लैंप (Wood Lamp) टेस्ट के जरिए देखते हैं कि समस्या सफेद दाग की है या नहीं। इसके लिए अंधेरे कमरे में दाग पर खास तरह की लाइट डालकर चेक करते हैं। इस टेस्ट के लिए कंसल्टेंसी फीस के अलावा अलग से कोई रकम नहीं ली जाती।
किस डॉक्टर के पास जाएं
विटिलाइगो एक्सपर्ट के पास जाना चाहिए। ये भी डर्मटॉलजिस्ट या स्किन स्पेशलिस्ट ही होते हैं, लेकिन इनका सफेद दाग के इलाज करने का अनुभव दूसरे डर्मटॉलजिस्ट की तुलना में ज्यादा होता है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि हर विटिलाइगो एक्सपर्ट स्किन स्पेशलिस्ट होता है, लेकिन हर स्किन स्पेशलिस्ट विटिलाइगो एक्सपर्ट नहीं होता।
क्या है इलाज
सफेद दाग के इलाज के लिए दो तरह की दवाएं दी जाती हैं: सफेद दाग को रोकने वाली और स्किन कलर वापस लाने वाली। इनमें भी खानेवाली और लगानेवाली, दो अलग-अलग तरह की दवाएं दी जाती हैं।
फैलने से रोकने वाली दवाएं
सफेद दाग न फैले, इसके लिए खाने वाली दवाएं दी जाती हैं, जिनमें खास हैं मिनी स्टेरॉयड पल्स (Mini Steroid Pulse), लिवामिसोल (Levamisole) और अजाथियोप्राइन (Azathioprine) आदि। मिनी स्टेरॉयड पल्स से वजन बढ़ने और दूसरे साइड इफेक्टस हो सकते हैं इसलिए बेहतर है कि ना लें।
रंग वापस लाने वाली दवाएं
स्किन का रंग वापस लाने के लिए खाने और लगाने वाली, दोनों तरह की दवाएं दी जाती हैं। इनमें खास हैं: टैक्रोलाइमस (Tacrolimus), एपिफर्मल फाइब्रोब्लास्ट ग्रोथ फैक्टर (Epiphermal Fibroblast Growth Factor), कैल्सिन्युरिन इन्हिबिटर ऑइंटमेंट (Calcineurin Inhibitor Ointment), वीक कॉर्टिको स्टेरॉयड क्रीम (Weak Cortico Steroid Cream), ऑर्गन प्लेसेंटल एक्सट्रैक्ट क्रीम (Organ Placental Extract Cream) आदि।
थेरपी
- इसके लिए फोटो थेरपी ट्रीटमेंट भी दिया जाता है। इसके तहत सूरज की किरणों (UVA) और नैरोबैंड (UVB) का इस्तेमाल स्किन का रंग फिर से नॉर्मल करने के लिए किया जाता है। इस थेरपी का साइड इफेक्ट यह है कि इसे करते हुए सावधानी न बरती जाए तो स्किन काली पड़ सकती है।
- एक्जाइमर लेजर भी असरदार है। हफ्ते में 2 सेशन की जरूरत होती है। 15-20 सेशन में फायदा नजर आने लगता है। हर सेशन का 1000 से 1500 रुपये खर्च आता है।
सर्जरी
स्किन का कलर नॉर्मल करने के लिए कई तरह की सर्जरी भी की जाती हैं। ये एक ही दिन के प्रसीजर होते हैं और इनके कोई साइड इफेक्ट्स भी नहीं हैं, लेकिन बीमारी के फैलने से रोकने के बाद ही इन्हें कराना सही रहता है। सर्जरी उन जगहों पर भी काम करती है, जहां चमड़ी के नीचे मांस के बिना हड्डियां होती हैं और दवाइयों का असर कम होता है (मसलन उंगलियों पर)। इनमें खास प्रसीजर हैं:
