Shamsher ALI Siddiquee

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गांधी @150 : आज जब पूरा विश्व अहिंसा दिवस मना रहा है गांधी के अपने देश में लोग मॉब लीनचिंग के शिकार हो रहे हैं! क्या थी उनकी सोच कश्मीर, गोरक्षा, मॉब लिंचिंग, अंतर-धार्मिक विवाह पर आईये जानते हैं

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महात्मा गांधी ने एक आज़ाद और आत्मनिर्भर भारत का सपना देखा था. और यह सपना केवल किसी सैद्धांतिक या दार्शनिक बुनियाद पर नहीं खड़ा किया गया था. यह एक व्यावहारिक परियोजना जैसी थी.
भारत का मतलब था भारत के लोग. सभी धर्मपंथों, क्षेत्रों, भाषाओं और जातियों के लोग. समानता, बंधुत्व और मानवीय गरिमा की भावना से ओत-प्रोत पुरुष, महिला और बच्चे तक को इस राष्ट्र के निर्माण में भागीदारी करनी थी. इसी से एक सेकुलर भारत को बनना था. दुनिया के लिए एक उत्कृष्ट उदाहरण बनना था.
लेकिन भारत इन मोर्चों पर आज कहां खड़ा है? आज अगर गांधी प्रकट होकर भारत की परीक्षा लेते तो उसे कितने अंक हासिल होते? और भारत ख़ुद अपनी नज़र में स्वयं को कितना अंक दे रहा होता? ये सब कुछ प्रश्न हैं. समस्याएं तो पूरी दुनिया के सामने मुंह बाए खड़ी हैं. लेकिन उन व्यापक समस्याओं से एकजुट होकर लड़ने की बजाए भारतीय समाज के कुछ तत्व आज ख़ुद भारत के लिए समस्याएं खड़ी करने में लगे हैं.
भले ही ऊपर-ऊपर से ये समस्याएं राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रकार की दिखती हों, लेकिन यह वास्तव में एक वैचारिक और अस्तित्ववादी संकटों का रूप लेते जा रहे हैं.

कश्मीर का असली राजा कौन?
कश्मीर में सब कुछ शांत है. भारत का समाज अब जबरिया ख़ामोशी को शांति समझने लगा है. पहले यहां के पत्रकारों के लिए यह वाक्य एक तकिया कलाम जैसा था कि 'स्थिति तनावपूर्ण, लेकिन नियंत्रण में है.'
अब राज्य-व्यवस्था ने सोचा कि 'तनावपूर्ण' कहते रहने से ब्रैंडिंग ठीक से नहीं होती. तो कहा कि इसे हटाओ और अब सीधे-सीधे बस इतना कहो कि स्थिति पूरी तरह 'नियंत्रण' में है. कश्मीर के लोग बल-प्रयोग के ज़रिए फ़ौरी तौर पर नियंत्रण में हैं. और शेष भारत की जनता प्रचार-माध्यमों के ज़रिए नियंत्रण में है.
ऐसे में गांधी होते तो क्या करते नहीं मालूम. लेकिन वह उस नाज़ुक दौर में कश्मीर को गले लगाने गए थे जब लोगों को लगता था कि अंग्रेज़ या कश्मीर के राजा से बस काग़ज़ी क़रार करके किसी भी ऐसे रियासत को अपना हिस्सा बनाया जा सकता है.
राज्य-व्यवस्था ऐसे ही सोचने की आदी होती है. यह एक दूरगामी ग़लती साबित हो सकती थी, जिसे गांधी तभी समझ गए थे. इसलिए उन्होंने कहा कि कश्मीर का मतलब केवल वहां का भूभाग या वहां का राजा नहीं है, बल्कि कश्मीर का मतलब है वहां की आवाम.
जिस गांधी ने देश की आवाम को साथ लेकर शक्तिशाली अंग्रेज़ी हुक़ूमत की चूलें हिला दी थीं, उन्हें आवाम की भावना का ख़याल रखना और उनका दिल जीतना ही सर्वोपरि लगा.
अपनी ऐतिहासिक कश्मीर यात्रा से दो दिन पहले 29 जुलाई, 1947 को अपने प्रार्थना प्रवचन में गांधीजी ने कहा था, "कश्मीर में राजा भी है और रैयत भी. मैं राजा को कोई ऐसी बात नहीं कहने जा रहा हूं कि वह पाकिस्तान में न सम्मिलित हों और भारतीय संघ में सम्मिलित हों. मैं इस काम के लिए वहां नहीं जाऊंगा. वहां राजा तो है, लेकिन सच्चा राजा तो प्रजा है."
"...वहां के लोगों से पूछा जाना चाहिए कि वे पाकिस्तान के संघ में जाना चाहते हैं या भारतीय संघ में. वे जैसा चाहें, करें. राजा तो कुछ है ही नहीं, प्रजा सब कुछ है. राजा तो दो दिन बाद मर जाएगा, लेकिन प्रजा तो रहेगी ही. कुछ लोगों ने मुझसे कहा है कि यह काम मैं पत्र-व्यवहार के ज़रिए ही क्यों नहीं करूं. तो मैं कहूंगा कि इस तरह तो मैं पत्र-व्यवहार के ज़रिए ही नोआखाली का काम भी कर सकता हूं."
जब पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर छद्म हमले की घटनाएं प्रकाश में आईं, तो उन्होंने 26 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान और भारत दोनों को स्पष्ट तौर पर चेताते हुए कहा था, "रियासत (कश्मीर) की असली राजा तो उसकी प्रजा है. अगर कश्मीर की प्रजा यह कहे कि वह पाकिस्तान में जाना चाहती है तो कोई ताक़त नहीं दुनिया में जो उसको पाकिस्तान में जाने से रोक सके."
"लेकिन उससे पूरी आज़ादी और आराम के साथ पूछा जाए. उस पर आक्रमण नहीं कर सकते. उसके देहातों को जलाकर उसे मजबूर नहीं कर सकते. अगर वहां की प्रजा यह कहे, भले ही वहां मुसलमानों की आबादी अधिक हो, कि उसको तो हिन्दुस्तान की यूनियन में रहना है, तो उसको कोई रोक नहीं सकता."
"अगर पाकिस्तान के लोग उसे मजबूर करने के लिए वहां जाते हैं तो पाकिस्तान की हुकूमत को उन्हें रोकना चाहिए. अगर वह नहीं रोकती है तो सारा का सारा इल्ज़ाम उसको अपने ऊपर ओढ़ना होगा. अगर यूनियन (भारत) के लोग उसे मजबूर करने जाते हैं, तो उनको रोकना है और उनको रुक जाना चाहिए, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है."

