Shamsher ALI Siddiquee: history of the day

Shamsher ALI Siddiquee

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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस : बाबा-तांत्रिकों के सहारे 44 फीसदी पीड़ित

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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पूरे विश्व में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से  प्रतिवर्ष 10 अक्टूबर को मनाया जाता है। इस वर्ष विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का विषय "मनोवैज्ञानिक प्राथमिक चिकित्सा" हैं। इसके अनुसार मनोवैज्ञानिक प्राथमिक चिकित्सा में सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दोनों सहयोगों को शामिल किया गया है।
जैसे कि सामान्य स्वास्थ्य देखभाल कभी भी अकेले शारीरिक प्राथमिक उपचार के नहीं होती है, वैसे ही मानसिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली अकेले मनोवैज्ञानिक प्राथमिक उपचार के नहीं होती है। निस्संदेह, मनोवैज्ञानिक प्राथमिक चिकित्सा के क्षेत्र में निवेश लंबी अवधि के प्रयास का हिस्सा है, जो कि यह सुनिश्चित करता है, कि संकट के कारण कोई भी गंभीर समस्या से पीड़ित व्यक्ति बुनियादी सहयोग प्राप्त करने में सक्षम होगा तथा जिन लोगों को मनोवैज्ञानिक प्राथमिक चिकित्सा से ज़्यादा सेवाओं की आवश्यकता होगी, उन्हें अतिरिक्त उन्नत सहयोग स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य एवं सामाजिक सेवाओं से प्राप्त होगा।

मानसिक स्वास्थ्य विकार
मानसिक स्वास्थ्य विकार विश्व भर में होने वाली सामान्य बीमारियों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मानसिक विकारों से पीड़ित व्यक्तियों की अनुमानित संख्या 450 मिलियन हैं। भारत में लगभग 1.5 मिलियन व्यक्ति, जिनमें बच्चे एवं किशोर भी शामिल है, गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित हैं।
मानसिक बीमारी व्यक्ति के महसूस, सोचने एवं काम करने के तरीकें को प्रभावित करती हैं। यह रोग व्यक्ति के मनोयोग, स्वभाव, ध्यान और संयोजन एवं बातचीत करने की क्षमता में समस्या पैदा करता हैं। अंततः व्यक्ति असामान्य व्यवहार का शिकार हो जाता है। उसे दैनिक जीवन के कार्यकलापों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता हैं, जिसके कारण यह गंभीर समस्या स्वास्थ्य चिंता का विषय बन गयी है, इसलिए भारत सरकार ने देश में मानसिक बीमारी के बढ़ते बोझ पर विचार करने के उद्देश्य से वर्ष 1982 में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनएमएचपी) की शुरूआत की थी।

मानसिक बीमारी के मूल कारण
मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए कई कारक उत्तरदायी हैं, जो इस प्रकार है :
1    परिवेश संबंधी तनाव जैसे कि चिंता, अकेलापन, साथियों का दबाव, आत्मसम्मान में कमी, परिवार में मृत्यु या तलाक।
2    दुर्घटना, चोट, हिंसा एवं बलात्कार से मनोवैज्ञानिक आघात होना।
3    आनुवंशिक असामान्यताएं।
4    मस्तिष्क की चोट/दोष।
5    अल्कोहल एवं ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन।
6   संक्रमण के कारण मस्तिष्क की क्षति।
5 ऐसे मानसिक विकार जिनके बारे में जानना ज़रूरी है:

1. मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर (तनाव)
इसे आम भाषा में डिप्रेशन कहा जाता है, यह एक बेहद गंभीर मानसिक बीमारी है। यह बीमारी आप कैसा महसूस करते हैं, क्या सोचते हैं और कैसे पेश आते हैं इन सब पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। इस बीमारी के दौरान एक इंसान महीनों, यहां तक ​​कि सालों तक उदास महसूस कर सकता है।
इस दौरान एक व्यक्ति, कभी जिस काम में मज़ा आता था उसमें रुचि खो देना, भूख न लगना, नींद के पैटर्न में बदलाव, ऊर्जा में कमी, हमेशा थकान महसूस करना, अपने आप को बेकार महसूस करना, एकाग्रता में मुश्किल का अनुभव और निर्णय न ले पाना जैसी चीज़ों का अनुभव करता है।
ऐसे में रोगी के दोस्त और परिवार इस बीमारी के उपचार में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं। वो न सिर्फ ये पहचानने में मदद कर सकते हैं कि उनके परिवार का कोई सदस्य या दोस्त तनाव में है बल्कि समय पर इसका इलाज करवा सकते हैं। साथ ही वे उस व्यक्ति को प्रेरित कर उसे अवसाद से बाहर आने में भी मदद कर सकते हैं।

2. सिज़ोफ्रेनिया
सिज़ोफ्रेनिया भी एक गंभीर मानसिक बीमारी है। इस दौरान एक व्यक्ति वास्तविकता की व्याख्या करने में असमर्थ होता है। वे भ्रम, मतिभ्रम और अव्यवस्थित सोच का अनुभव करते हैं। सिज़ोफ्रेनिया आम नहीं है लेकिन इसके लक्षण काफी गंभीर होते हैं। इसे युवा अवस्था में
किशोरों में सिज़ोफ्रेनिया के लक्षणों को पहचानना मुश्किल हो सकता है क्योंकि दोस्तों और परिवार से दूरी, प्रेरणा की कमी और नींद की समस्या जैसे लक्षण किशोर अवस्था के आम लक्षण हैं। दवा, मनोवैज्ञानिक परामर्श और स्वयं सहायता संसाधन सिज़ोफ्रेनिया के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकते हैं।

3. Obsessive Compulsive Disorder
Obsessive compulsive disorder यानि OCD एक तरह का चिंता करने का डिसऑर्डर है, जिसमें जुनूनी विचार और चीजों को एक निश्चित तरीके से देखने की मजबूरी महसूस करने जैसे लक्षम शामिल हैं। जो OCD के शिकार होते हैं वह हर चीज़ को अलग तरह से देखते हैं। उन्हें ऐसे विचार आते हैं जो बेकाबू होते हैं और कुछ चीजें करने के लिए बेताब हो जाते हैं। जैसे कई बार या लगातार हाथ धोना, अपने शरीर को चेक करते रहना, रोज़ाना एक तरह का रूटीन फोलो करने जैसे कुछ चीज़ें OCD के लक्षण हैं।

4. लगातार अवसादग्रस्त रहना
इस बीमारी को डिस्थीमिया भी कहा जाता है। इस अवस्था में एक इंसान लगातार अवसाद में रहता है। उसे लगातार उदासी, उत्पादकता में कमी, कम ऊर्जा, निराशा, भूख में बदलाव, कम आत्मविश्वास और खराब आत्मसम्मान की भावना महसूस होती है। दर्दनाक जीवन की घटनाएं, निरंतर चिंता, बायपोलर डिसऑर्डर और यहां तक ​​कि मस्तिष्क में एक प्रकार का रासायनिक असंतुलन लगातार हो रही इस अवसादग्रस्तता विकार का एक प्रमुख कारण हो सकता है।

5. बायपोलर डिसऑर्डर
बायपोलर डिसऑर्डर एक प्रकार की मानसिक बीमारी है, जिसमें इचानक मूड में बदलाव होते हैं। बायपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्ति कई तरह की भावनाओं से गुज़रता है, कभी अत्यधिक उत्तेजना, गहरी उदासी, आत्मघाती विचार, ऊर्जा की कमी जैसे अनुभव होते हैं। अगर आप अत्यधिक तनाव, शारीरिक बीमारी, दर्दनाक अनुभव और आनुवांशिकी, बायपोलर डिसऑर्डर के विकास को बढ़ावा दे सकते हैं।

मानसिक रोग से संबंधित भ्रांतियां
यह सबसे बड़ी गलत धारणा है, कि मानसिक विकारों से पीड़ित व्यक्ति जनता के लिए हिंसक एवं खतरनाक होते हैं। इस तरह के नकारात्मक रवैया एवं ग़लतफ़हमी के परिणामस्वरूप मानसिक विकारों से पीड़ित व्यक्ति समाज से अधिक दूर हो जाते हैं। इसका परिणाम सामाजिक भ्रांतियां ही हैं। मानसिक विकार से पीड़ित व्यक्तियों का प्रभावी ढंग से संवाद न करने की क्षमता के कारण, उनका संपूर्ण समाज के साथ-साथ सामान्य जनता पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है, लेकिन मानसिक विकार से पीड़ित व्यक्ति जन-जागरूकता एवं सामाजिक सहयोग से इन भ्रांतियों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकता हैं।

मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्ति के साथ व्यवहार
1    उनकी भावनाओं एवं स्वभाव को समझें तथा उनके साथ प्रभावी ढ़ंग से संवाद करने का प्रयास करें।
2    उन्हें भावनात्मक एवं सामाजिक सहयोग दें।
3    उनके साथ धैर्यपूर्वक व्यवहार करें तथा उनके आत्मविश्वास को बढ़ावा देने में सहयोग करें।
4    उन्हें रचनात्मक एवं मनोरंजक गतिविधियों जैसे कि पढ़ने, खेलने, घूमने, योग व ध्यान एवं यात्रा में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें।
5   उन्हें नया सीखने एवं नयी रुचियाँ विकसित करने में प्रेरित करें।
6    उनमें जीवन के प्रति सकारात्मक सोच एवं रवैया पैदा करें।
7    अपने दैनिक कामकाजों से क्षण निकालकर उनकी सहायता करें।

बाबा-तांत्रिकों के सहारे 44 फीसदी पीड़ित

मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता के लिए चल रहे कार्यक्रमों के बावजूद लगभग हर दूसरे व्यक्ति को अंधविश्वास पर भरोसा है। एक सर्वे के मुताबिक 44 फीसदी मानसिक रोगी इलाज की जगह तांत्रिक, बाबा और नीम-हकीम का सहारा ले रहे हैं जबकि 26 फीसदी ऐसे हैं जिन्हें चिकित्सकीय सुविधा नहीं मिलती।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य कासमोस इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड बिहेवियरल साइंसेस (सीआईएमबीएस) के एक अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है। दिल्ली, यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और हरियाणा के करीब 10,233 लोगों को अध्ययन में शामिल किया गया था। इसके अनुसार 49% मरीजों को उनके घर के 20 किलोमीटर के दायरे में स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पाती हैं। 48% ने माना कि परिजन या दोस्त नशे के आदी हैं लेकिन आसपास नशा मुक्ति केंद्र नहीं है।
सीआईएमबीएस के निदेशक डॉ. सुनील मित्तल ने बुधवार को रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि मानसिक रोगों को लेकर लोग बाबा और तांत्रिकों के पास इलाज के लिए चक्कर लगाते रहते हैं। इसकी वजह समाज में गलत धारणाएं, जागरूकता का अभाव व स्वास्थ्य सुविधाओं का सुलभ नहीं होना है।
अध्ययन में करीब 87% ने मोबाइल, एप्लीकेशन या फिर टेली मेडिसिन सुविधा के जरिए मानसिक रोगों के उपचार की मांग की है। डॉक्टरों के अनुसार, ऑनलाइन परामर्श से बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनएमएचपी)
भारत में राष्‍ट्रीय मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य कार्यक्रम (एनएमएचपी) की शुरूआत 1982 में हुई थी। इसका उद्देश्‍य सभी को न्‍यूनतम मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल उपलब्‍ध और सुलभ कराना, मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी ज्ञान के बारे में जागरूकता लाना और मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य सेवा के विकास में सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देना तथा समुदाय में स्‍वयं-सहायता को प्रोत्‍साहित करना है। धीरे-धीरे मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के दृष्टिकोण को अस्‍पताल आधारित देख-भाल (संस्‍थागत) को सामुदायिक आधारित देखभाल में बदल दिया गया है क्‍योंकि मनोरोगों के अधिकांश मामलों में अस्‍पताल की सेवाओं की ज़रूरत नहीं होती और इन्‍हें सामुदायिक स्‍तर पर ठीक किया जा सकता है।