स्किन ग्राफ्टिंग: यह पुरानी तकनीक है। इसमें एक जगह की स्किन निकालकर दाग वाली जगह पर लगा दिया जाता है। इसमें एक-दो घंटे लगते हैं और 10वें दिन टांके काट दिए जाते हैं। 75-100 स्क्वेयर सेंटीमीटर के दाग के लिए करीब 25 हजार रुपये का खर्च आता है।
सक्शन ब्लिस्टर एपिडर्मल ग्राफ्टिंग: इसमें स्किन को वैक्यूम के जरिए दो भाग में अलग करके जहां सफेद दाग है, वहां ऊपरी भाग को रखा जाता है। ऊपरी भाग के जो रंग बनाने वाले कण हैं, वे सफेद दाग की जगह वाले स्किन के अंदर जाकर सामान्य रंग ले आते हैं। इसमें कोई टांका नहीं लगता और कलर का मैच भी अच्छा होता है। 2-3 महीने में सही कलर आ जाता है। 75-100 स्क्वेयर सेंटीमीटर के लिए करीब 40 हजार रुपये का खर्च आता है।
मेलानोसाइट एपिडर्मल सेल सस्पेंशन: इसमें बिना किसी चीरा-टांके के सफेद दाग को हटाया जाता है। शरीर से सामान्य स्किन के एक छोटे-से टुकड़े को लेकर उसके रंग बनाने वाले कणों को अलग करके उसे लिक्विड में तब्दील किया जाता है। इसके बाद जहां सफेद दाग है वहां इस लिक्विड को इंजेक्ट कर दिया जाता है। इससे सामान्य रंग वापस लौट आता है। 75-100 स्क्वेयर सेंटीमीटर के लिए करीब 60 हजार रुपये खर्च होते हैं। इनके अलावा मिलानोसाइट कल्चर और प्लैटलेट रिच प्लाज्मा पर भी ट्रायल चल रहा है। लेकिन अभी ये प्रसीजर शुरू नहीं हुए हैं।
होम्योपैथी
होम्योपैथी में भी सफेद दाग का अच्छा इलाज होने का दावा किया जाता है, लेकिन इलाज में अमूमन 2 से 3 साल तक का समय लगता है। शुरुआती 6 महीने में जितना असर नजर आता है, उसके अनुसार इलाज के वक्त का अंदाजा लगाया जाता है। होम्योपैथी में इम्यून सिस्टम को मॉडरेट करने के लिए दवाएं दी जाती हैं। बीमारी की वजह जानकर उसके मुताबिक दवाएं दी जाती हैं। प्रमुख दवाएं हैं:
सल्फर-30 (Sulphur-30), आर्सेनिक अल्बम-30 (Arsenic album-30), सिफलिनम-200 (Syphllinum-200), आर्सेनिक सल्फ फ्लेवम-6(Arsenic sulph Flevum-6), फॉस्फोरस-30 (Phosphorus 30), मर्क सोल (Merc Sol) आदि। अगर बीमारी की वजह से तनाव और डिप्रेशन है तो इग्नेशिया-30 (Ignatia-30), नेट्रम म्यूर-30 (Natrum mur-30), पल्सेटिला-30 (Pulsatilla-30), नक्स वॉमिका-30, सिफलिनम-200 (Syphllinum-200) आदि दवा दी जाती है। कोई भी दवा डॉक्टर बीमारी की वजह जानकर उसके मुताबिक ही दवा देते हैं।
नोट: विशेषज्ञों का कहना है कि कई लोग दूसरी दवाओं के साथ होम्योपैथी की दवाएं लेते हैं। यह सही नहीं है। एक वक्त में एक ही तरह का इलाज करना चाहिए।
कितना खर्च
मोटे तौर पर 1000-1500 रुपये हर महीना खर्च आता है। बीमारी के ठीक होने में कितना वक्त लगेगा, यह प्रभावित हिस्से और उसकी गहनता पर निर्भर करता है। जितना जल्दी इलाज के लिए एक्सपर्ट के पास जाएंगे, उतना बेहतर रहेगा।