गांधी के लिए गोरक्षा का अर्थ

गांधी ख़ुद को सनातनी हिंदू कहते थे. वह भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और इसकी आध्यात्मिक परंपरा की दृष्टि से भी गाय का महत्व समझते थे. लेकिन जानते थे कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज और निर्माणाधीन राष्ट्र में गाय की रक्षा ज़ोर-ज़बरदस्ती और भीड़-हत्या के ज़रिए नहीं की जा सकती.
गांधी गोपूजकों के सांप्रदायिक पाखंड को समझ चुके थे. तभी उन्होंने इतना तक कह दिया था कि ख़ुद को गोरक्षक कहने वाले ही असल में गौ-भक्षक हैं. उन्होंने गौ-रक्षा शब्द का प्रयोग तक करना बंद कर दिया था. उन्होंने कहा था कि ज़रूरत 'गौ-रक्षा' की नहीं, बल्कि 'गौ-सेवा' की है.
6 अक्टूबर, 1921 को 'यंग इंडिया' में हिंदू धर्म और गोरक्षा के संबंधों पर महात्मा गांधी ने लिखा था, "हिंदू धर्म के नाम पर ऐसे बहुत से काम किए जाते हैं, जो मुझे मंज़ूर नहीं है. अगर मैं सचमुच वैसा नहीं हूं तो मुझे सनातनी हिंदू अथवा अन्य किसी ढंग का हिंदू कहलाने की कोई ख़्वाहिश नहीं है."
"...मैं गोरक्षा में उसके लोक-प्रचलित रूप से कहीं अधिक व्यापक रूप में विश्वास करता हूं. ...और गोरक्षा का तरीक़ा है उसकी रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देना. गाय की रक्षा के लिए मनुष्य की हत्या करना हिंदू धर्म और अहिंसा धर्म से विमुख होना है. हिंदुओं के लिए तपस्या द्वारा, आत्मशुद्धि द्वारा और आत्माहुति द्वारा गोरक्षा का विधान है."
"लेकिन आजकल की गोरक्षा का स्वरूप बिगड़ गया है. उसके नाम पर हम बराबर मुसलमानों से झगड़ा-फ़साद करते रहते हैं. जिस धर्म ने गाय की पूजा का प्रवर्तन किया, वह मनुष्य के निर्दयी और अमानवीय बहिष्कार का समर्थन कैसे कर सकता है, उसका औचित्य कैसे ठहरा सकता है?"
26 जनवरी, 1921 को गांधी लिखते हैं, "मुसलमानों के विरुद्ध यह कहा जाता है कि वे गोवध करते हैं लेकिन मैं कहता हूं कि बांद्रा के कत्लगाह में पांच वर्ष के अंदर जितनी गायें काटी जाती हैं, उतनी सात करोड़ मुसलमान पच्चीस वर्ष में भी नहीं मार सकते. आप गायों की पूजा करते हैं, लेकिन बैलों को मारते हैं. गायें दूध देती हैं, भैंसे भी दूध देती हैं. वे इतनी अधिक दुही जाती हैं कि उनके थनों से ख़ून झरने लगता है."
इसी तरह 19 जुलाई, 1947 के प्रार्थना प्रवचन में उन्होंने कहा, "आजकल मेरे पास तार-पर-तार आ रहे हैं कि मैं गोवध बंद करवाऊं. मगर हक़ीक़त तो यह है कि जो अपने को गौ-रक्षक कहते हैं, वही गौ-भक्षक हैं. वे यही समझकर मुझे तार देते हैं कि मैं जवाहरलाल या सरदार से ऐसा क़ानून बनाने को कहूं, लेकिन मैं उनसे नहीं कहूंगा."
"मैं तो इन गोरक्षकों से यह कहूंगा कि व्यर्थ का जो पैसा आप मुझे टेलीग्राम भेजने में ख़र्च करते हैं, वह पैसा गायों पर ही क्यों न ख़र्च करें? अगर आप नहीं ख़र्च कर सकते तो उसे मेरे पास भेज दें. मैं तो यह कहूंगा कि गाय की पूजा करने वाले भी हम हैं और उसका वध करने वाले भी हम ही हैं."

अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय विवाह
भारत का समाज आज भी अंग्रेज़ बहू या अंग्रेज़ दामाद लाने पर संभवतः इतराता ही है, लेकिन वही भारतीय समाज अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाह करने वालों को सरेआम पेड़ से लटकाकर फांसी दे देता है.
अपने ही बच्चों पर, नागरिकों पर ऐसी जंगली क्रूरता और बर्बरता का स्रोत क्या है? दरअसल जाति और संप्रदायों के अलग-अलग बाड़े में बंद होकर जीने वाला समाज मानवता के एक होने के आदर्श और निश्छल प्रेम को भी एक संकीर्ण, सांप्रदायिक और जातिवादी नज़रिए से देखने का अभ्यस्त हो चुका है.
जाति और संप्रदाय की ये मनोग्रंथियां भारत के एकजुट और सभ्य होने में सबसे अधिक बाधक हैं. गांधी इस बात को समझ चुके थे.
अपने शुरुआती दिनों में अंतर-जातीय विवाह का विरोध करने वाले गांधी ने बाद में इतना तक प्रण कर लिया था कि वह ऐसी किसी शादी में शरीक नहीं होंगे जिनमें लड़का या लड़की में से कोई एक दलित न हो. वह ऐसी शादियों का आयोजन अपने आश्रम तक में करवाते थे.
7 जुलाई, 1946 के 'हरिजन' में वह लिखते हैं, "यदि मेरा बस चले तो मैं अपने प्रभाव में आने वाली सभी सवर्ण लड़कियों को चरित्रवान हरिजन युवकों को पति के रूप में चुनने की सलाह दूं."
इसी तरह 8 मार्च, 1942 के 'हरिजन' में गांधी लिखते हैं, "जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा, इस तरह के विवाह बढ़ेंगे, और उनसे समाज को फ़ायदा ही होगा. फ़िलहाल तो हम में आपसी सहिष्णुता का माद्दा भी पैदा नहीं हुआ है. लेकिन जब सहिष्णुता बढ़कर सर्वधर्म-समभाव में बदल जाएगी, तो ऐसे विवाहों का स्वागत किया जाएगा."
"आने वाले समाज की नवरचना में जो धर्म संकुचित रहेगा और बुद्धि की कसौटी पर ख़रा नहीं उतरेगा, वह टिक न सकेगा; क्योंकि उस समाज में मूल्य बदल जाएंगे. मनुष्य की कीमत उसके चरित्र के कारण होगी. धन पदवी या कुल के कारण नहीं."
"मेरी कल्पना का हिंदू धर्म कोई संकुचित संप्रदाय नहीं है. वह तो काल के समान ही पुरानी महान और सतत विकास की प्रक्रिया है. उसमें पारसी, मूसा, ईसा, मुहम्मद, नानक और ऐसे ही दूसरे धर्म-संस्थापकों का समावेश हो जाता है."
उसकी व्याख्या इस प्रकार है-
'विद्वद्भिः सेवितः सद्भिनित्यमद्वेषरागिभिः.
हृदयेनाम्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत..'
अर्थात् जिस धर्म को राग-द्वेषहीन ज्ञानी संतों ने अपनाया है और जिसे हमारा हृदय और बुद्धि ही स्वीकार करती है, वही सद्धर्म है.
लेकिन गांधी ऐसे विवाहों के आधार पर धर्म-परिवर्तन के भी सख़्त विरोधी थे. अपने इसी लेख में उन्होंने कहा था, "मैं हमेशा से इस बात का घोर विरोधी रहा हूं और अब भी हूं कि स्त्री-पुरुष सिर्फ़ विवाह के लिए अपना धर्म बदलें. धर्म कोई चादर या दुपट्टा नहीं कि जब चाहा ओढ़ लिया, जब चाहा उतार दिया. इस मामले में धर्म बदलने की कोई बात ही नहीं है."
पत्रकारों/संपादकों पर फ़र्ज़ी मुक़दमे करके पुलिसिया उत्पीड़न
पत्रकार का काम क्या है? पत्रकार का काम है राज्य-व्यवस्था द्वारा की जा रही ग़लतियों को निर्भीकतापूर्वक जनता के बीच में ले जाना ताकि उस पर एक लोकतांत्रिक अंकुश बना रहे. आज़ादी के संघर्ष से लेकर भारतीय लोकतंत्र तक को मज़बूत करने में, परिपक्व करने में भारत के निर्भीक और जनपक्ष पत्रकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है.
लेकिन आज क्या हो रहा है? सत्ता के ख़िलाफ़ ख़बर छापने पर पत्रकारों के साथ सरेआम मार-पीट की जाती है. झूठे मुकदमें दायर कर उन्हें हिरासत में ले लिया जा रहा है. मीडिया संस्थानों के मालिकों, संपादकों की भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. साम-दाम-दंड-भेद के ज़रिए उन पर दबाव बनाया जाता है.