विश्व फोटोग्राफी डे: ..क्योंकि तस्वीरें हमेशा जिंदा रहती हैं

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“गर पल को अमर करना होतो तस्वीरों में कैद कर लीजिए…. अली उवाच”
तस्वीरें हमेशा जिंदा रहती हैं। चूंकि हम लम्हों को कैद नहीं कर सकते। मगर ख्वाहिश होती है कि काश ये किसी किताब के पन्ने की तरह होते, जिन्हें जब चाहा उलट-पलट कर देख लेते। इंसान की इन्हीं इच्छाओं को मूर्त रूप देने के लिए फोटोग्राफी की तकनीक एक वरदान के रूप में सामने आई।

इंसान के पास जब इतने हाईटेक कैमरे नहीं थे, तब भी वह तस्वीरें बनाता था। प्राचीन गुफाओं में उसके बनाए भित्ति चित्र इस बात के गवाह हैं। इनके जरिये वह आने वाली पीढ़ियों के लिए कितनी बेश्कीमती सौगात छोड़ गए हैं। बाद में जब कैमरे का आविष्कार हुआ, तो फोटोग्राफी भी इंसान के लिए अपनी रचनात्मकता को प्रदर्शित करने का जरिया बन गया। आज विश्व फोटोग्राफी डे है। इस दिवस को मनाने के पीछे भी एक कहानी है। दरअसल फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेक्स और मेंडे डाग्युरे ने सबसे पहले सन 1839 में फोटो तत्व की खोज की थी। ब्रिटिश वैज्ञानिक विलियम हेनरी फॉक्सटेल बोट ने निगेटिव-पॉजीटिव प्रोसेस का आविष्कार किया और सन 1834 में टेल बॉट ने लाइट सेंसेटिव पेपर की खोज करके खींची गई फोटो को स्थायी रूप में रखने में मदद की।
फ्रांसीसी वैज्ञानिक आर्गो की फ्रेंच अकादमी ऑफ साइंस के लिए लिखी गई एक रिपोर्ट को तत्कालीन फ्रांस सरकार ने खरीदकर 19 अगस्त 1939 को आम लोगों के लिए फ्री घोषित कर दिया था। इसी उपलब्धि की याद में 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
इस संसार में प्रकृति ने प्रत्येक प्राणी को जन्म के साथ भी एक कैमरा दिया है जिससे वह संसार की प्रत्येक वस्तु की छवि अपने दिमाग में अंकित करता है। वह कैमरा है उसकी आंख। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रत्येक प्राणी एक फोटोग्राफर है।
वैज्ञानिक तरक्की के साथ-साथ मनुष्य ने अपने साधन बढ़ाना प्रारंभ किया और अनेक आविष्कारों के साथ ही साथ कृत्रिम लैंस का भी आविष्कार हुआ। समय के साथ आगे बढ़ते हुए उसने इस लैंस से प्राप्त छवि को स्थायी रूप से सहेजने का प्रयास किया। इसी प्रयास की सफलता वाले दिन को अब हम विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाते हैं।
फोटोग्राफी का आविष्कार जहां संसार को एक-दूसरे के करीब लाया, वहीं एक-दूसरे को जानने, उनकी संस्कृति को समझने तथा इतिहास को समृद्ध बनाने में भी उसने बहुत बड़ी मदद की है। आज हमें संसार के किसी दूरस्थ कोने में स्थित द्वीप के जनजीवन की सचित्र जानकारी बड़ी आसानी से प्राप्त होती है, तो इसमें फोटोग्रोफी के योगदान को कम नहीं किया जा सकता।
वैज्ञानिक तथा तकनीकी सफलता के साथ-साथ फोटोग्राफी ने भी आज बहुत तरक्की की है। आज व्यक्ति के पास ऐसे-ऐसे साधन मौजूद हैं जिसमें सिर्फ बटन दबाने की देर है और मिनटों में अच्छी से अच्छी तस्वीर उसके हाथों में होती है। किंतु सिर्फ अच्छे साधन ही अच्छी तस्वीर प्राप्त करने की ग्यारंटी दे सकते हैं, तो फिर मानव दिमाग का उपयोग क्यों करता?
तकनीक चाहे जैसी तरक्की करे, उसके पीछे कहीं न कहीं दिमाग ही काम करता है। यही फर्क मानव को अन्य प्राणियों में श्रेष्ठ बनाता है। फोटोग्राफी में भी अच्छा दिमाग ही अच्छी तस्वीर प्राप्त करने के लिए जरूरी है।
हमें आंखों से दिखाई देने वाले दृश्य को कैमरे की मदद से एक फ्रेम में बांधना, प्रकाश व छाया, कैमरे की स्थिति, ठीक एक्सपोजर तथा उचित विषय का चुनाव ही एक अच्छे फोटो को प्राप्त करने की पहली शर्त होती है। यही कारण है कि आज सभी के घरों में मोबाइल कैमरे हैं लेकिन सच तो यह है कि  अच्छे फोटोग्राफर गिनती के हैं।
अच्छा फोटो अच्छा क्यों होता है- इसी सूत्र का ज्ञान किसी भी फोटोग्राफर को सामान्य से विशिष्ट बनाने के लिए पर्याप्त होता है। वास्तव में ‘हमें फ्रेम में क्या लेना है, इससे ज्यादा इस बात का ज्ञान जरूरी है कि हमें क्या-क्या छोड़ना है।’
भारत के संभवतः सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर रघुरायके शब्दों में चित्र खींचने के लिए पहले से कोई तैयारी नहीं करता। मैं उसे उसके वास्तविक रूप में अचानक कैंडिड रूप में ही लेना पसंद करता हूं। पर असल चित्र तकनीकी रूप में कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह तब तक सर्वमान्य नहीं हो सकता जब तक उसमें विचार नहीं है। एक अच्छी पेंटिंग या अच्छा चित्र वही है, जो मानवीय संवेदना को झकझोर दे। कहा भी जाता है कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर है।
आज जब उपभोक्तावाद अपनी चरम सीमा पर है, तब ग्राहक को उत्पादन की ओर खींचने में फोटोग्राफी का भी बहुत बड़ा योगदान है। विज्ञापन को आकर्षक बनाने के लिए फोटोग्राफर जो सार्थक प्रयत्न कर रहा है, उसे हम अपने दैनिक जीवन में अच्छी तरह अनुभव कर सकते हैं। इसी प्रयास में फोटोग्राफी को आजीविका के रूप अपनाने वाले बहुत बड़े लोगों की संख्या खड़ी हो चुकी है। यह लोग न सिर्फ फोटोग्राफी से लाखों कमा रहे हैं बल्कि इस काम में कलात्मक तथा गुणात्मक उत्तमता का समावेश कर ‘जॉब सेटिस्फेक्शन’ की अनुभूति भी प्राप्त कर रहे हैं। अपने आविष्कार के लगभग 100 वर्ष लंबे सफर में फोटोग्राफी ने कई आयाम देखे हैं।
विश्व फोटोग्राफी का इतिहास
पहली तस्वीर की घोषणा 19 अगस्त, 1939 को फ्रांस में की गई थी। इस घोषणा के लिए प्रस्तावना यह थी कि 9 जनवरी, 1839 को फ्रांसीसी विज्ञान अकादमी ने डागुएरोटाइप (Daguerreotype) प्रक्रिया की घोषणा की थी।जो लुई डागुएरे द्वारा विकसित एक फोटोग्राफिक प्रक्रिया है। उसी वर्ष 19 अगस्त को, फ्रांस सरकार ने पेटेंट की प्राप्ति की और फ्रेंकोइस अरागो फ्रांस के प्रधानमंत्री ने फ्रेंच एकेडमी डेस साइंस और एकेडमी डेस बीक्स आर्ट्स में एक प्रस्तुति दी, जिसमें फोटोग्राफी की प्रक्रिया का वर्णन किया गया।
अरागो ने इसके मूल्यांकन पर चर्चा की और इसके शानदार भविष्य की कल्पना करते हुए दुनिया को इसके मुफ्त उपयोग का लाभ दिया। 19 अगस्त 2010 को पहली वैश्विक ऑनलाइन गैलरी की मेजबानी की गई थी। यह दिन ऐतिहासिक था क्योंकि भले ही यह अब तक की पहली ऑनलाइन गैलरी थी, लेकिन इस दिन 270 फोटोग्राफर्स ने तस्वीरों के माध्यम से अपने विचारों को साझा किया और 100 से अधिक देशों के लोगों ने वेबसाइट देखी।

ये पांच काम आपने किए हैं तो मूर्ख दिवस मुबारक हो

    



फर्स्ट अप्रैल को दिमाग के घोड़े दौड़ पड़ते हैं. मूर्ख दिवस कैसे सेलिब्रेट किया जाए. लोग अपने दोस्तों रिश्तेदारों को मूर्ख बनाने के लिए जितनी अक्ल लगाते हैं उतनी किसी और काम में लगाते तो राम जाने क्या होता. खैर ये तो एक दिन की बात है. लेकिन कुछ लोग हफ्तों, महीनों, सालों या जिंदगी भर मूर्ख बने रहने को अभिशप्त रहते हैं. ये किसी और ग्रह से नहीं आते. हमारे आपके बीच ही रहते हैं. बस ये मूर्खता वाली इस कैटेगरी को कुछ नायाब काम करके छू आते हैं. नीचे वो काम लिखे हैं. इनमें से दो मैंने भी किए हैं. तो अकेले गौरवान्वित न महसूस कर लेना.

1. पर्सनैलिटी डेवेलपमेंट कोर्स करने वाले:

भैये कौन है जो अपनी पर्सनैलिटी एकदम चुंबकीय नहीं बनाना चाहता. सब चाहते हैं कि सामने लड़का हो, लड़की हो, बॉस हो, कलीग हो, सब पर अपना भौकाल बना रहे. “90 घंटों में गारंटीड फर्राटे से इंगलिश बोलना” सिखाने वालों ने इस मार्केट को भांप लिया था. इसी प्लान के तहत वो अंगरेजी कोर्स के साथ पर्सनैलिटी डेवलपमेंट कोर्स फोकट में कराने लगे. लेकिन भैये पर्सनैलिटी ऐसी चीज तो है नहीं कि किसी के सिखाने से बन जाएगी. ये तो सबकी अलग अलग होती है. यही तो पर्सनैलिटी की खासियत है. सारे एक ही जैसे व्यवहार करेंगे तो पर्सन कहां रह जाएंगे, रोबोट नहीं हो जाएंगे. लेकिन फिर भी लोगों ने पर्सनैलिटी डेवलपमेंट कोर्स किया और जकड़ के किया.