आयुर्वेद
आयुर्वेद के अनुसार, पित्त या इसके साथ बाकी वातों की गड़बड़ी से सफेद दाग की समस्या होती है। जो लोग बहुत ज्यादा तला-भुना, मसालेदार, बेवक्त खाने के अलावा विरुद्ध आहार (मसलन दूध के साथ नमक या मछली आदि) लेता है, उसमें यह समस्या होने की आशंका ज्यादा होती है। आयुर्वेद में पंचकर्म के जरिए शरीर को डिटॉक्सिफाई किया जाता है। इसके अलावा बाकुची बीज, खदिर (कत्था), दारुहरिद्रा, करंज, आरग्यवध (अमलतास) आदि सिंगल हर्ब्स के जरिए भी खून को साफ किया जाता है। इसके अलावा कंपाउंड मेडिसिन भी दी जाती हैं जैसे कि गंधक रसायन, रस माणिक्य, मंजिष्ठादी क्वाथ, खदिरादी वटी आदि हैं। त्रिफला भी काफी असरदार है।
- ल्यूकोस्किन (lukoskin) भी अच्छी दवा है। यह ओरल लिक्विड और ऑइंटमेंट, दोनों रूप में मौजूद है। ओरल लिक्विड से नए सफेद दाग नहीं बनने और शरीर की इम्यूनिटी बढ़ने का दावा किया जाता है, जबकि ऑइंटमेंट से मौजूदा सफेद दाग ठीक होने का। इसके नतीजे तीन महीने में दिखने लगते हैं, जबकि पूरी तरह ठीक होने में दो साल तक का वक्त लग सकता है। एक महीने का खर्च करीब 700 रुपये आता है।
- आयुर्वेद इसके इलाज और बचाव के लिए खानपान पर बहुत जोर देता है। आयुर्वेदिक एक्सपर्ट के मुताबिक, पीड़ित को तांबे के बर्तन में पानी को 8 घंटे रखने के बाद पीना चाहिए। हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर, लौकी, सोयाबीन, दालें ज्यादा खाना चाहिए। पेट में कीड़ा न हो, लीवर दुरुस्त रहे, इसकी जांच कराएं और डॉक्टर की सलाह के मुताबिक दवा लें। एक कटोरी भीगे काले चने और 3 से 4 बादाम हर रोज खाएं। ताजा गिलोय या एलोविरा जूस पीएं। इससे इम्यूनिटी बढ़ती है।
क्या न करें
खट्टी चीजें जैसे नीबू, संतरा, आम, अंगूर, टमाटर, आंवला, अचार, दही, लस्सी, मिर्च, मैदा, गोभी, उड़द दाल आदि कम खाएं। गर्मी बढ़ाने वाली चीजें न खाएं। नॉनवेज और फास्ट फूड कम खाएं। सॉफ्ट डिंक्स के सेवन से बचें।
- नमक, मूली और मांस-मछली के साथ दूध न पीएं।
- लंबे समय तक तेज गर्मी के एक्सपोजर से बचें।
मिथ मंथन
मिथः कैंसर की वजह बन सकता है यह।
सचः नहीं, यह कैंसर की वजह नहीं बनता और इसमें जान को भी कोई खतरा नहीं है।
मिथः यह एक तरह का कोढ़ है।
सचः इसका कोढ़ (लेप्रसी) से भी कोई लेना-देना नहीं है। यह सिरोसिस (Psoraisis) भी नहीं है। सिरोसिस में स्किन पर लाल धब्बे बनते हैं, न कि सफेद।
मिथः अल्बीनिज़म और सफेद दाग एक ही हैं।
सचः कुछ लोगों का पूरा शरीर उजला होता है क्योंकि उनके शरीर में रंग बनाने वाले कण जन्म से ही पूरी तरह नदारद होते हैं। इन्हें अल्बीनो और उनकी बीमारी को अल्बीनिज़म कहा जाता है। यह बीमारी वंशानुगत और लाइलाज है, जबकि सफेद दाग का इलाज मुमकिन है।