बिरले ही हैं जो इन दबावों को झेलकर भी अपने क़लम की धार बरक़रार रख पा रहे हैं. निर्भीक पत्रकारों की बर्ख़ास्तगी आम हो गई है. मीडिया की आज़ादी के मामले में दुनियाभर के देशों के मुक़ाबले भारत की स्थिति सबसे ख़राब बताई जा रही है. लोकतंत्र के हित में पत्रकारों को सुरक्षा देने के बजाय जब शासन-तंत्र ख़ुद ही उसके ख़िलाफ़ हो जाए, तो यह भावी समाज के लिए अच्छा संकेत नहीं है.
'नवाकाल' नाम के मराठी अख़बार के संपादक कृष्णजी प्रभाकर खाडिलकर पर जब-तब मुक़दमा चलाकर तब की सरकार उन्हें परेशान कर रही थी. महात्मा गांधी ने 4 अप्रैल, 1929 को उनके मामले पर लिखा था, "नवाकाल वाले श्री खाडिलकर के विरुद्ध जो मामला चलाया गया, वस्तुतः वह मुक़दमा नहीं उत्पीड़न है."
"लेकिन जो सरकार जनता के विरोध के बावजूद चलाई जा रही है, और विशेष रूप से उस हालत में जब, जैसा कि हमारे मामले में है, इन जन-विरोध का दमन किया जाता है, उस सरकार के राज्य में स्पष्टवक्ता संपादकों का उत्पीड़न एक निश्चित बात है. एक दिन उन्होंने मुझसे कहा था कि एक पत्रकार की हैसियत से उन्हें समय-समय पर जोखिम भरे कार्यों के लिए जो जुर्माना देना पड़ा था, उसे उन्होंने अक्सर नाटक लिख-लिखकर चुकाया."
तत्कालीन न्याय-व्यवस्था पर एक कठोर टिप्पणी करते हुए महात्मा गांधी ने आगे लिखा था, "इस देश में अन्य सरकारी संस्थाओं की तरह क़ानूनी अदालतें भी ज़रूरत के मौक़ों पर सरकार की रक्षा के लिए क़ायम की गई हैं. इस तरह के अनुभव हमें बार-बार हो चुके हैं. अदालतें बुनियादी तौर पर ऐसी ही हैं."
"बात इतनी ही है कि जब जनता की स्वतंत्रता और सरकार का हित एक ही बात में होता है, तब हमें इसका पता नहीं चलता. जब सरकार के विरोध में रहते हुए भी जनता की स्वतंत्रता की रक्षा करनी होती है, तब अदालतें उनकी रक्षा में असमर्थ पाई जाती हैं. उनसे हमारा जितना कम संबंध रहे उतना अच्छा."
राज्य-सत्ता द्वारा पुलिस के दुरुपयोग पर 26 जनवरी, 1922 को 'यंग इंडिया' में गांधीजी ने लिखा था, "इसमें संदेह नहीं कि भारत में पुलिस बदनाम है. दमन की आजकल की क्रूर कार्रवाइयों से यह बदनामी शायद और बढ़ी है. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पुलिस सरकार के हाथ का महज़ एक हथियार है."
भारत की आज़ादी से लगभग दो महीने पहले 5 जून, 1947 को कॉलेज के विद्यार्थियों से बातचीत करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था, "अगर मेरा वश चलता तो मैं सेना और पुलिस में बुनियादी सुधार से शुरुआत करता. इंग्लैंड में पुलिस को लोग अपना सर्वश्रेष्ठ मित्र, सहायक और कर्तव्य-भावना का मूर्तरूप समझते हैं, मगर भारत में पुलिस को आम आदमी ख़ौफ़नाक और अत्याचारी समझता है."
सत्ता का अहंकार और सत्ता क़ायम रखने का लोभ न केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं को चौपट करके रख देती है, बल्कि वह समाज में भी द्वेष, आक्रोश, अशांति, मूढ़ता, ग़ुलामी और भय को जन्म देती है.
गांधी ये सब अपने लंबे व्यावहारिक अनुभवों से जानते थे. उन्होंने जीवन-भर इन्हीं सबके ख़िलाफ़ तो संघर्ष किया था. गांधीजी को याद करने का मतलब है उनके इन विचारों की रोशनी में समाज और राजनीति को देखना और बदलना. हाल में किसी ने बहुत अच्छा कहा कि गांधी को समझना और अपनाना जिन लोगों को मुश्किल लगा उनके लिए सबसे आसान था उनकी हत्या कर देना.
लेकिन किसी भी अन्याय, दमन, शोषण, पृथ्वी को निगलने वाले लोभ, अलोकतांत्रिक दुष्प्रयासों और विनाशकारी युद्धों के ख़िलाफ़ गांधी-विचार ज्यों-का-त्यों खड़ा है. वह भी अहिंसा, संयम, दया, करुणा, सत्य और प्रेम के आत्मविश्वास से भरकर खड़ा है.