2. मल्टी लेवल मार्केटिंग से ठगाने वाले:

कोई दूर का रिश्तेदार 10-15 साल आपके घर में आ धमकता है. और झट से अपना महंगा चश्मा, महंगे जूते और ब्रांडेड कपड़े दिखाने लगते हैं. ये भी बताते हैं कि अगले हफ्ते उनकी नई कार आने वाली है. फिर दिल्ली या लखनऊ के पॉश इलाके में घर लेने वाले हैं. आप प्याज जैसी आंखें फाड़कर देख रहे होते हैं कि ये क्या हो गया. ये कल का भिखारी इतना बड़ा आदमी कैसे बन गया. फिर वो खोलता है अपना असली प्लान. कि आप हमारे C बन जाओ फिर आपके नीचे A, B और C बनेंगे. फिर धकापेल कमाई होगी. असल में पूरा गेम सिर्फ C बनाने का होता है.

3. दिल्ली की चांदनी चौक से 100 रुपए की 32 जीबी पेन ड्राइव लेने वाले:

इनकी कोई गलती नहीं होती. ये बस सड़क से निकल रहे होते हैं. बगल में चटाई पर ढेर सारे मेमोरी कार्ड और पेन ड्राइव फैलाए कोई बंदा बैठा होता है. पहली बार दिल्ली आया शख्स उसे खरीद लेता है. भले जरूरत हो या न हो. इतनी सस्ती पेन ड्राइव कैसे छोड़ दे. फिर वो एक बार कंप्यूटर में लगती है तो 10 जीबी बताती है. दोबारा लगाओ तो 100 एमबी. तीसरी बार चलती ही नहीं.

4. न्यूज चैनल पर डिबेट और WWE इमोशनल होकर देखने वाले:

इन पर हम कुछ नहीं लिखेंगे. बस रब राखा. यही दुआ है कि आप जल्दी अपने इमोशन्स पर काबू रखना सीख जाएं. नहीं तो ये खेल बहुत दिन चलने वाला है.

5. बापू को रिहा कराने वाले:

सुबह पांच बजे ट्विटर खोलो तो एक चीज ट्रेंड कर रही होती है. बापू को रिहा करो. या बापू निर्दोष है. ये महात्मा गांधी की बात नहीं कर रहे हैं. बापू यानी आसाराम. वो जो बीसियों केस अपने ऊपर लिए जोधपुर जेल में बंद हैं. उन्होंने बेल के लिए इतने सियापे किए लेकिन कुछ नहीं हुआ. सलमान खान को देखकर उनकी उम्मीद बंधी हुई है लेकिन आशा अब कम ही है. लेकिन उनके चेले चपाटे गजब आशावादी हैं. उनको किसी के कहे पर भरोसा नहीं. झुट्ठे बाबाओं के चक्कर में पड़ने वालों के लिए भी आज का दिन बेहद खास है.

विश्व थैलेसिमिया दिवस - अस्थि मज़्ज़ा ट्रांसप्लांटेशन ही ईलाज़!

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"हँसने-खेलने और मस्ती करने की उम्र में बच्चों को लगातार अस्पतालों के, ब्लड बैंक के चक्कर काटने पड़ें तो सोचिए उनका और उनके परिजनों का क्या हाल होगा! सूखता चेहरा, लगातार बीमार रहना, वजन ना ब़ढ़ना और इसी तरह के कई लक्षण बच्चों में थेलेसीमिया रोग होने पर दिखाई देते हैं। माता-पिता से अनुवांशिकता के तौर पर मिलने वाली इस बीमारी की विडंबना है कि इसके कारणों का पता लगाकर इससे बचा नहीं जा सकता।"

क्या है थेलेसीमिया:- यह एक ऐसा रोग है जो बच्चों में जन्म से ही मौजूद रहता है। तीन माह की उम्र के बाद ही इसकी पहचान होती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इसमें बच्चे के शरीर में खून की भारी कमी होने लगती है, जिसके कारण उसे बार-बार बाहरी खून की जरूरत होती है। खून की कमी से हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है एवं बार-बार खून चढ़ाने के कारण मरीज के शरीर में अतिरिक्त लौह तत्व जमा होने लगता है, जो हृदय में पहुँचकर प्राणघातक साबित होता है।

आनुवांशिक बीमारी :- प्रत्येक वर्ष 8 मई को मनाया जाता है। थैलेसिमिया रोग के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। यह बीमारी आनुवांशिक है, रिश्तेदारी के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। बीमारी का जन्म शिशु के साथ होता है, जो उम्रभर साथ नहीं छोड़ती। इसका सिर्फ एक समाधान है, रिश्तों में सावधानी। यह बीमारी कुछ विशेष समुदायों में है। उन समुदायों के रिवाज ही इस बीमारी को रोक सकते हैं। थैलेसिमिया एक आनुवांशिक बीमारी है, जो माता-पिता से संतान को होती है। इस रोग के होने पर शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है जिसके कारण रक्तक्षीणता के लक्षण प्रकट होते हैं। इसकी पहचान तीन माह की आयु के बाद ही होती है। इसमें रोगी बच्चे के शरीर में रक्त की भारी कमी होने लगती है जिसके कारण उसे बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। इस बीमारी से ग्रस्त शरीर में लाल रक्त कण बनने बंद हो जाते हैं। इससे शरीर में रक्त की कमी आ जाती है। बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। रंग पीला पड़ जाता है। इस रोग से बच्चों में जिगर, तिल्ली और हृदय की साइज बढ़ने, शरीर में चमड़ी का रंग काला पड़ने जैसी विकट स्थितियां पैदा होती हैं। इस रोग को लेकर महिला के प्रसव से पूर्व ध्यान रखने की जरूरत है। एक शोध के मुताबिक भारत में प्रति वर्ष लगभग 8 से 10 थैलेसिमिया रोगी जन्म लेते हैं। वर्तमान में भारत में लगभग 2,25,000 बच्चे थैलेसिमिया रोग से ग्रस्त हैं। बच्चे में 6 माह, 18 माह के भीतर थैलेसिमिया का लक्षण प्रकट होने लगता है। बच्चा पीला पड़ जाता है, पूरी नींद नहीं लेता, खाना-पीना अच्छा नहीं लगता है, बच्चे को उल्टियां, दस्त और बुखार से पीड़ित हो जाता है। आनुवांशिक मार्गदर्शन और थैलेसिमिया माइनर का दवाइयों से उपचार संभव है। थैलेसिमिया रोग से बचने के लिए माता-पिता का डीएनए परीक्षण कराना अनिवार्य होता है। साथ ही रिश्तेदारों का भी डीएनए परीक्षण करवाकर रोग पर प्रभावी नियंत्रण संभव है। विवाह से पूर्व जन्मपत्री मिलाने के साथ-साथ दूल्हे और दुल्हन का एचबीए- 2 का टेस्ट कराना चाहिए। सावधानियाँ रोगी को बार-बार खून चढ़ाने से शरीर में लौह तत्त्व की मात्रा बढ़ जाती है। इसलिए रोगी को हरी पत्तेदार सब्जी, गुड़, मांस, अनार, तरबूज, चीकू कम देना चाहिए। बोन मेरो ट्रांसप्लांट(Bone Marrow Transplantation) से इसका इलाज संभव है। इलाज की यह पद्धति काफी महंगी है। अब वैज्ञानिक नई तकनीक पर प्रयोग कर रहे हैं, जिसका नाम स्टेम सैल थैरेपी है।
दो प्रकार:- थैलासीमिया दो प्रकार का होता है। यदि पैदा होने वाले बच्चे के माता-पिता दोनों के जींस में माइनर थेलेसीमिया होता है, तो बच्चे में मेजर थेलेसीमिया हो सकता है, जो काफी घातक हो सकता है। किन्तु पालकों में से एक ही में माइनर थेलेसीमिया होने पर किसी बच्चे को खतरा नहीं होता। यदि माता-पिता दोनों को माइनर रोग है तब भी बच्चे को यह रोग होने के 25 प्रतिशत संभावना है। अतः यह अत्यावश्यक है कि विवाह से पहले महिला-पुरुष दोनों अपनी जाँच करा लें।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत देश में हर वर्ष सात से दस हजार थैलीसीमिया पीडि़त बच्चों का जन्म होता है। केवल दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ही यह संख्या करीब 1500 है। भारत की कुल जनसंख्या का 3.4 प्रतिशत भाग थैलेसीमिया ग्रस्त है। इंग्लैंड में केवल 360 बच्चे इस रोग के शिकार हैं, जबकि पाकिस्तान में 1 लाख और भारत में करीब 10 लाख बच्चे इस रोग से ग्रसित हैं। थेलेसीमिया से पी‍डि़त अधिकांश गरीब बच्चे 8-10 वर्ष से ज्यादा नहीं जी पाते है। बिहार में पी‍डि़त की संख्या 700 है। बीमारी के कारण अब तक 300 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। वर्ष 2016 में पटना शहर में 76 थेलेसीमिया पी‍डि़त बच्चों ने जन्म लिया है। 2018 में 30 से ज्यादा पी‍डि़त बच्चों की मौत हुई है। अन्य राज्यों की अपेक्षा थेलेसीमिया पी‍डि़त बच्चों के प्रति बिहार सरकार उदासीन है, इसकी रोकथाम हेतु सरकारी योजनाओं की जरूरत है।
इस रोग का फिलहाल कोई ईलाज नहीं है। हीमोग्लोबीन दो तरह के प्रोटीन से बनता है अल्फा ग्लोबिन और बीटा ग्लोबिन। थैलीसीमिया इन प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी होने से होता है। जिसके कारण लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से नष्ट होती है। रक्त की भारी कमी होने के कारण रोगी के शरीर में बार-बार रक्त चढ़ाना पड़ता है। रक्त की कमी से हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है एवं बार-बार रक्त चढ़ाने के कारण रोगी के शरीर में अतिरिक्त लौह तत्व जमा होने लगता है, जोहृदय, यकृत और फेफड़ों में पहुँचकर प्राणघातक होता है। मुख्यतः यह रोग दो वर्गों में बांटा गया है:

1.मेजर थैलेसेमिया:-यह बीमारी उन बच्चों में होने की संभावना अधिक होती है, जिनके माता-पिता दोनों के जींस में थैलीसीमिया होता है। जिसे थैलीसीमिया मेजर कहा जाता है।
2.माइनर थैलेसेमिया:-थैलीसीमिया माइनर उन बच्चों को होता है, जिन्हें प्रभावित जीन माता-पिता दोनों में से किसी एक से प्राप्त होता है। जहां तक बीमारी की जांच की बात है तो सूक्ष्मदर्शी यंत्र पर रक्त जांच के समय लाल रक्त कणों की संख्या में कमी और उनके आकार में बदलाव की जांच से इस बीमारी को पकड़ा जा सकता है।
पूर्ण रक्तकण गणना (कंपलीट ब्लड काउंट) यानि सीबीसी से रक्ताल्पता या एनीमिया का पता लगाया जाता है। एक अन्य परीक्षण जिसे हीमोग्लोबिन इलैक्ट्रोफोरेसिस कहा जाता है से असामान्य हीमोग्लोबिन का पता लगता है। इसके अलावा म्यूटेशन एनालिसिस टेस्ट (एमएटी) के द्वारा एल्फा थैलीसिमिया की जांच के बारे में जाना जा सकता है। मेरूरज्जा ट्रांसप्लांट से भी इस बीमारी के उपचार में मदद मिलती है।

लक्षण:-सूखता चेहरा, लगातार बीमार रहना, वजन ना ब़ढ़ना और इसी तरह के कई लक्षण बच्चों में थेलेसीमिया रोग होने पर दिखाई देते हैं। बार-बार बीमारी होना, सर्दी, जुकाम बने रहना, कमजोरी और उदासी रहना, आयु के अनुसार शारीरिक विकास न होना, शरीर में पीलापन बना रहना व दाँत बाहर की ओर निकल आना, साँस लेने में तकलीफ होना और कई तरह के संक्रमण होना होता है।