मिथः मरीज की छूने या चीजें इस्तेमाल करने से दूसरों में फैलता है यह।
सचः सफेद दाग किसी को छूने, किस करने या फिजिकल रिलेशन बनाने से नहीं फैलता। प्राइवेट पार्ट पर सफेद दाग हो तो भी न तो सेक्शुअल आनंद में कमी आती है और न ही पार्टनर को यह बीमारी होती है।
ध्यान दें
- सफेद दाग हैं तो तेज केमिकल वाले साबुन और डिटर्जेंट के इस्तेमाल से बचें। साथ ही परफ्यूम, डियोड्रंट, हेयर डाई, पेस्टिसाइड्स को शरीर के सीधे संपर्क में आने से बचाएं। तेज केमिकल एक्सपोजर से सफेद दाग फैलता है।
- सफेद दाग वाले कुछ लोग उन्हें छिपाने के लिए स्किन कलर भी लगाते हैं। इससे कुछ घंटों के लिए सफेद दाग छिप तो जाते हैं, लेकिन स्किन के छेद भर जाते हैं। इससे स्किन को नुकसान होता है।
- कुछ लोग सफेद दाग पर टैटू भी बनवाते हैं। इससे सफेद दाग के आसपास के हिस्से में फैलने की आशंका भी बढ़ जाती है।
- मुमकिन है कि एक बार दवाओं से ठीक होने के बावजूद एक से डेढ़ साल के भीतर सफेद दाग फिर से पनप जाए। लेकिन अगर डेढ़ साल तक सफेद दाग नहीं लौटे तो बहुत हद तक आप इत्मिनान रख सकते हैं कि आपको इनसे छुटकारा मिल गया है।
खुद पर भरोसा जरूरी
- मशहूर सिंगर माइकल जैक्सन को सफेद दाग थे और उन्होंने इस बात को पूरी दुनिया के सामने स्वीकार किया था। इससे जैक्सन का मनोबल कम नहीं हुआ और वह पूरी दुनिया पर छा गए। दूसरे भी कई सिलेब्रिटी इससे पीड़ित रहे हैं, लेकिन वे कभी हीन भावना से ग्रस्त नहीं रहे। यह कोई ऐसी चीज है भी नहीं जिसकी वजह से हीन भावना पाली जाए।
- अपने को कुछ अलग न समझें। सफेद दाग होने पर न तो उस शख्स की काम करने की क्षमता पर असर पड़ता है और न ही किसी और तरह की दिक्कत पेश आती है। सफेद दाग से प्रभावित शख्स किसी भी आम इंसान की तरह ही होता है।
- अगर आपको सफेद दाग है तो आप अपने किसी गुण या काबिलियत पर फोकस करें और उसे इतना अच्छा बना लें कि दूसरों से आगे निकल जाएं।
- इस समस्या से ध्यान हटाकर पर्सनैलिटी डिवेलपमेंट पर ध्यान दें। किताबें पढ़ें, कुछ नया सीखें, म्यूजिक सीखें और फ्रेंड सर्कल बढ़ाएं।
- अगर सुंदरता आपके लिए बहुत अहम है तो आप उन फीचर को उभारें, जो अच्छे हैं, मसलन फिट रहें, अच्छी फिजिक बनाएं, बेहतर ड्रेस पहनें और प्रजेंटेबल बनें।
- अगर आप वाकई दागों को लेकर असहज महसूस करते हैं तो कंसीलर इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन कंसीलर हमेशा अच्छी क्वॉलिटी का खरीदें वरना स्किन को और नुकसान हो सकता है।
- हमेशा खुद से सहानुभूति दिखानेवालों से दूर रहें और मन को पॉजिटिव रखें।