विश्व फोटोग्राफी डे: ..क्योंकि तस्वीरें हमेशा जिंदा रहती हैं

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“गर पल को अमर करना होतो तस्वीरों में कैद कर लीजिए…. अली उवाच”
तस्वीरें हमेशा जिंदा रहती हैं। चूंकि हम लम्हों को कैद नहीं कर सकते। मगर ख्वाहिश होती है कि काश ये किसी किताब के पन्ने की तरह होते, जिन्हें जब चाहा उलट-पलट कर देख लेते। इंसान की इन्हीं इच्छाओं को मूर्त रूप देने के लिए फोटोग्राफी की तकनीक एक वरदान के रूप में सामने आई।

इंसान के पास जब इतने हाईटेक कैमरे नहीं थे, तब भी वह तस्वीरें बनाता था। प्राचीन गुफाओं में उसके बनाए भित्ति चित्र इस बात के गवाह हैं। इनके जरिये वह आने वाली पीढ़ियों के लिए कितनी बेश्कीमती सौगात छोड़ गए हैं। बाद में जब कैमरे का आविष्कार हुआ, तो फोटोग्राफी भी इंसान के लिए अपनी रचनात्मकता को प्रदर्शित करने का जरिया बन गया। आज विश्व फोटोग्राफी डे है। इस दिवस को मनाने के पीछे भी एक कहानी है। दरअसल फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेक्स और मेंडे डाग्युरे ने सबसे पहले सन 1839 में फोटो तत्व की खोज की थी। ब्रिटिश वैज्ञानिक विलियम हेनरी फॉक्सटेल बोट ने निगेटिव-पॉजीटिव प्रोसेस का आविष्कार किया और सन 1834 में टेल बॉट ने लाइट सेंसेटिव पेपर की खोज करके खींची गई फोटो को स्थायी रूप में रखने में मदद की।
फ्रांसीसी वैज्ञानिक आर्गो की फ्रेंच अकादमी ऑफ साइंस के लिए लिखी गई एक रिपोर्ट को तत्कालीन फ्रांस सरकार ने खरीदकर 19 अगस्त 1939 को आम लोगों के लिए फ्री घोषित कर दिया था। इसी उपलब्धि की याद में 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
इस संसार में प्रकृति ने प्रत्येक प्राणी को जन्म के साथ भी एक कैमरा दिया है जिससे वह संसार की प्रत्येक वस्तु की छवि अपने दिमाग में अंकित करता है। वह कैमरा है उसकी आंख। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रत्येक प्राणी एक फोटोग्राफर है।
वैज्ञानिक तरक्की के साथ-साथ मनुष्य ने अपने साधन बढ़ाना प्रारंभ किया और अनेक आविष्कारों के साथ ही साथ कृत्रिम लैंस का भी आविष्कार हुआ। समय के साथ आगे बढ़ते हुए उसने इस लैंस से प्राप्त छवि को स्थायी रूप से सहेजने का प्रयास किया। इसी प्रयास की सफलता वाले दिन को अब हम विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाते हैं।
फोटोग्राफी का आविष्कार जहां संसार को एक-दूसरे के करीब लाया, वहीं एक-दूसरे को जानने, उनकी संस्कृति को समझने तथा इतिहास को समृद्ध बनाने में भी उसने बहुत बड़ी मदद की है। आज हमें संसार के किसी दूरस्थ कोने में स्थित द्वीप के जनजीवन की सचित्र जानकारी बड़ी आसानी से प्राप्त होती है, तो इसमें फोटोग्रोफी के योगदान को कम नहीं किया जा सकता।
वैज्ञानिक तथा तकनीकी सफलता के साथ-साथ फोटोग्राफी ने भी आज बहुत तरक्की की है। आज व्यक्ति के पास ऐसे-ऐसे साधन मौजूद हैं जिसमें सिर्फ बटन दबाने की देर है और मिनटों में अच्छी से अच्छी तस्वीर उसके हाथों में होती है। किंतु सिर्फ अच्छे साधन ही अच्छी तस्वीर प्राप्त करने की ग्यारंटी दे सकते हैं, तो फिर मानव दिमाग का उपयोग क्यों करता?
तकनीक चाहे जैसी तरक्की करे, उसके पीछे कहीं न कहीं दिमाग ही काम करता है। यही फर्क मानव को अन्य प्राणियों में श्रेष्ठ बनाता है। फोटोग्राफी में भी अच्छा दिमाग ही अच्छी तस्वीर प्राप्त करने के लिए जरूरी है।
हमें आंखों से दिखाई देने वाले दृश्य को कैमरे की मदद से एक फ्रेम में बांधना, प्रकाश व छाया, कैमरे की स्थिति, ठीक एक्सपोजर तथा उचित विषय का चुनाव ही एक अच्छे फोटो को प्राप्त करने की पहली शर्त होती है। यही कारण है कि आज सभी के घरों में मोबाइल कैमरे हैं लेकिन सच तो यह है कि  अच्छे फोटोग्राफर गिनती के हैं।
अच्छा फोटो अच्छा क्यों होता है- इसी सूत्र का ज्ञान किसी भी फोटोग्राफर को सामान्य से विशिष्ट बनाने के लिए पर्याप्त होता है। वास्तव में ‘हमें फ्रेम में क्या लेना है, इससे ज्यादा इस बात का ज्ञान जरूरी है कि हमें क्या-क्या छोड़ना है।’
भारत के संभवतः सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर रघुरायके शब्दों में चित्र खींचने के लिए पहले से कोई तैयारी नहीं करता। मैं उसे उसके वास्तविक रूप में अचानक कैंडिड रूप में ही लेना पसंद करता हूं। पर असल चित्र तकनीकी रूप में कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह तब तक सर्वमान्य नहीं हो सकता जब तक उसमें विचार नहीं है। एक अच्छी पेंटिंग या अच्छा चित्र वही है, जो मानवीय संवेदना को झकझोर दे। कहा भी जाता है कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर है।
आज जब उपभोक्तावाद अपनी चरम सीमा पर है, तब ग्राहक को उत्पादन की ओर खींचने में फोटोग्राफी का भी बहुत बड़ा योगदान है। विज्ञापन को आकर्षक बनाने के लिए फोटोग्राफर जो सार्थक प्रयत्न कर रहा है, उसे हम अपने दैनिक जीवन में अच्छी तरह अनुभव कर सकते हैं। इसी प्रयास में फोटोग्राफी को आजीविका के रूप अपनाने वाले बहुत बड़े लोगों की संख्या खड़ी हो चुकी है। यह लोग न सिर्फ फोटोग्राफी से लाखों कमा रहे हैं बल्कि इस काम में कलात्मक तथा गुणात्मक उत्तमता का समावेश कर ‘जॉब सेटिस्फेक्शन’ की अनुभूति भी प्राप्त कर रहे हैं। अपने आविष्कार के लगभग 100 वर्ष लंबे सफर में फोटोग्राफी ने कई आयाम देखे हैं।
विश्व फोटोग्राफी का इतिहास
पहली तस्वीर की घोषणा 19 अगस्त, 1939 को फ्रांस में की गई थी। इस घोषणा के लिए प्रस्तावना यह थी कि 9 जनवरी, 1839 को फ्रांसीसी विज्ञान अकादमी ने डागुएरोटाइप (Daguerreotype) प्रक्रिया की घोषणा की थी।जो लुई डागुएरे द्वारा विकसित एक फोटोग्राफिक प्रक्रिया है। उसी वर्ष 19 अगस्त को, फ्रांस सरकार ने पेटेंट की प्राप्ति की और फ्रेंकोइस अरागो फ्रांस के प्रधानमंत्री ने फ्रेंच एकेडमी डेस साइंस और एकेडमी डेस बीक्स आर्ट्स में एक प्रस्तुति दी, जिसमें फोटोग्राफी की प्रक्रिया का वर्णन किया गया।
अरागो ने इसके मूल्यांकन पर चर्चा की और इसके शानदार भविष्य की कल्पना करते हुए दुनिया को इसके मुफ्त उपयोग का लाभ दिया। 19 अगस्त 2010 को पहली वैश्विक ऑनलाइन गैलरी की मेजबानी की गई थी। यह दिन ऐतिहासिक था क्योंकि भले ही यह अब तक की पहली ऑनलाइन गैलरी थी, लेकिन इस दिन 270 फोटोग्राफर्स ने तस्वीरों के माध्यम से अपने विचारों को साझा किया और 100 से अधिक देशों के लोगों ने वेबसाइट देखी।

क्या आप जानते हैं आखिर स्कूल में झंडारोहण करने के क्या नियम हैं...