बचाव एवं सावधानी:- अस्थि मज़्ज़ा ट्रांसप्लांटेशन (एक किस्म का ऑपरेशन) इसमें काफी हद तक फायदेमंद होता है, लेकिन इसका खर्च काफी ज्यादा होता है। मप्र और छत्तीसग़ढ़ में थेलेसीमिया, सिकल सेल, सिकलथेल, हिमोफेलिया आदि से पी‍डि़त बच्चों की संख्या 30 हजार से ज्यादा है।
थेलेसीमिया पी‍डि़त के इलाज में काफी बाहरी रक्त चढ़ाने और दवाइयों की आवश्यकता होती है। इस कारण सभी इसका इलाज नहीं करवा पाते, जिससे 12 से 15 वर्ष की आयु में बच्चों की मृत्य हो जाती है। विवाह से पहले महिला-पुरुष की रक्त की जाँच कराएँ,गर्भावस्था के दौरान इसकी जाँच कराएँ, मरीज की हीमोग्लोबिन 11 या 12 बनाए रखने की कोशिश करें और समय पर दवाइयाँ लें और इलाज पूरा लें। सही इलाज करने पर 25 वर्ष व इससे अधिक जीने की आशा होती है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, रक्त की जरूरत भी बढ़ती जाती है। विवाह से पहले महिला-पुरुष की रक्त की जाँच कराएँ। गर्भावस्था के दौरान इसकी जाँच कराएँ,रोगी की हीमोग्लोबिन 11 या 12 बनाए रखने की कोशिश करें और समय पर दवाइयाँ लें और इलाज पूरा लें। विवाह पूर्व जांच को प्रेरित करने हेतु एक स्वास्थ्य कुण्डली का निर्माण किया गया है, जिसे विवाह पूर्व वर-वधु को अपनी जन्म कुण्डली के साथ साथ मिलवाना चाहिये। स्वास्थ्य कुंडली में कुछ जांच की जाती है, जिससे शादी के बंधन में बंधने वाले जोड़े यह जान सकें कि उनका स्वास्थ्य एक दूसरे के अनुकूल है या नहीं। स्वास्थ्य कुंडली के तहत सबसे पहली जांच थैलीसीमिया की होगी। एचआईवी, हेपाटाइटिस बी और सी। इसके अलावा उनके रक्त की तुलना भी की जाएगी और रक्त में RH फैक्टर की भी जांच की जाएगी। इस प्रकार के रोगियों के लिए कितनी ही संस्थायें रक्त प्रबंध कराती हैं। इसके अलावा बहुत से रक्तदान आतुर सज्जन तत्पर रहते हैं।

शोध और विकास :-थैलेसीमिया पर विश्व भर में शोध अनुसंधान अन्वरत जारी हैं। इन प्रयासों से ही थैलीसीमिया पीड़ितों के लिए एक दवाई अविष्कृत हुई थी। इस दवाई से बच्चों को अब इंजेक्शन के दर्द को नहीं झेलना पड़ेगा। जल्दी ही भारतीय बाजार में ये दवा आने वाली है, जिसे खाने से ही शरीर में लौह मात्रा नियंत्रित हो जाएगी। असुरां नाम की यह दवा पश्चिमी देशों में एक्स जेड नाम से पहले से ही प्रयोग हो रही है। इससे इलाज का खर्च भी कम हो जाएगा, किंतु इसके दुष्प्रभावों (साइड एफ़ेक्ट्स) में इससे किडनी प्रभावित होने का एक परसेंट खतरा बना रहता है। दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के थैलीसीमिया इकाई के अध्यक्ष डॉ॰ वीरेंद खन्ना के अनुसार भारत में अतिरिक्त लौह निकालने के लिए दो तरीके प्रचलन में हैं। पहले तरीके में डेसोरॉल (इंजेक्शन) के जरिए आठ से दस घण्टे तक लौह निकाला जाता है। यह प्रक्रिया बहुत महंगी और कष्टदायक होती है। इसमें प्रयोग होने वाले एक इंजेक्शन की कीमत 164 रुपए होती है। इस प्रक्रिया में हर साल पचास हजार से डेढ़ लाख रुपए तक खर्च आता है। दूसरी प्रक्रिया में कैलफर नामक दवा (कैप्सूल) दी जाती है। यह दवा सस्ती तो है लेकिन इसका इस्तेमाल करने वाले 30 प्रतिशत रोगियों को जोड़ों में दर्द की समस्या हो जाती है। साथ ही इनमें से एक प्रतिशत बच्चे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। ऐसे में नई दवा असुरां काफ़ी लाभदायक होगी। यह दवा फलों के रस के साथ मिलाकर पिलाई जाती है और इसकी कीमत 100 रुपये प्रति डोज है। 
मेरु रज्जू ट्रांस्प्लांट :-थैलेसीमिया के लिये स्टेम सेल से उपचार की भी संभावनाएं हैं। इसके अलावा इस रोग के रोगियों के मेरु रज्जु (बोन मैरो) ट्रांस्प्लांट हेतु अब भारत में भी बोनमैरो डोनर रजिस्ट्री खुल गई है। मैरो डोनर रजिस्ट्री इंडिया (एम.डी.आर.आई) में बोनमैरो दान करने वालों के बारे में सभी आवश्यक जानकारियां होगी जिससे देश के ही नहीं वरन विदेश से इलाज के लिए भारत आने वाले रोगियों का भी आसानी से उपचार हो सकेगा। यह केंद्र मुंबई में स्थापित किया जाएगा। ऐसे केंद्र वर्तमान में केवल अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशो में ही थे। ल्यूकेमिया और थैलीसीमिया के रोगी अब बोनमैरो या स्टेम सेल प्राप्त करने के लिए इस केंद्र से संपर्क कर मेरुरज्जु दान करने वालों के बारे में जानकारी के अलावा उनके रक्त तथा लार के नमूनों की जांच रिपोर्ट की जानकारी भी ले पाएंगे। जल्दी ही इसकी शाखाएं महानगरों में भी खुलने की योजना है।
थैलेसीमिया चिल्ड्रन सोसायटी, जयपुर के तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय थैलेसीमिया दिवस 8 मई को दो स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। अध्यक्ष नरेश भाटिया ने बताया कि पहला कार्यक्रम सुबह 9 बजे जेके लोन अस्पताल के सभाग्रह में थैलेसीमिया रोग संबंधित समस्याओं और निदान पर जेके लोन एसएमएस अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा व्याख्यान दिया जाएगा। दूसरे कार्यक्रम के तहत दोपहर 3 बजे संतोकबा दुर्लभजी के हेमलता दुर्लभजी सभाग्रह में थैलेसीमिया बच्चों की निशुल्क शारीरिक जांच, शरीर में लोहे की मात्रा की जांच आदि के लिए रक्त के सैम्पल लिए जाएंगे। सायं 6 बजे से थैलेसीमिया बच्चों अन्य कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

मजदूर द‍िवस आज: जानें, क्‍या है इसका इतिहास

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आज दुन‍ियाभर में लेबर डे यानी मजदूर दिवस मनाया जा रहा है। आज ही के दिन दुनिया के मजदूरों के अनिश्चित काम के घंटों को 8 घंटे में तब्दील क‍िया गया था। इस दिन देश की कई कंपनियों में छुट्टी होती है। 

भारत ही नहीं, दुनिया के करीब 80 देशों में इस दिन नैशनल हॉल‍िडे होता है। गूगल ने भी आज अपना डूडल लेबर डे को ही समर्पित क‍िया है। कैसे हुई मजदूर दिवस की शुरुआत, जानें उससे जुड़ी खास बातें... 


‘अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस’ का उद्देश्य  

किसी भी देश व समाज के निर्माण में मजदूरों का महत्वपूर्ण योगदान होता है | ‘अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस’ मनाने का उद्देश्य है 4 मई 1886 को शिकागो के हैय मार्केट में हुए बम धमाके में मरे हुए मजदूरों को श्रध्दांजलि देना और उस नारे को साकार करना जो सभी मजदूरों को एक सूत्र में बाँधती है |

भारत में मजदूर दिवस मनाएं जाने की शुरुआत

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1 मई को ‘मजदूर दिवस’ मनाएं जाने के तर्क के आधार पर भारत में भी यह दिन ‘श्रमिक दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा | पहली बार भारत में मजदूर दिवस 1 मई 1923 को मद्रास में मनाया गया था | इसकी शुरुआत “लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान” ने की थी |
भारत में इस दिन मजदूर सभा करके अपनी समस्याओं पर विचार – विमर्श करते है | जुलूस निकाले जाते है | अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन द्वारा इस दिन विशेष सम्मलेन का भी आयोजन किया जाता है |
इस दिन सरकार द्वारा मजदूरों के हक़ को सुरक्षित रखने के लिए कानून भी पारित किए गए है | इन कानूनों में यह बात कही गई कि प्रत्येक मजदूर को बिना किसी भेद – भाव के अपनी योग्यता व क्षमता के अनुसार श्रम – शक्ति का उपयोग करने का अधिकार है |
श्रमिक को जाति, धर्म, लिंग, नस्ल के आधार पर कार्य का चुनाव करने की स्वतंत्रता है | उसे बंधुआ या गुलाम बनाकर काम करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है | इसी प्रकार के दर्जनों कानून स्वतंत्रता से पूर्व व स्वतंत्रता के बाद मजदूरों के हित के लिए बनाए गए |
मजदूर दिवस की शुरुआत हुए लगभग सवा सौ साल हो चुके है | गौरतलब है कि हर एक को अपनी श्रम – शक्ति के अनुसार गरिमा-मय जीवनयापन करने का पूरा अधिकार है और उतना ही जरुरी अपने अधिकारों के बारे में पता होना | मजदूरों के हक़ को सुरक्षित रखने के लिए अनेक अधिनियम भारत में पारित किए गए है |

मजदूरों के हक़ को सुरक्षित रखने के लिए बने अधिनियम

यहाँ के लोग दो वर्गो में बटे है | पहला पूंजीपति वर्ग और दूसरा मजदूर वर्ग | मजदूर वर्ग हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद भी अभाव की जिंदगी जीने के लिए बेबस है तो दूसरी ओर पूँजिपति वर्ग उतना ही संपन्न है | दोनों वर्गों के जीवन में बहुत बड़ा फर्क है लेकिन अफसोस यह फर्क कम होने की अपेक्षा बढ़ता ही जा रहा है |
कारखानों, खेतों में काम करने वाले मजदूरों और किसानों को अधिकांशत: भारी जान – माल का नुकसान होता रहता है | लेकिन मालिको द्वारा न तो उनका स्वास्थ्य बीमा कराया गया रहता है और न ही उन्हें या उनके परिवार को ठीक से मुवावजा मिलता है | इसलिए सरकार द्वारा मजदूरों के हक़ को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से कुछ अधिनियम बनाया गया है जो निम्नलिखित है –
  • कामगार मुआवजा अधिनियम 1923
  • ओद्योगिक विवाद एक्ट 1947
  • न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948
  • फैक्ट्रीज अधिनियम 1948
  • राज्य कर्मचारी बीमा अधिनियम 1948
  • बाल मजदूरी (उन्मूलन एवं नियम) अधिनियम 1948
  • मातृत्व लाभ अधिनियम 1961
  • बोनस अधिनियम 1965
  • बंधुआ मजदूरी प्रथा अधिनियम 1976
  • असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008
  • कामगार मुआवजा अधिनियम 1923
कामगार मुआवजा अधिनियम 1923 का गठन मजदूरों व उनके परिवार की सुरक्षा के लिए किया गया है | इसे जम्मू कश्मीर सहित पुरे भारत में लागू किया गया है |