गर्मियों में सेवन करें चने का सत्तू।

    


गर्मियों में चने का सत्तू सेहत के लिए फायदेमंद होता है। चने के सत्तू में फाइबर्स और कार्बोहाइड्रेट्स की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है। गर्मियों में प्यास बुझाने के लिए कोल्ड ड्रिंक्स का इस्तेमाल सेहत के लिए जितना नुकसानदायक होता है, उतना ही चने के सत्तू का शर्बत फायदेमंद होता है। कई बार खाना खाने के बाद डाइजेशन की प्रॉब्लम हो जाती है जिसे चने का सत्तू पीकर दूर किया जा सकता है। तो आइए आज बताते हैं कि इससे क्या-क्या फायदे होते हैं। 
आयुर्वेदाचार्योंका कहना है चने का सत्तू पीने से पेट में ठंडक बनी रहती है। इसे खाने से या इसे पीने से काफी समय तक भूख नहीं लगती। इससे आसानी से वजन कम किया जा सकता है।

एनर्जी का अच्छा स्रोत
इसका सेवन इंस्टेंट एनर्जी देता है। इसमें मौजूद कई तरह के मिनरल्स जैसे आयरन, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं, खासतौर से इसमें नींबू और नमक मिलाकर पीना।
पेट को ठंडा रखता है
चने के सत्तू में गर्मियों में लू से बचाने वाले गुण होते हैं। पेट को ठंडा रखने के साथ ही ये कई तरह की पेट की बीमारियों को भी दूर करता है। शरीर का तापमान कंट्रोल करता है जिसके लिए खाली पेट इसका सेवन करना ज्यादा फायदेमंद होता है।
कम करता है मोटापा
चने के सत्तू में कई सारे ऐसे तत्व होते हैं जो एक संपूर्ण आहार के लिए जरूरी होते हैं। इसे खाने से या इसे पीने से काफी समय तक भूख नहीं लगती। इससे आसानी से वजन कम किया जा सकता है। कई बार डाइटिंग के लिए लोग घंटों भूखे रहते हैं जिससे वजन तो आसानी से कम हो जाता है, लेकिन ज्यादा समय तक भूखे रहने से सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
एनीमिया की समस्या दूर
शरीर में आयरन की कमी से होने वाली एनीमिया की समस्या को रोजाना सत्तू में पानी मिलाकर पीकर दूर किया जा सकता है। महिलाओं में एनीमिया की सबसे ज्यादा समस्या पाई जाती है, खासतौर से प्रेग्नेंसी के बाद।
डायबिटीज से छुटकारा
चने के सत्तू का सेवन ताकतवर बनाने के साथ ही शरीर में एक्स्ट्रा ग्लूकोज की मात्रा को भी कम करता है जो डायबिटीज के मरीजों के लिए कारगर होता है।
लिवर के लिए जरूरी
प्रोटीन की भरपूर मात्रा पाई जाती है जो लिवर के लिए जरूरी होती है। सिर्फ इसके आधे कप में 10 ग्राम प्रोटीन, 178 कैलरी और 3 ग्राम फैट की मात्रा होती है। खराब खाना, एल्कोहल की ज्यादा मात्रा का सबसे ज्यादा असर लिवर पर पड़ता है जो कई सारी बीमारियों का कारण बनता है इसलिए इसे हेल्दी रखना बहुत ही जरूरी होता है।
प्रकार व गुण

जौ का सत्तू - जौ को धोने और साफ करने के बाद, भूनने व पीसने पर सत्तू तैयार होता है। वो गुणों में रुक्ष, शीतल एंव थोड़ा भारी होता है। रस में मधुर एवं कषाय होता है। यह तासीर में ठंडा, अग्नि प्रदीपक, कब्ज नाशक होने के साथ-साथ कफ व पित्त शामक तथा वात वर्धक होता है। सुपाच्य तो है ही, तुरंत शक्ति प्रदान करने वाला, बलवर्धक और कब्ज दूर करने वाला भी होता है। उसमें प्रोटीन्स 11.5 प्रतिशत तथा कार्बोहाइडेªट्स लगभग 70 प्रतिशत होते हैं।