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15 अगस्त हो या 26 जनवरी, इस दिन सबसे अहम कार्य होता है झंडारोहण. सभी स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में इस दिन झंडा फहराया जाता है. झंडारोहण का कार्यक्रम हर स्कूल में अलग-अलग तरीके से होता है. लेकिन क्या आप जानते हैं स्कूलों में झंडा फहराने के भी नियम होते हैं, जिसके अनुसार ही झंडारोहण का कार्यक्रम आयोजित करना होता है. आइए जानते हैं वो कौन-कौन से नियम हैं...


भारतीय झंडा संहिता 2002 के अनुसार, शैक्षणिक संस्थानों में झंडा फहराने के नियम हैं. झंडारोहण के वक्त इसका पालन करना आवश्यक होता है. नियमों के अनुसार, शैक्षिक संस्थाओं (स्कूल, कॉलेज, खेल शिविर, स्काउट शिविर आदि) में राष्ट्रीय झंडा फहराया जाना चाहिए, ताकि मन से झंडे का सम्मान करने कि लए प्रेरणा दी जा सके. जिसके लिए ये हिदायतें हैं...
- सबसे पहले स्कूल के विद्यार्थी एक स्थान पर खड़े होकर एक खुला वर्गाकार (चोकोर शेप) बनाएंगे. इस वर्ग में 3 तरफ विद्यार्थी खड़े होंगे और चौथी तरफ बीच में झंडा होगा.
- वहीं प्रिंसिपल या हेडमास्टर या झंडे को फहराने वाला गणमान्य व्यक्ति झंडे से तीन कदम पीछे खड़े होंगे.
- वहीं अन्य छात्र का कक्षा के आधार पर ग्रुप के आधार पर खड़े होंगे और वो एक के पीछे एक खड़े होंगे. इसमें क्लास का एक स्टूडेंट अपनी क्लास की पहली लाइन के दाईं साइड में खड़ो होगा और क्लास टीचर अपनी क्लास की आखिरी लाइन में तीन कदम पीछे खड़ा होगा.
- हर लाइन के बीच कम से कम एक कदम यानी 30 इंच का फासला होना चाहिए और हर क्लास के बीच समान गैप होना चाहिए.
- हर कक्षा का मॉनिटर आगे बढ़कर स्कूल के चुने हुए छात्र नेता का अभिवादन करेगा. जब सभी कक्षाएं तैयार हो जायें तो स्कूल का छात्र नेता प्रधानाध्यापक की ओर बढ़कर उनका अभिवादन करेगा और प्रधानाध्यापक, अभिवादन का उत्तर देगा. इसके बाद मुख्य अतिथि (यदि प्रधानाध्यापक के अलावा कोई और है) द्वारा झंडा फहराया जायेगा. इसमें स्कूल का छात्र-नेता सहायता कर सकता है.
- स्कूल का छात्र नेता, जिसे परेड की जिम्मेदारी दी गई है, वो झंडा फहराने के ठीक पहले, परेड को सावधान या अटेंशन में आने की आज्ञा देगा और झंडे को लहराने पर परेड को झंडे को सलामी देने की आज्ञा देगा. परेड कुछ देर तक सलामी की अवस्था में रहेगी और फिर 'कमान' आने पर सावधान की अवस्था में आ जाएगी.
- झंडे को सलामी देने के बाद राष्ट्रगान होगा और इस दौरान परेड सावधान की अवस्था में रहेगी. शपथ लेने के सभी अवसरों पर शपथ राष्ट्रगान के बाद ली जाएगी. शपथ लेने के वक्त सभा सावधान की अवस्था में खड़ी रहेगी.

राष्ट्रीय ध्वज फहराने के हैं ये 10 खास नियम:

2002 से पहले आम लोगों को सिर्फ स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने की छूट थी। 26 जनवरी 2002 को इंडियन फ्लैग कोड में संशोधन किया गया, जिसके बाद अब कोई भी नागरिक किसी भी दिन झंडा फहरा सकता है। आपको बता दें कि तिरंगा फहराने के भी कुछ नियम हैं। जानिए क्या हैं ये...
1. झंडा हाथ से काते और बुने गए ऊनी, सूती, सिल्क या खादी से बना होना चाहिए। झंडे का आकार आयताकार होना चाहिए। इसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 का होना चाहिए। केसरिया रंग को नीचे की तरफ करके झंडा लगाया या फहराया नहीं जा सकता।
2. सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच ही तिरंगा फहराया जा सकता है। झंडे को कभी भी जमीन पर नहीं रखा जा सकता। झंडे को आधा झुकाकर नहीं फहराया जाएगा सिवाय उन मौकों के जब सरकारी इमारतों पर झंडे को आधा झुकाकर फहराने के आदेश जारी किए गए हों।
3. झंडे को कभी पानी में नहीं डुबोया जा सकता। किसी भी तरह फिजिकल डैमेज नहीं पहुंचा सकते। झंडे के किसी भाग को जलाने, नुकसान पहुंचाने के अलावा मौखिक या शाब्दिक तौर पर इसका अपमान करने पर तीन साल तक की जेल या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।
4. झंडे का कमर्शल इस्तेमाल नहीं कर सकते। किसी को सलामी देने के लिए झंडे को झुकाया नहीं जाएगा। अगर कोई शख्स झंडे को किसी के आगे झुका देता हो, उसका वस्त्र बना देता हो, मूर्ति में लपेट देता हो या फिर किसी मृत व्यक्ति (शहीद आर्म्ड फोर्सेज के जवानों के अलावा) के शव पर डालता हो, तो इसे तिरंगे का अपमान माना जाएगा।
5. तिरंगे की यूनिफॉर्म बनाकर पहनना गलत है। अगर कोई शख्स कमर के नीचे तिरंगे को कपड़ा बनाकर पहनता हो तो यह भी अपमान है। तिरंगे को अंडरगार्मेंट्स, रुमाल या कुशन आदि बनाकर भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
6. झंडे पर किसी तरह के अक्षर नहीं लिखे जाएंगे। खास मौकों और राष्ट्रीय दिवसों जैसे गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के मौके पर झंडा फहराए जाने से पहले उसमें फूलों की पंखुड़ियां रखने में कोई आपत्ति नहीं है।
7. किसी कार्यक्रम में वक्ता की मेज को ढकने या मंच को सजाने में झंडे का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। गाड़ी, रेलगाड़ी या वायुयान की छत, बगल या पीछे के हिस्से को ढकने में यूज नहीं कर सकते। झंडे का इस्तेमाल किसी इमारत में पर्दा लगाने के लिए नहीं किया जा सकता।
8. फहराए गए झंडे की स्थिति सम्मानजनक बरकरार होनी चाहिए। फटा या मैला-कुचैला झंडा नहीं फहराया जाना चाहिए। झंडा फट जाए, मैला हो जाए तो उसे एकांत में मर्यादित तरीके से पूरी तरह नष्ट कर दिया जाए।
9. यदि झंडे को किसी मंच पर फहराया जाता है, तो उसे इस प्रकार लगाया जाना चाहिए कि जब वक्ता का मुंह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उसके दाहिनी ओर रहे। एक तरीका यह भी है कि झंडे को वक्ता के पीछे दीवार के साथ और उससे ऊपर लेटी हुई स्थिति में प्रदर्शित किया जाए।
10. किसी दूसरे झंडे या पताका को राष्ट्रीय झंडे से ऊंचा या उससे ऊपर या उसके बराबर नहीं लगाया जा सकता। इसके अलावा, फूल, माला, प्रतीक या अन्य कोई वस्तु झंडे के पोल के ऊपर रखी जाए।