ओद्योगिक विवाद एक्ट 1947

मजदूरों के झगड़ों को सुलझाने के लिए इस एक्ट को बनाया गया है | ओद्योगिक विवाद एक्ट 1947 के अंतर्गत मजदूरों को यह अधिकार दिया गया है कि वह अपने सही और उचित मांगों के लिए आंदोलन कर सकते है और मजदूर संघ बना सकते है |

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 के तहत श्रमिक जीवन यापन के लिए योग्य बेतन की मांग कंपनी के मालिक से कर सकता है |

फैक्ट्रीज अधिनियम 1948

फैक्ट्रीज अधिनियम 1948 को फैक्ट्रीज में काम करने वाले श्रमिको की स्वास्थ्य की सुरक्षा व जीवन की सुरक्षा के लिए बनाया गया है |

राज्य कर्मचारी बीमा अधिनियम 1948

राज्य कर्मचारी बीमा अधिनियम 1948 के अंतर्गत मजदूरों का स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा किए जाने का प्रावधान है |

बाल मजदूरी (उन्मूलन एवं नियम) अधिनियम 1948

14 साल से कम उम्र के बच्चे बाल मजदूरी के श्रेणी में आते है | बाल मजदूरी (उन्मूलन एवं नियम) अधिनियम 1948 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मजदूरी करने से रोकने के लिए बनाया गया है |

मातृत्व लाभ अधिनियम 1961

कुल मजदूरों की संख्या का 25 प्रतिशत भाग महिला मजदूरों का भी है | इसी बात को ध्यान में रखते हुए मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 को बनाया गया | इसके अंतर्गत महिला मजदूरों को गर्भावस्था के दौरान व उसके उपरान्त 80 दिनों की छुट्टी का प्रावधान किया गया है |

बोनस अधिनियम 1965

बोनस अधिनियम 1965 के अंतर्गत अवसर अनुकूल मजदूरों को बोनस देने का प्रावधान किया गया है |

बंधुआ मजदूरी प्रथा अधिनियम 1976

यह अधिनियम बंधुआ मजदूरी को समाप्त करने के लिए बनाया गया है |

असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008

इस अधिनियम का गठन असंगठित मजदूरों के लिए किया गया है | इसके अंतर्गत स्वास्थ्य, मातृत्व, बुढ़ापा सुरक्षा व विकलांगता सम्बंधी लाभ का प्रावधान है |
जागरूकता ही एकमात्र आपका हथियार है | इसलिए आप ही को जागरूक होना पड़ेगा, ताकि मालिको द्वारा अपने लाभ को बढ़ाने के लिए ‘शोषण’ न कर सके |

आधुनिक भारत के महानायक थे डाॅ. आम्बेडकर

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भारत की माटी को प्रणम्य बनाने एवं उसे अमरता प्रदान करने में ‘दलितों के मसीहा’ और ‘संविधान निर्माता’ कहे जाने वाले आज के सबसे चर्चित महापुरूष डाॅ.भीमराम आम्बेडकर का अमूल्य योगदान है, वे अखण्ड भारत एवं आदर्श एवं संतुलित समाज रचना के प्रेरक थे, उन्होंने आधुनिक, लोकतांत्रिक, धर्म निरपेक्ष, आर्थिक दृष्टिकोण वाले समतामूलक भारत के अभ्युदय की नींव डाली। वे राष्ट्रीयता के महानायक थे।

आज दुनिया के साथ-साथ भारत भी तेजी से बदल रहा है। सर्वव्यापी उथल-पुथल में नित नए राजनीतिक समीकरण बन-बिगड़ रहे हैं। भारत के स्वप्न को अधिक गहरा और विराट बनाने के लिये डाॅ.भीमराम आम्बेडकर के राजनीतिक दृष्टिकोण को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना होगा। क्योंकि इस दौर में सबसे उजागर है, डाॅ. आम्बेडकर का सभी राजनीतिक धाराओं का लाडला हो जाना। दलितों ही नहीं, भारत की समस्त जनता को यह समझना आवश्यक है कि जिस स्वाभिमान को गांधीजी ने सत्य और अहिंसा तथा भगत सिंह ने मनुष्य द्वारा, मनुष्य के शोषण से मुक्त समाज की धारणा से चिन्हित किया था, उसे डाॅ. आम्बेडकर ने ‘सामाजिक न्याय’ को ‘अनिवार्य’ मुद्दा बनाकर पुष्ट किया था। आज जो दलितों में स्वाभिमान और सशक्तिकरण की उत्कट आकांक्षा व्याप्त है, वही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है। ज्योतिबा फुले और डाॅ. आम्बेडकर ने भारत के दलितों को समस्त मानव समाज से जोड़ा था। बात केवल दलितों की नहीं है, वे भारत का समग्र विकास देखना चाहते हैं, वे इंसान को बांटना नहीं चाहते थे। अखण्ड इंसान एवं अखण्ड राष्ट्र के लिये उनके प्रयत्न सदैव प्रासंगिक रहेंगे।
डाॅ. आम्बेडकर  का  जन्म 14 अप्रैल 1891 को एक सैनिक छावनी महु में महार जाति के रामजी मालोजी सकपाल नामक सूबेदार के घर हुआ। अछूत समझी जाने वाली जाति में जन्म लेने के कारण अपने स्कूली जीवन में आम्बेडकर को अनेक अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ा। इन सब स्थितियों का धैर्य और वीरता से सामना करते हुए उन्होंने स्कूली शिक्षा समाप्त की। फिर कॉलेज की पढ़ाई शुरू हुई। इस बीच पिता का हाथ तंग हुआ। खर्चे की कमी हुई। एक मित्र उन्हें बड़ौदा के शासक गायकवाड़ के यहाँ ले गए। गायकवाड़ ने उनके लिए स्कॉलरशिप की व्यवस्था कर दी और आम्बेडकर ने अपनी कॉलेज की शिक्षा पूरी की। वे एलिफिन्सटन कॉलेज से 1912 में ग्रेजुएट हुए। कुछ साल बड़ौदा राज्य की सेवा करने के बाद उनको फिर गायकवाड़-स्कालरशिप प्रदान की गयी, जिसके सहारे उन्होंने अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए. (1915) किया। इसी क्रम में वे प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री सेलिगमैन के प्रभाव में आए। सेलिगमैन के मार्गदर्शन में आम्बेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से 1917 में पी एच. डी. की उपाधि प्राप्त कर ली।  इसके अलावा भी उन्होंने अन्य डिग्रियां प्राप्त की।
डाॅ. भीमराम आम्बेडकर महान् समाज सुधारक एवं स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रेरक थे। वे भारतीय विधिवेत्ता ,अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाजसुधारक थे। उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और दलितों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया। श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री एवं भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार थे। जीवन के प्रारम्भिक कैरियर में वे अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे एवम वकालत की। बाद का जीवन राजनीतिक गतिविधियों में बीता। 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। वे एक बहुजन राजनीतिक नेता और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी भी थे। उन्हें बाबासाहेब नाम से भी जाना जाता है। आम्बेडकर ने अपना सारा जीवन हिन्दू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली और भारतीय समाज में सर्वत्र व्याप्त जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। उन्हें बौद्ध महाशक्तियों के दलित आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। आम्बेडकर को भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया है। अपनी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों तथा देश की अमूल्य सेवा के फलस्वरूप डॉ. आम्बेडकर को आधुनिक युग का मनु कहकर सम्मानित किया गया। आज हमारी राष्ट्रीयता की फिजां में जो कुछ बेहतर है उसके पीछे उनकी कोशिशों का महत्वपूर्ण योगदान है।
यह विचार सच है कि मनुष्य इतिहास का उत्पाद भी होता है और उसका रचयिता भी। भारत के अपेक्षाकृत जागरूक परिवेश में, एक जागरूक कबीर पंथी परिवार में पैदा होने से डाॅ. आम्बेडकर जागरूक भी थे और सुधारवादी भी। वे अपनी अंतःचेतना से विद्रोही  थे। इसलिए उनमें अपने प्रति हो रहे भेदभाव को महसूस करने और समझने की चेतना शुरू से थी। जागरूकता और चेतना की किसी भूमिका को अच्छी तरह समझ लेना जरूरी होता है। इसे हम फ्रांस की क्रांति से अच्छी तरह समझ सकते हैं। कहा जाता है कि 1789 ई. में फ्रांस में हुई क्रांति से पहले वहां एक बौद्धिक क्रांति हुई, जिसके अग्रणी थे- वाॅल्तेयर, मांतेस्कियु, दिदरो और रूसो आदि। फ्रांस में क्रांति इसलिए नहीं हुई थी कि फ्रांस एक गरीब, शोषित और उत्पीड़ित देश था बल्कि वहां क्रांति इसलिए संभव हुई, क्योंकि वहां एक जागरूक मध्यवर्ग पैदा हो गया था, जो अपनी आर्थिक नहीं, सामाजिक वंचनाओं के प्रति जागरूक था। इसी से साबित हुआ था कि मनुष्य को आर्थिक से अधिक सामाजिक न्याय की आकांक्षा होती है। यही बात अमेरिकी क्रांति तथा बीसवीं शताब्दी में हुई रूसी क्रांति मंे भी दिखाई पड़ती है, जहां लोग शोषित से अधिक अपमानित महसूस करने लगे थे। यही कारण है कि डाॅ. आम्बेडकर ने भारत की जनता को अपने प्रति हो रहे अन्याय, शोषण एवं उत्पीड़न के लिये जागरूक किया।
डाॅ. भीमराम आम्बेडकर जातिवाद एवं दलित शोषण के सख्त खिलाफ थे, लेकिन इससे भी आगे वे आधुनिक भारत का, विकसित एवं शक्तिशाली भारत का निर्माण चाहते थे। सामाजिक समानता के लिए वे प्रयत्नशील हो उठे। आम्बेडकर ने ‘ऑल इण्डिया क्लासेस एसोसिएशन’ का संगठन किया। दक्षिण भारत में बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में गैर-ब्राह्मणों ने ‘दि सेल्फ रेस्पेक्ट मूवमेंट’ प्रारम्भ किया जिसका उद्देश्य उन भेदभावों को दूर करना था जिन्हें ब्राह्मणों ने उन पर थोप दिया था। सम्पूर्ण भारत में दलित जाति के लोगों ने उनके मन्दिरों में प्रवेश-निषेध एवं इस तरह के अन्य प्रतिबन्धों के विरुद्ध अनेक 
आन्दोलनों का सूत्रपात किया। परन्तु विदेशी शासन काल में अस्पृश्यता
विरोधी संघर्ष पूरी तरह से सफल नहीं हो पाया। विदेशी शासकों को इस बात का भय था कि ऐसा होने से समाज का परम्परावादी एवं रूढ़िवादी वर्ग उनका विरोधी हो जाएगा। अतः क्रान्तिकारी समाज-सुधार का कार्य केवल स्वतन्त्र भारत की सरकार ही कर सकती थी। सामाजिक पुनरुद्वार की समस्या राजनीतिक एवं आर्थिक पुनरुद्वार की समस्याओं के साथ गहरे तौर पर जुड़ी हुई थी। जैसे, दलितों के सामाजिक पुनरुत्थान के लिए उनका आर्थिक पुनरुत्थान आवश्यक था। इसी प्रकार इसके लिए उनके बीच शिक्षा का प्रसार और राजनीतिक अधिकार भी अनिवार्य थे। लेकिन स्वतंत्र भारत में राजनीतिक दलों ने अपने स्वार्थों के लिये उनके दृष्टिकोण एवं चिन्तन को गलत अर्थ में प्रस्तुति दी।
डाॅ. आम्बेडकर कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। येओला नासिक में 13 अक्टूबर 1935 को आम्बेडकर ने एक रैली को संबोधित किया। इसी दिन आम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानाचार्य नियुक्त किया गया और इस पद पर उन्होंने दो वर्ष तक कार्य किया। इसके चलते आम्बेडकर बंबई में बस गये, उन्होंने यहाँ एक बडे़ घर का निर्माण कराया, जिसमें उनके निजी पुस्तकालय में 50000 से अधिक पुस्तकें थीं। इसी वर्ष उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई। आम्बेडकर ने 1936 में स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो 1937 में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों में 15 सीटें जीती।
1920 के दशक में बंबई में एक बार बोलते हुए डाॅ. भीमराम आम्बेडकर ने साफ-साफ कहा था जहाँ मेरे व्यक्तिगत हित और देशहित में टकराव होगा वहाँ मैं देश के हित को प्राथमिकता दूँगा, लेकिन जहाँ दलित जातियों के हित और देश के हित में टकराव होगा, वहाँ मैं दलित जातियों को प्राथमिकता दूँगा। वे अंतिम समय तक दलित-वर्ग के मसीहा थे और उन्होंने जीवनपर्यंत अछूतोद्धार के लिए कार्य किया। उन्होंने अपने लेखन एवं कार्यक्रमों में अनेक ऐसे सूत्र दिए हैं जिनके आधार पर भारतीय इतिहास को हम पूंजीवादी विवेचकों के दुष्प्रभाव से मुक्त कर सकते हैं। उनकी एक क्रांतिकारी स्थापना यह है कि इंग्लैंड किसी तरह व्यापार में भारत से स्पर्धा न कर सकता था और माल तैयार करने वाले देश के रूप में भारत इंग्लैंड से बढ़ कर था। अंग्रेजी शासनतंत्र के विवेचन में आम्बेडकर ने अनेक ऐसे तथ्य दिए हैं जिनसे प्रमाणित होता है, अंग्रेजों ने जाति-बिरादरी की प्रथा को और कठोर बनाया, उन्होंने यहाँ का व्यापार नष्ट किया, शहरों के उद्योग-धंधे तबाह किए। लाखों कारीगर शहर छोड़कर देहात में जा बसे, वहां जमींदारों की बेगार करने पर बाध्य हुए।
डाॅ. भीमराम आम्बेडकर ने आर्थिक रूप से विपन्न और शोषित समुदाय में सामाजिक न्याय के लिए एक चेतना पैदा की। उनकी मुख्य छवि दलित मसीहा की बनकर रह गई। उनको मुख्यतः संविधान निर्माता के रूप में ही सराहा जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि वे अपने मनोनुकूल संविधान नहीं बना पाये। यदि वे जैसा चाहते, वैसा संविधान बनाते तो भारत में गरीबी नहीं होती, जातिवाद नहीं होता, अस्पृश्यता नहीं होती, दलित नहीं होते। उन्होंने भारत के शासक समुदायों को स्वीकार्य होने वाला संविधान बनाया। उसमें शासकों की सुविधा और सुरक्षा के लिए अब सैकड़ों संविधान संशोधन किए जा चुके हैं। पर आज भी गांधीजी के शब्दों में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के आंसू पोंछने की गारंटी नहीं है। हमें याद रखना चाहिए कि संविधान निर्माता ने भारत में कानून मंत्री के पद से असंतुष्ट होकर इस्तीफा दे दिया था।
आज की दुनिया में दलितों और उत्पीड़तों की आवाज बुलंद करने वाले सबसे बड़े नाम दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला और संयुक्त राज्य अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग के हैं। मेरे विचार से विश्व परिप्रेक्ष्य में भी डाॅ. आम्बेडकर की अर्थवत्ता इन दोनों से भी बड़ी है। ऐसे दलितों के महानायक का 6 दिसम्बर 1956 को दिल्ली में उनके घर में महापरिनिर्वाण हो गया। उनका 7 दिसंबर को मुंबई में दादर चैपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया जिसमें उनके लाखों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लेकर अपने महानायक को अन्तिम विदाई दी।