जौ-चने का सत्तू

चने को भूनने के बाद छिलका हटाकर पिसवा लेने पर चैथाई भाग जौ का सत्तू मिलाने से जौ-चने का सत्तू तैयार हो जाता है। इस सत्तू को पानी में घोलकर या घी-शक्कर मिलाकर पीने से गर्मी और बारिश के मौसम में खोई शारीरिक ऊर्जा प्राप्त होती है। इसकी तासीर ठंडी होती है और यह ठंक देने वाला होता है। चना गुणों में लघु, रुक्ष एवं शीतल होता है। रस में मधुर एवं कषाय होता है। वो कफ, पित्त, रक्त शामक एवं वात वर्धक होता है।  इसमें लगभग 18 प्रतिशत प्रोटीन तथा 61 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं। चने का सत्तू मधुमेह, स्थौल्य एवं रक्त विकार के लिए प्रशस्त होता है। अम्लपित्त तथा परिणाम शूल में चने का सत्तू आहार रुप में देते हैं।

गेहूं का सत्तू - गेहूं स्निग्ध, मधुर, शीतल एवं पचने में भारी होता है। यह वात, पित्त शामक तथा कफ वर्धक होता है। साथ में वो जीवनीय, संधान कारक, स्थैर्य कारक और बृहणीय होता है। गेहूं का सत्तू पचने में गेहूं से हल्का होता है।

 

जौ-चने और गेहूं का सत्तू- एक किलो चने की दाल, आधा किलो गेहूं और दो सौ ग्राम जौ को एक साथ अधिकतम दस घंटे पानी में भिगो कर छाया में सुखा लें। साफ करने के बाद तीनों को भुनवा कर पीस लेने पर यह सत्तू तैयार होता है। इसमें तीनों मुख्य अनाज होने के कारण शरीर को पूरा पोषण प्राप्त होता है। जौ और चना होने के कारण यह बेहद ऊर्जावर्धक व पचने में आसान भी होता है।

सेवन की विधि       

सत्तू सेवन की निम्न विधियां अधिक लोकप्रिय हैं-
  • किसी भी प्रकार के सत्तू को ताजे पानी के साथ पतला पेय बना कर पिया जा सकता है। पानी घड़े का हो, तो ज्यादा अच्छा है। स्वाद अनुसार गुड़/चीनी या नमक मिलाया जा सकता है।

  • लप्सी (गाढ़ा घोल) बनाकर खाना भी कम रुचिकर नहीं होता। पानी की मात्रा कम और सत्तू की मात्रा अधिक रखकर इसे तैयार करने का बाकी तरीका पतला पेय बनाने जैसा ही है।

  • सत्तू की टिक्की, पूड़ी, रोटी, पराठा आदि भी खाया जा सकता है। नमकीन सत्तू में भुना हुआ जीरा, हींग, अजवाइन जैसे तत्वों को मिला लेना भी इसके पाचक गुणों को बढ़ा देता है।


  • सेवन संबंधी सावधानी      
  • खाना खाने के बाद सत्तू का सेवन नहीं करना चाहिए।

  • सत्तू पेट भरकर नहीं खाना/पीना चाहिए।

  • रात के समय सत्तू का सेवन न करें।

  • सत्तूके साथ पानी की मात्रा ज्यादा नहीं रखनी चाहिए।

    आयुर्वेदिक महत्व      

    आहार को आयुर्वेद के तीन उपस्तंभों में से एक और प्रमुख कहा गया है। रेशा (फाइबर), कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, स्टार्च तथा खनिजों की प्रचुर मात्रा होने के कारण आयुर्वेद ने सत्तू को सम्यक पूर्ण आहार का दर्जा दिया है। इन्हीं गुणों के कारण सत्तू मोटापा कम करने और डायबटीज जैसे रोगों के नियंत्रण में भी बहुत लाभदायक है।

    नहाने के पानी में मिलाएं ये चीजें, दूर होंगी बीमारियां

        


    अच्छे स्वास्थ्य के लिए रोजाना नहाना बहुत जरूरी होता है। नहाने से न सिर्फ शरीर की सफाई होती है बल्कि हमारा दिमाग भी तरोताजा होता है। अगर नहाने के पानी में कुछ चीजों को मिला लिया जाए तो सेहत सम्बंधी कई समस्याओं को दूर किया जा सकता हैं। जानना चाहेंगे कौन सी हैं वो चीजें...