जियो फाइबर: क्या है ये चीज़, जिससे आपका इंटरनेट चीते की रफ़्तार से दौड़ेगा?

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इंटरनेट. तेज़ न हो, तो किसी काम का नहीं. लेकिन भारत में इंटरनेट तेज़ के अलावा सब कुछ है. दिसंबर 2018 में छपी बिज़नेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत मोबाइल इंटरनेट के मामले में दुनिया में 111 वें स्थान पर है. मोबाइल इंटरनेट से तंग आकर लोग घर पर तार वाला इंटरनेट माने फिक्स्ड ब्रॉडबैंड लगाते हैं. लेकिन भारत की किस्मत वहां भी अच्छी नहीं है. क्योंकि इसी रिपोर्ट के मुताबिक भारत फिक्स्ड ब्रॉडबैंड इंटरनेट स्पीड के मामले में 65वें नंबर पर आता है. मोबाइल इंटरनेट तो आज भी भगवान भरोसे है. लेकिन हो सकता है कि आने वाले दिनों में फिक्स्ड ब्रॉडबैंड के दिन फिरें, वो तेज़, बहुतै तेज़ हो जाए. ये उज्जवल संभावना पैदा हुई है ‘जियो गीगा-फाइबर’ के आने से.
12 अगस्त, 2019 को हुई रिलायंस इंडस्ट्रीज़ की एनुअल जनरल मीटिंग. इसमें मुकेश अंबानी ने ऐलान किया कि रिलायंस ‘जियो गीगा-फाइबर’ सेवा 5 सितंबर, 2019 से शुरू करेगा. इसका शुरुआती प्लान 700 रुपए का होगा जिसमें न्यूनतम 100 Mbps की स्पीड मिलेगी. आप सवाल करें कि हम रिलायंस का विज्ञापन चला रहे हैं, उससे पहले आपको बता दे कि ये खबर रिलायंस के प्लान के बारे में नहीं है. बल्कि उस तरीके के बारे में है, जिससे वो इतनी स्पीड देने वाला है. जियो इस स्पीड के लिए FTTH तकनीक का इस्तेमाल करने वाला है. ये क्या है, अब तक चल रहे ब्रॉडबैंड से कैसे अलग है और ज़्यादा स्पीड कैसे देगा, यही समझाने के लिए तो आपको यहां बुलाया है.