छह दिसंबर 1992- शौर्य दिवस या काला दिन? उस दिन सिर्फ मस्ज़िद ही नहीं और भी बहुत कुछ टूटा था!

    


छ: दिसंबर 1992 शौर्य दिवस या काला दिन? अयोध्या में तहजीब के मर जाने की कहानी?

 एक आम इंसाफ और अमन पसंद हिन्दुस्तानी की हैसियत से जब इस सवाल का जवाब ढूँढने की कोशिश करता हूँ तो कुछ और सवाल ज़ेहन में उठते हैं, जैसे:
1- हमारी जानकारी के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास जी ने महाराजा अकबर के काल में राम चरित्र मानस (रामायण) की रचना की। उनके इस पुनीत कार्य में बादशाह द्वारा विघ्न डाले जाने का कहीं कोई वर्णन नहीं मिलता। आज भारत में तुलसीदास जी की रामायण ही ज्यादा लोकप्रिय है।
2- अब तो तुलसी भी गलत लगने लगे हैं जो 1528 के आसपास ही जन्मे थे। लोग कहते हैं कि 1528 में ही बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई। तुलसी ने तो देखा या सुना होगा उस बात को? बाबर राम के जन्म स्थल को तोड़ रहा था और तुलसी लिख रहे थे “मांग के खाइबो मसीत (मस्जिद) में सोइबो”। और फिर उन्होंने रामायण लिखा डाली। राम मंदिर के टूटने का और बाबरी मस्जिद बनने का क्या तुलसी को जरा भी अफसोस न रहा होगा? मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन की हर छोटी बड़ी घटना को लिपिबध्द करने वाले तुलसी दास जी ने रामायण में रामजन्म भूमि पर आक्रमण(?) की इतनी बड़ी घटना को लिपिबध्द क्यों नहीं किया?
3- क्या अयोध्या सिर्फ हमारे हिन्दु भाईयों के लिये ही आस्था का केन्द्र है? मुसलमानों के लिये “हज़रत शीश पैगम्बर की समाधि” के कारण आस्था केन्द्र नहीं ?
4- कहते हैं अयोध्या में राम जन्मे, वहीं खेले कूदे बड़े हुए। बनवास भेजे गए। लौट कर आए तो वहां राज भी किया। उनकी जिंदगी के हर पल को याद करने के लिए एक मंदिर बनाया गया। जहां खेले, वहां गुलेला मंदिर है। जहां पढ़ाई की वहां वशिष्ठ मंदिर हैं। जहां बैठकर राज किया वहां मंदिर है। जहां खाना खाया वहां सीता रसोई है। जहां भरत रहे वहां मंदिर है। हनुमान मंदिर है। कोप भवन है। सुमित्रा मंदिर है। दशरथ भवन है। ऐसे बीसीयों मंदिर हैं और इन सबकी उम्र 400-500 साल है। यानी ये मंदिर तब बने जब हिंदुस्तान पर मुगल या मुसलमानों का राज रहा। अजीब है न! कैसे बनने दिए होंगे मुसलमानों ने ये मंदिर! उन्हें तो मंदिर तोड़ने के लिए याद किया जाता है? उनके रहते एक पूरा शहर मंदिरों में तब्दील होता रहा और उन्होंने कुछ नहीं किया। कैसे अताताई थे वे, जो मंदिरों के लिए जमीन दे रहे थे?
5- शायद वे लोग झूठे होंगे जो बताते हैं कि जहां गुलेला मंदिर बनना था उसके लिए जमीन मुसलमान शासकों ने ही दी? दिगंबर अखाड़े में रखा वह दस्तावेज भी गलत ही होगा जिसमें लिखा है कि मुसलमान राजाओं ने मंदिरों के बनाने के लिए 500 बीघा जमीन दी? निर्मोही अखाड़े के लिए नवाब सिराजुदौला के जमीन देने की बात भी सच नहीं ही होगी? सच तो बस बाबर है और उसकी बनवाई बाबरी मस्जिद?
6- अयोध्या में सच और झूठ अपने मायने खो चुके हैं। मुसलमान पांच पीढ़ी से वहां फूलों की खेती कर रहे हैं। उनके फूल सब मंदिरों पर उनमें बसे देवताओं पर, राम पर चढ़ते रहे। मुसलमान वहां खड़ाऊं बनाने के पेशे में जाने कब से हैं। ऋषि मुनि, संन्यासी, राम भक्त सब मुसलमानों की बनाई खड़ाऊं पहनते रहे। सुंदर भवन मंदिर का सारा प्रबंध चार दशक तक एक मुसलमान के हाथों में रहा। 1949 में इसकी कमान संभालने वाले मुन्नू मियां 23 दिसंबर 1992 तक इसके मैनेजर रहे। जब कभी लोग कम होते और आरती के वक्त मुन्नू मियां खुद खड़ताल बजाने खड़े हो जाते तब क्या वह सोचते होंगे कि अयोध्या का सच क्या है और झूठ क्या?
7- अग्रवालों के बनवाए एक मंदिर की हर ईंट पर 786 लिखा है। उसके लिए सारी ईंटें राजा हुसैन अली खां ने दीं. किसे सच मानें? क्या मंदिर बनवाने वाले वे अग्रवाल सनकी थे या दीवाना था वह हुसैन अली खां जो मंदिर के लिए ईंटें दे रहा था? इस मंदिर में दुआ के लिए उठने वाले हाथ हिंदू या मुसलमान किसके हों, पहचाना ही नहीं जाता। सब आते हैं। एक नंबर 786 ने इस मंदिर को सबका बना दिया।
8- शाश्वत सत्य है कि सुबूत मुजरिम मिटाता है, इस विवाद के सुबूत किसने और क्यों मिटाए?
9- देश के लोकतंत्र, संविधान, न्यायपालिका, कार्यपालिका आदि संस्थानों के साथ विश्वास्घात किसने किया? इनकी धज्जियाँ उड़ाना "काला दिन" क्यों नहीं?
10- एक खस्ताहाल इमारत को शासन और प्रशासन के संरक्षण ज़मींदोज़ कर देना,किस प्रकार के शौर्य की श्रेणी में आता है?
11- पिछले तैइस वर्षों से तथाकथित रामज़ादों की करतूत के कारण ही मर्यादा पुरुषोत्तम राम तम्बू में विराजमान हैं और खराब तम्बू को बदलने का निर्णय भी न्यायालय द्वारा लिया जा रहा है। आस्था के नाम पर देश के संविधान, न्यायपालिका तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं को नकारने वालों की आस्था अब कहाँ चली गयी है?
12- राम जी की इस बदहाली के ज़िम्मेदार और सत्ता प्राप्त कर उनसे विश्वासघात करने वाले क्या हैं?
13- क्या बस छह दिसंबर 1992 ही सच है, कौन जाने? छह दिसंबर 1992 के बाद सरकार ने अयोध्या के ज्यादातर मंदिरों को अधिग्रहण में ले लिया। वहां ताले पड़ गए। आरती बंद हो गई। लोगों का आना जाना बंद हो गया। बंद दरवाजों के पीछे बैठे देवी देवता क्या कोसते नहीं होंगे, कभी उन्हें जो एक गुंबद पर चढ़कर राम को छू लेने की कोशिश कर रहे थे? सूने पड़े हनुमान मंदिर या सीता रसोई में उस खून की गंध नहीं आती होगी, जो राम के नाम पर अयोध्या और भारत में बहाया गया? अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी है. अयोध्या एक तहजीब के मर जाने की कहानी है।
14- प्यारे देश वासियो, राममन्दिर अयोध्या में नहीं तो कहाँ बनेगा? लेकिन "लत्ते को सांप" बनाकर देश और समाज के सामने जो गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए गये हैं, उनके सही उत्तर तो ढूँढने ही होंगे। तभी तथाकथित रामज़ादों और (ह)रामज़ादों का सही चेहरा सामने आयेगा। 
शीर्षस्थ उपन्यासकार स्वर्गीय कमलेश्वर के सन् 2000 में प्रकाशित बहुचर्चित उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ की चर्चा करना समीचीन होगा,  जिसमें तथ्यों के हवाला देते हुए बताया गया है कि अयोध्या में न कभी बाबरी मस्जिद नाम की मस्जिद थी और न ही राम मंदिर।
कहने का मतलब अयोध्या में जिस विवादित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद को लेकर सन् 1949 से देश में विवाद और दंगे-फ़साद हो रहे हैं, जिसके चलते लाखों हिंदू और मुसलमान आज भी एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं, वहां न बाबरी मस्जिद थी और न ही राम मंदिर। क़िताब का सारांश यह है कि भारत में हिंदू और मुसलमानों में विवाद की बीज अंग्रेज़ों ने एक साज़िश के तहत बोया था, जिसकी परिणति सन् 1947 में देश के विभाजन के रूप में हुई थी।
कमलेश्वर ने इस उपन्यास पर काम रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के बाद किया था और 10-12 साल के रिसर्च, स्टडी और ऐतिहासिक तथ्यों की छनबीन के बाद ‘कितने पाकिस्तान’ को लिखा है। उन्होंने क़िताब में बताने की कोशिश की है कि वहां बाबरी मस्जिद या राम मंदिर नहीं था।
उपन्यास को नामवर सिंह, विष्णु प्रभाकर, अमृता प्रीतम, राजेंद्र यादव, हिमांशु जोशी और अभिमन्यु अनत जैसे साहित्यकारों-लेखकों ने विश्व-उपन्यास कहते हुए उसकी जमकर तारीफ की थी। उस समय क़रीब-क़रीब हर प्रमुख हिंदी ही नहीं अंग्रेज़ी अख़बार में इसकी समीक्षा भी छपी थी।
अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में क़िताब को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। उस समय एचआरडी मिनिस्टर हिंदुत्व और राम मंदिर आंदोलन के पैरोकार डॉ. मुरली मनोहर जोशी थे। ज़ाहिर है अगर कमलेश्वर के निष्कर्ष से सरकार को किसी भी तरह की आपत्ति होती, तो कम से कम क़िताब को सरकारी पुरस्कार नहीं दिया जाता। अमूमन यह माना जाता है कि कोई सरकार किसी क़िताब को पुरस्कृत तब करती है जब वह सरकार क़िताब में लिखी हर बात से सहमत होती है।
कमलेश्वर ने बड़ी ख़ूबसूरती से समय और किरदार की सीमाओं से परे ‘कितने पाकिस्तान’ की रचना की है। मुख्य किरदार अदीब यानी लेखक ‘समय की अदालत’ लगाता है, जिसमें महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू, अली बंधु, लार्ड माउंटबेटन, बाबर, हुमायूं, औरंगजेब, कबीर जैसे सैकड़ों ऐतिहासिक किरदारों ने ख़ुद अपने-अपने बयान दर्ज कराए हैं।
यही नहीं अदालत में कई दर्जन विश्व-प्रसिद्ध इतिहासकारों ने भी हर विवादास्पद घटनाओं पर अपना बयान दिया है। सभी बयानात इतिहास, अंग्रेज़ों द्वारा तैयार गजेटियर, पुरातात्विक दस्तावेज़ों और नामचीन हस्तियों की आत्मकथाओं में उपलब्ध जानकारियों पर आधारित हैं। इनकी प्रमाणिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता।
‘कितने पाकिस्तान’ में कई चैप्टर अयोध्या विवाद को समर्पित हैं। उपन्यास के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद बाबर के भारत पर आक्रमण करने से पहले ही मौजूद थी। बाबर 20 अप्रैल 1526 को इब्राहिम का सिर क़लम करके आगरा की गद्दी पर बैठा था और हफ़्ते भर बाद 27 अप्रैल 1526 को उसके नाम का ख़ुतबा पढ़ा गया।
क़िताब के मुताबिक, अयोध्या की मस्जिद (बाबरी मस्जिद नहीं)  में एक शिलालेख बनाया गया था, जिसका जिक्र ब्रिटिश अफ़सर ए फ़्यूहरर ने कई जगह किया है। फ़्यूहरर ने 1889 में आख़िरी बार उस शिलालेख को पढ़ा था, जिसे बाद में अंग्रेज़ों ने नष्ट करवा दिया। शिलालेख के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद का निर्माण इब्राहिम लोदी के शासन में उसी के आदेश पर 1523 में शुरू हुआ और 1524 में मस्जिद पूरी हुई।
इतना ही नहीं, शिलालेख के मुताबिक, मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर नहीं, बल्क़ि ख़ाली जगह पर बनाई गई थी। इसका यह भी मतलब होता है कि अगर विवादित स्थल पर राम या किसी दूसरे देवता का मंदिर था, जिसके अवशेष खुदाई करने वालों को मिले हैं, तो वह 14वीं सदी से पहले नेस्तनाबूद कर दिया गया होगा या ख़ुद ही नष्ट हो गया होगा। उसे कम से कम बाबर या मीरबाक़ी ने नहीं तोड़वाया जैसा कि इतिहासकारों का एक बड़ा तबक़ा और हिंदूवादी नेता दावा करते आ रहे हैं।
दरअसल, ‘कितने पाकिस्तान’ के मुताबिक लोदी के शिलालेख को नष्ट करने में अंग्रेज़ अफ़सर एचआर नेविल ने अहम भूमिका निभाई। सारी ख़ुराफ़ात और साज़िश का सूत्राधार नेविल ही था। बाद में उसने ही आधिकारिक तौर पर फ़ैज़ाबाद का गजेटियर तैयार किया था। नेविल की साज़िश में एक और दूसरा गोरा अफ़सर कनिंघम भी शामिल था, जिसे ब्रिटिश हुक़ूमत ने हिंदुस्तान की पुरानी इमारतों की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी दी थी। कनिंघम ने बाद में लखनऊ का गजेटियर तैयार किया था।
क़िताब के मुताबिक दोनों अफ़सरों ने धोखा और साज़िश के तहत गजेटियर में दर्ज किया कि 1528 में अप्रैल से सितंबर के बीच एक हफ़्ते के लिए बाबर अयोध्या आया और राम मंदिर को तोड़कर वहां बाबरी मस्जिद नींव रखी। यह भी लिखा कि अयोध्या पर हमले के दौरान लड़ाई में बाबर की सेना ने एक लाख चौहत्तर हज़ार हिंदुओं को मार दिया।
फ़ैज़ाबाद के गजेटियर में आज देखें तो मिलेगा कि 1869 में, बाबर के कथित आक्रमण के क़रीब साढ़े तीन सौ साल बाद, अयोध्या-फ़ैज़ाबाद की आबादी महज़ दस हज़ार थी, जो 1881 में बढ़कर साढ़े ग्यारह हज़ार हो गई। सवाल उठता है कि जिस शहर की आबादी इतनी कम थी वहां बाबर या उसकी सेना ने इतने लोगों की हत्या कैसे की या फिर इतने मरने वाले कहां से आ गए? यहीं तथ्य बाबरी मस्जिद के बारे में देश में बनी मौजूदा धारणा पर गंभीर संदेह होता है।
हैरान करने वाली बात है कि दोनों अफ़सरों नेविल और कनिंघम ने सोची-समझी नीति के तहत बाबर की डायरी बाबरनामा, जिसमें वह रोज़ाना अपनी गतिविधियां दर्ज करता था, के 3 अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 के बीच 20 से ज़्यादा पन्ने ग़ायब कर दिए और बाबरनामा में लिखे ‘अवध’ यानी‘औध’ को ‘अयोध्या’ कर दिया। मगर मस्जिद के शिलालेख के फ़्यूहरर के अनुवाद को ग़ायब करना ये दोनों अफ़सर भूल गए। वह अनुवाद आज भी आर्कियोलॉजीकल इंडिया की फ़ाइल में महफ़ूज़ है और ब्रितानी साज़िश को बेनकाब करता है।
इतना ही नहीं बाबर के मूवमेंट की जानकारी बाबरनामा की तरह हुमायूंनामा में भी दर्ज है। लिहाज़ा, बाबरनामा के ग़ायब किए गए पन्ने से नष्ट सूचनाएं हुमायूंनामा से ली जा सकती हैं। हुमायूंनामा के मुताबिक 1528 में बाबर अफ़गान हमलावरों का पीछा करता हुआ सरयू नदी तक ज़रूर गया था,  लेकिन उसी समय उसे अपनी बीवी बेग़म मेहम और अन्य खातूनों और बेटी बेग़म ग़ुलबदन समेत पूरे परिवार के काबुल से अलीगढ़ पहुंचने की इत्तिला मिली।
लंबे समय से युद्ध में उलझने की वजह से बाबर अपने परिवार से मिल नहीं पाया था, इसलिए वह फौरन अलीगढ़ रवाना हो गया और पत्नी-बेटी और परिवार के बाक़ी सदस्यों को लेकर आगरा आया। 10 जुलाई तक बाबर उनके साथ आगरा में ही रहा। उसके बाद बाबर परिवार के साथ धौलपुर चला गया। वहां से सिकरी पहुंचा, जहां सितंबर के दूसरे हफ़्ते तक रहा।
क़िताब के मुताबिक, गोस्वामी तुलसीदास से पहले जंबूद्वीप (तब भारत या हिंदुस्तान था ही नहीं सो इस भूखंड को जंबूद्वीप कहा जाता था) के हिंदू धर्म के अनुयायी नटखट कृष्ण, शंकर जी और हनुमान जी की पूजा किया करते थे। कहीं-कहीं गणेश की पूजा होती थी। तब राम का उतना क्रेज नहीं था। तुलसीदास सन् 1498 में पैदा हुए थे और बाबर के कार्यकाल तक वह किशोर ही थे।
वहीं पत्नी के दीवाने तुलसीदास अपनी मायावी दुनिया में मशगूल थे। उन्‍होंने रामचरित मानस की रचना बुढापे में की, जो हुमायूं और अकबर का दौर था। राम का महिमामंडन तो तुलसीदास ने किया और हिंदी (अवधी) में रामचरित मानस रचकर राम को हिंदुओं के घर-घर स्थापित कर दिया। रामचरित मानस के प्रचलन में आने के बाद ही राम हिंदुओं आराध्‍य हुए।
‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर ने ऐतिहासिक तथ्यों का सहारा लेकर दावा किया है कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ चौकन्ने हो गए थे और ब्रिटिश इंडिया की नई पॉलिसी बनी, जिसके मुताबिक अंग्रेज़ों ने तय किया कि अगर इस उपमहाद्वीप पर लंबे समय तक शासन करना है, तो इसे धर्म के आधार पर विभाजित करना होगा। ताकि हिंदू और मुसलमान एक दूसरे से ही लड़ते रहें और उनका ध्यान आज़ादी जैसे मुद्दों पर न जाए। इसी नीति के तहत लोदी की मस्जिद ‘बाबरी मस्जिद’ बना दी गई और उसे ‘राम मंदिर’ से जोड़कर ऐसा विवाद खड़ा कर दिया जो कभी हल ही नहीं हो। अंग्रेज़ निश्चित रूप से सफल रहे क्योंकि उस वक़्त पैदा की गई नफ़रत ही अंततः देश के विभाजन की मुख्य वजह बनी।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के पांच 'सूत्रधार'