    संतरे का छिलका
    पानी की बाल्टी में 2 संतरे के छिलके डालें और 10 मिनट के बाद इन छिलकों को पानी से निकाल लें। इस पानी से नहाने से जोड़ों के दर्द से राहत मिलेगी।

    हल्दी
    थोड़ी -सी कच्ची हल्दी को पीस कर उसका पेस्ट बना लें और इसे पानी में मिलाकर नहाने से त्वचा रोेग दूर होगा।

    सेंधा नमक

    अगर एक बाल्टी पानी में एक चम्मच फिटकरी और एक सेंधा नमक मिलाकर नहाया जाए तो इससे ब्लड सर्कुलेशन सही होता है। इससे शरीर की थकान और तनाव दूर होता है और मांस-पेशियों को आराम मिलता है।

    नीम के पत्ते
    एक गिलास पानी में 8-10 नीम की पत्तियां उबाल लीजिए। फिर इसे ठंडा होने के लिए रख दें। ठंडा होने पर इसे छानकर ताजे पानी की बाल्टी में मिलाकर नहा लें। इससे हर तरह के स्किन इंफेक्शन से राहत मिलेगी और शरीर में सूजन भी कम होगी।

    चंदन
    अगर आप त्वचा से संबंधित समस्याओं से परेशान हैं तो रात को सोने से पहले एक कटोरी पानी में थोड़ा-सा चंदन पाउडर मिक्स करें। सुबह इस पेस्ट को नहाने वाले पानी में मिलाकर नहाएं। इससे त्वचा से जुड़ी सभी परेशानियां दूर हो जाएंगी।

    तुलसी
    तुलसी के पत्ते पानी में मिलाकर नहाने से फायदा होता है। तुलसी जीवाणुरोधी होती है, जिससे एक्जिमा जैसी बीमारी नहीं होती।

    दूध
    पानी में दूध मिलाकर नहाने से त्वचा चमकदार और स्वस्थ हो जाती है। दूध में पाया जाने वाला लैक्टिक एसिड और अल्फा ड्राइडोक्सी एसिड त्वचा की डेड स्किन हटाते हैं। साथ ही धूप से टैन हुई त्वचा को भी ठीक करके खूबसूरत बनाता है।

    कपूर
    कपूर का इस्तेमाल सिर्फ पूजा के लिए ही नहीं बल्कि नहाने के पानी में भी किया जा सकता है। इससे शरीर को आराम मिलता है और साथ ही सिर दर्द की परेशानी दूर होती है। समस्या से बचने के लिए नहाने की बाल्टी में 2 कपूर की टिकिया मिला लें। 

    गुलाब जल
    अगर आपके शरीर से पसीने की बदबू आ रही है तो आप पानी में गुलाब जल मिलाकर नहाएं। पानी में 3 से 4 चम्मच गुलाब जल मिलाकर नहाने से मांस-पेशियां रिलैक्स होती हैं और साथ शरीर की बदबू भी दूर होती है।

    डॉक्टर एससी पांडेय के अनुसार, आयुर्वेद में स्नान के अनेक फायदे बताए गए हैं। बहुद देर तक और अच्छे से स्नान करने से थकान और तनाव कम होता है। स्नान करते समय सिर पर पानी डालने पर शरीर के ऊपरी भागों की गर्मी पैरों के माध्यम से निकल जाती है। इससे काफी राहत मिलती है। 

    सोते वक्त क्यों बहती है लार? जानिए कारण

        


    अक्सर हम देखते है कि कई बच्चे जब सोकर उठते है तो उनकी मुंह से लार बह रही होती है। ये समस्या बच्चों में नहीं बल्कि बड़ो में भी देखी जाती है। अगर आप भी इस समस्या से जूझ रहे है तो हम आपको इसका कारण।

    नींद और लार का क्या है संबंध?