लाल कृष्ण आडवाणी

सीबीआई की मूल चार्जशीट के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी नेता लाल कृष्ण आडवाणी अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद गिराने के 'षड्यंत्र' के मुख्य सूत्रधार हैं जो अक्टूबर 1990 में शुरू होकर दिसंबर 1992 तक चला बताया गया है.
अभियोजन पक्ष का तर्क है कि बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि ढांचे का विवाद काफी समय से चला आ रहा है, जो अदालत में लंबित है. हिंदुओं के अनुसार राम जन्मभूमि पर मीर बाकी ने मस्जिद का निर्माण किया था.
विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या, काशी और मथुरा के मंदिरों को मुक्त करने का अभियान चलाया और इसके अंतर्गत लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा की.
शिव सेना नेता बाल ठाकरे ने मुंबई के दादर में आडवाणी का स्वागत किया. उसी दिन लाल कृष्ण आडवाणी ने पंचवटी में घोषणा की थी कि बाबरी मस्जिद कभी भी मस्जिद नही रही और हिंदू संगठन प्रत्येक दशा में अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए दृढ संकल्प हैं. ठाकरे ने इस कार्य में साथ देने का वादा किया.
चार्जशीट के अनुसार 1991 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस योजना मे सक्रिय साथ दिया.
पांच दिसंबर 1992 को अयोध्या मे भाजपा नेता विनय कटियार के घर पर एक गोपनीय बैठक हुई, जिसमें विवादित ढांचे को गिराने का अंतिम निर्णय लिया गया.
आडवाणी ने छह दिसंबर को कहा था, "आज कारसेवा का आखिरी दिन है. कारसेवक आज आखिरी बार कारसेवा करेंगे."
जब उन्हें पता चला कि केन्द्रीय बल फैजाबाद से अयोध्या आ रहा है तब उन्होंने जनता से राष्ट्रीय राजमार्ग रोकने को कहा. अभियोजन पक्ष का यह भी कहना है कि आडवाणी ने कल्याण सिंह को फोन पर कहा कि वे विवादित ढांचा पूर्ण रूप से गिराए जाने तक अपना त्यागपत्र न दें.
आडवाणी ने राम कथा अकुंज के मंच से चिल्लाकर कहा कि "जो कार सेवक शहीद होने आए हैं, उन्हें शहीद होने दिया जाए."
आडवाणी पर आरोप है कि उन्होंने यह भी कहा कि, “मंदिर बनाना है, मंदिर बनाकर जाएंगे. हिंदू राष्ट्र बनाएंगे.”
स्थानीय प्रशासन ने विवादित ढांचा गिराए जाने से रोकने का कोई प्रयास नही किया इसलिए अभियोजन के अनुसार तत्कालीन जिला जिला मजिस्ट्रेट आरएन श्रीवास्तव और पुलिस अधीक्षक डीबी राय इस 'षड्यंत्र' में शामिल थे. इनमें से राय का अब निधन हो चुका है.
लेकिन हाई कोर्ट के आदेश के तहत आडवाणी पर फिलहाल बाबरी मस्जिद गिराने के षड्यंत्र में शामिल होने का पहला मुकदमा नही चल रहा है.
आडवाणी तथा उनके सात अन्य सहयोगियों पर रायबरेली की अदालत में केवल मुस्लिम समुदाय के खिलाफ विद्वेष भड़काने वाल भाषण देकर कारसेवकों को उकसाने का आरोप है, जिसके फलस्वरूप मस्जिद गिरा दी गई.
आडवाणी और उनके साथियों ने अदालत में सभी आरोपों से इनकार किया है.

कल्याण सिंह

कल्याण सिंह उन तेरह लोगों में हैं, जिन पर मूल चार्जशीट में मस्जिद गिराने के 'षड्यंत्र' में शामिल होने का आरोप है, लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से अभी मुकदमा नही चल रहा है.
सीबीआई की मूल चार्जशीट के मुताबिक़ 1991 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कल्याण सिंह ने डॉ. मुरली मनोहर जोशी और अन्य नेताओं के साथ अयोध्या जाकर शपथ ली थी कि विवादित स्थान पर ही मंदिर का निर्माण होगा. उन्होंने नारा लगाया , “राम लला हम आए हैं, मंदिर यहीं बनाएंगे.”
केंद्र सरकार ने 195 कंपनी केन्द्रीय पैरा मिलिटरी फ़ोर्स कानून व्यवस्था में मदद के लिए भेजी, लेकिन भाजपा सरकार ने उसका उपयोग नही किया. पांच दिसंबर को उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव गृह ने केन्द्रीय बल का प्रयोग करने का सुझाव दिया, लेकिन कल्याण सिंह इससे सहमत नही हुए.
कल्याण सिंह ने मस्जिद की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में दिए गए आश्वासन का पालन नही किया, जबकि उन्होंने संविधान और देश के कानून की सुरक्षा की शपथ ली थी.
कल्याण सिंह घटना के समय अयोध्या में उपस्थित नही थे, फिर भी उन्हें षड्यंत्र में शामिल बताया गया.
चार्जशीट के अनुसार कल्याण सिंह ने छह दिसंबर के बाद अपने बयानों में स्वीकार किया कि गोली न चलाने का आदेश उन्होंने ही जारी किया था और उसी वजह से प्रशासन का कोई अधिकारी दोषी नही माना जाएगा.
कल्याण सिंह ने सभी आरोपों से इनकार किया है.

अशोक सिंघल

विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल अयोध्या के विवादित स्थल पर राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण आंदोलन के प्रमुख स्तंभ रहे हैं.
चार्जशीट के अनुसार अशोक सिंघल 20 नवंबर 1992 को बाल ठाकरे से मिले और उन्हें कारसेवा में भाग लेने का निमंत्रण दिया.
चार दिसंबर 1992 को बाल ठाकरे ने शिव सैनिकों को अयोध्या जाने का आदेश दिया.
शिव सेना नेता जय भान सिंह पवैया ने अशोक सिंघल से चंबल घाटी में प्रशिक्षित मौत दस्ता तैनात करने के लिए कहा.
अशोक सिंघल ने यह भी कहा था कि छह दिसंबर की कारसेवा में मस्जिद के ऊपर मीर बाक़ी का शिलालेख हटाया जाएगा, क्योंकि यही अकेला चिन्ह मस्जिद के संबंध में है.
दूसरे दिन पांच दिसंबर को अशोक सिंघल ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा था "जो भी मंदिर निर्माण में बाधा आए गी उसको हम दूर कर देंगे. कार सेवा केवल भजन कीर्तन के लिए नही है बल्कि मंदिर के निर्माण कार्य को प्रारम्भ करने के लिए है."
चार्जशीट में अशोक सिंघल पर आरोप है कि वो छह दिसंबर को राम कथा कुंज पर बने मंच से अन्य अभियुक्तों के साथ- साथ कारसेवकों से नारा लगवा रहे थे कि "राम लला हम आए हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे. एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो."
जब बाबरी मस्जिद ढहाई जा रही थी तो अभियुक्त हर्षित थे और मंच पर उपस्थित लोगों के साठ उत्साहित होकर मिठाई बांटी जा रही थी. अभियुक्तों के भाषण से उत्तेजित होकर पहले बाबरी मस्जिद ढहाई गई और उसी दिन अयोध्या में स्थित मुसलमानों के घरों को तोड़ा गया, जलाया गया, मस्जिदें और कब्रें तोडी गईं. इससे मुसलमानों में भय उत्पन्न हुआ और वे अयोध्या छोड़ जाने को बाध्य हुए.
रायबरेली में चल रहे केस नम्बर 198 के सभी अभियुक्तों, विशेषकर उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा पर ऐसे आरोप हैं. सभी अभियुक्त ने आरोपों से इनकार किया है.

विनय कटियार

विनय कटियार की पहचान विश्व हिंदू परिषद के सहयोगी संगठन बजरंग दल के नेता के रूप में रही है. वह अपने उग्र और विवादस्पद बयानों के लिए जाने जाते रहे हैं.
चार्जशीट के अनुसार 14 नवंबर 1992 को विनय कटियार ने अयोध्या में कहा कि बजरंग दल का आत्मघाती दस्ता कार सेवा करने को तैयार है, और छह दिसंबर को मौत दस्ता शिवाजी की रणनीति अपनाएगा.
विवादित मस्जिद गिरने से एक दिन पूर्व पांच दिसंबर को अयोध्या में विनय कटियार के घर पर एक गोपनीय बैठक हुई, जिसमे आडवाणी के अलावा शिव सेना नेता पवन पांडे मौजूद थे. इसी बैठक में विवादित ढांचे को गिराने का अंतिम निर्णय लिया गया.
चार्जशीट के अनुसार कटियार ने छह दिसंबर को अपने भाषण में कहा था, “हमारे बजरंगियों का उत्साह समुद्री तूफान से भी आगे बढ़ चुका है, जो एक नही तमाम बाबरी मस्जिदों को ध्वस्त कर देगा."

मुरली मनोहर जोशी

मुरली मनोहर जोशी आडवाणी के बाद भारतीय जनता पार्टी के दूसरे बड़े नेता हैं जो राम मंदिर आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिसा लेते रहे हैं.
जोशी छह दिसंबर को विवादित परिसर में मौजूद थे. चार्जशीट के अनुसार मस्जिद का गुम्बद गिरने पर उमा भारती आडवाणी और डॉ. जोशी के गले मिल रही थीं.
मुरली मनोहर जोशी के बारे में अभियोजन पक्ष की ओर से कहा गया है कि वे और आडवाणी कार सेवा अभियान के लिए मथुरा और काशी होते हुए दिल्ली से अयोध्या के लिए चले.
इन सभी पर आरोप है कि 28 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट से प्रतीकात्मक कारसेवा का निर्णय हो जाने के बाद भी इन लोगों ने पूरे प्रदेश में सांप्रदायिकता से ओतप्रोत भाषण दिए.
इन उत्तेजनात्मक भाषणों से धर्मनिरपेक्ष भारत में सांप्रदायिक जहर घोला गया.

हालांकि यह ज़िक्र करना समीचीन होगा कि चार साल पहले ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी माना था कि अयोध्या में राम मंदिर को बाबर और उसके सूबेदार मीरबाक़ी ने 1528 में मिसमार करके वहां बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया। मीरबाक़ी का पूरा नाम मीरबाक़ी ताशकंदी था और वह अयोध्या से चार मील दूर सनेहुआ से सटे ताशकंद गांव का निवासी था। इसी तथ्य को आधार बनाकर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सितंबर में बहुप्रतीक्षित ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया था।
जिसमे विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटने का निर्देश दिया था।