    जब कोई बच्चा गहरी नींद से सोकर उठता है तो उसके मुंह के किनारे से लार की पतली सी धार बह रही होती है। हालांकि सोते हुए लोगों के मुंह से लार बहना बहुत आम बात है लेकिन कई बार ये किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी होता है। आइए पहले जानते हैं कि आपकी नींद और लार बहने के बीच क्या संबंध है।

    कब बहती है लार

    जब आप नींद में होते हैं तो आप और आपकी चेहरे की नसें आराम के मूड में होती हैं। इसलिए ऐसे में जब आपके लार के ग्लैंड्स लार तैयार करते हैं तो वो बहने लग जाती है क्योंकि आप उसे निगलते नहीं हैं। अगर आपकी सोते हुए लार बहती है तो आपने देखा होगा कि लार आमतौर पर तभी बहती है जब आप करवट लेकर सोते हो। हम आपको बताते है कि लार बहने के क्या कारण होते है।

    - एलर्जी

    खाने पीने की चीजों से होने वाली एलर्जी और नाक से संबंधित एलर्जी की वजह से लार का अधिक निर्माण हो सकता है और वो बह सकती है। शरीर में लार बनाने वाले अलग से ग्लैंड्स होते हैं। सोते समय जागते समय की अपेक्षा अधिक लार का निर्माण होता है।

    - एसीडिटी 

    वैज्ञानिकों का मानना है कि एसिड रिफ्लक्स एपीसोड्स के कारण गेस्ट्रिक एसिड होता है। इससे एसोफागोसलाइवरी उत्तेजित होता है और बहुत अधिक लार बनने लगती है।

    - साइनस इंफेक्शन

    श्वास नलिका के संक्रमण आमतौर पर सांस लेने और निगलने की समस्याओं से जुड़े होते हैं। इन समस्याओं में लार जमा हो जाने से मुंह से बहने लगती है। फ्लू के कारण जब नाक बंद होती है तो आप खासतौर पर रात को अपने मुंह से सांस लेते हैं और ऐसे में आपके मुंह से लार बहने लगती है।

    - टोंसिलाइटिस

    टोंसिल्स ग्लैंड्स गले के पीछे मौजूद होते हैं, जिनमें सूजन आ जाने से टोंसिलाइटिस हो सकता है। सूजन की वजह से गले का रास्ता छोटा हो जाता है जिससे लार गले से उतर नहीं पाती और मुंह से बहने लग जाती है।

    - सोते हुए डरना


    कुछ लोगों को सोते हुए डर लगता है। इस समस्या का एक लक्षण लार बहना भी है। युवाओं में साइकोपैथोलॉजिकल कारण से ये समस्या होती हैं। ऐसा उनके भावनात्मक तनाव में होने के कारण, ड्रग्स या एल्कोहल लेने के कारण और नींद की कमी के कारण भी हो सका है। इसके इलावा कई बार नींद से जुड़ी अन्य समस्याओं जैसे नींद में चलना, नींद में बात करना आदि में भी लार बहती है।

    - ड्रग्स और केमिकल्स

    ड्रग्स और केमिकल्स के कारण भी लार का निर्माण होता है। अगर आप कोई दवाई या ड्रग्स ले रहे हैं तो सोते हुए लार बहना आपके लिए बहुत आम बात हो सकती है। कुछ एंटीडिप्रेसेंट और दवाएं जैसे कि मॉर्फिन, पिलोकार्पिन आदि लार का निर्माण बढ़ा देती हैं।