ये FTTH है क्या बला?
FTTH का फुल फॉर्म है ‘फाइबर टू दी होम’. हिंदी में बोले तो ‘घर तक फाइबर’. ये फाइबर है क्या और तेज़ कैसे है, उसके लिए आपको समझना होगा कि इंटरनेट आप तक पहुंचता कैसे है.
इंटरनेट का बेसिक काम वही है, जो डाकिए का होता है. इंटरनेट साधन है, एक जगह से दूसरी जगह इनफॅार्मेशन (जानकारी) पहुंचाने का. जैसे कि दी लल्लनटॉप के ऑफिस से आप तक इनफॅार्मेशन पहुंचाना. डाकघर हैं आपके कंप्यूटर और मोबाइल (अब तो हमारा ऐंड्रॉयड ऐप भी आ गया है). लेकिन यहां से आप इनफॅार्मेशन पहुंचती कैसे है? ये एक उदाहरण से समझिए. कि आपकी एक बुआ हैं, जिनके पास हर समस्या का समाधान होता है. आप उनसे पूछते हैं, वो तुरंत चिट्ठी लिखकर तरकीब सुझा देती हैं.
बुआ ने तरकीबों को पर्चों पर लिखकर एक भाड़े के घर में सजा लिया है. तो बुआ का घर हुआ सर्वर. वेबसाइट के लिंक के रूप में तरकीब बुआ के घर की खिड़कियों से झांकती रहती हैं. अब आपके फोन या कंप्यूटर की खिड़की बुआ के घर की खिड़कियों की तरफ खुलती हैं. खिड़कियों वाली बुआ की दीवार हमारे लिए हुए वेबपेज. आपको जब काम पड़ता है, अपनी खिड़की से हाथ बढ़ाकर बुआ की किसी खिड़की में सजे लिंक को क्लिक कर देते हैं.
# इंटरनेट ऐसी ही ढेर सारी बुआओं और उनके भाड़े के घरों का (माने सर्वरों का) नेटवर्क है. इंटरनेट का आइडिया अमेरिका में आया और वहीं की कंपनियां इसके खेल में बड़ी खिलाड़ी हैं, तो ज़्यादातर बुआओं के घर अमेरिका में हैं. कुछ के यूरोप में भी हैं. बाकी दुनिया में इनकी संख्या सीमित है.
फर्ज़ कीजिए आपने जिस तरकीब के लिंक पर क्लिक किया है, वो है अमेरिकन बुआ के घर में. तो जैसे बुआ तरकीब को लिखकर चिट्ठी तैयार करती है, वैसे ही इंटरनेट कंपनिया सर्वर से जानकारी का एक पैकेट तैयार कर लेती हैं. ये पैकेट एक तरह का सिग्नल होता है. रोशनी का सिग्नल. और रोशनी का सिग्नल एक जगह से दूसरी जगह तक भेजने के लिए चाहिए कांच. लेकिन अमेरिका से भारत तक कांच बिछाने में तो बहुत खर्च होगा. और दिखेगा तब भी धुंधला. यहीं से एंट्री हुई फाइबर की. ऑप्टिकल फाइबर की. इसमें प्रकाश बढ़िया क्वालिटी में एक छोर से दूसरे तक पहुंचता है. तो इन्हीं ऑप्टिकल फाइबर के ज़रिए जानकारी का पैकेट सबसे पहले अमेरिका के किसी ऐसे शहर लाया जाएगा, जहां समंदर हो.
# वहां से प्रकाश का वो सिग्नल माने अपना पैकेट ऑप्टिकल फाइबर के मोटे-मोटे गुच्छों में दाखिल होगा. फिर समंदर के नीचे बिछे फाइबर के मोटे-मोटे केबल से होते हुए मुंबई जैसे किसी समुद्रतटीय शहर में पहुंचेगा.
# इसके बाद सिग्नल से बुआ की चिट्ठी को डिकोड कर लिया जाएगा. ये डीकोडेड चिट्ठी भारत में उस कंपनी के पास पहुंचेगी, जिससे आपने इंटरनेट लिया है. टेक्निकल शब्दावली में ये कंपनी आपकी ISP यानी ‘इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर’ है.
# अब आपकी ISP कंपनी चिट्ठी की तरकीब को, माने इनफॅार्मेशन को आपकी लोकेशन के नज़दीक किसी बड़े शहर पहुंचने को कहेगी. इनफॅार्मेशन आपकी तलाश में भटकते-भटकते उस शहर पहुंच जाएगी. और आप तक पहुंचेगी. मोबाइल इंटरनेट के केस में सबसे नज़दीक नेटवर्क टावर से उड़ कर. और फिक्स्ड लाइन ब्रॉडबैंड के केस में जमीन के नीचे बिछे केबल से.

इनफॅार्मेशन के रास्ते

आप तक बुआ की चिट्ठी कितनी जल्दी पहुंच सकती है, ये इस बात पर निर्भर करता है कि डाकिए का रास्ता कैसा है. मुरम का है, गिट्टी का, डामर का या सीमेंट का. फिर वो रास्ता सिंगल लेन है, डबल लेन या फोर लेन. इंटरनेट पर मौजूद जानकारी के लिए भी इसी तरह के रास्ते होते हैं. सबसे पहले जानिए इंटरनेट की कच्ची सड़क के बारे में.
कॉपर की कच्ची सड़क
# टीवी केबल वाला रास्ता
# फ़ोन लाइन वाला रास्ता
ऊपर बताई सड़कें मिट्टी-पत्थर वाली हैं. कच्ची. वो यूं कि शुरू के दोनों तरीकों से इनफॅार्मेशन कॉपर वायर के ज़रिए आती है. इनसे दूर तक इनफॅार्मेशन पहुंचाना चुनौती भरा काम है. और साथ ही स्लो भी है.
फाइबर वाला हाईवे
# फाइबर में इनफॅार्मेशन बिजली की जगह प्रकाश के सिग्नल का अवतार ले लेती है. लाइट सिग्नल यानी रोशनी. प्रकाश. जीके का फैक्ट है कि समूचे ब्रह्मांड में लाइट की स्पीड सबसे ज्यादा है. कितनी है?
299792457 मीटर प्रति सेकंड या 1080000000 km/h. 

 पॉइंट टू बी नोटेड – इनफॅार्मेशन लाइट सिग्नल तो है लेकिन फाइबर में ये लाइट की स्पीड से सफ़र नहीं करती. और इसका कारण ये है कि फाइबर में इनफॅार्मेशन सीधी रेखा में नहीं बल्कि ज़िग-ज़ैग यानी लहराकर चलती है. इससे इसकी स्पीड लाइट की स्पीड की एक-तिहाई हो जाती है. लेकिन ये भी बहुत-बहुत ज्यादा है.
अगर इलेक्ट्रिकल सिगनल ठेला है, तो लाइट सिगनल बुलेट ट्रेन है. जापान वाली.
# ऑप्टिकल-फाइबर केबल में बहुतै पतली फाइबर की नालियां होती हैं. आपके बालों से भी कई गुना पतली. इन फाइबर की नालियों की डिजाईन इस प्रकार की जाती है कि लाइट इनसे बाहर न जा सके.
बड़ा सीधा सा सिद्धांत है, डाकिए को जितनी दूर तक हाइवे मिलेगा, उतनी ही तेज़ बुआ की चिट्ठी आएगी. सूचना को भी जितनी दूर तक ऑप्टिकल फाइबर में चलने को मिलेगा, उतनी वो तेज़ आप तक पहुंचेगी. लेकिन अब तक सूचना के साथ धोखा होता था. वो मुंबई या किसी बड़े शहर तक तो फाइबर में आती थी, लेकिन शहर पहुंचकर आपके घर तक पहुंचने के लिए उसको बोला जाता था कि अब तुम कॉपर-वायर वाले रस्ते से निकलो. तो इनफॅार्मेशन दोबारा अवतार बदलकर बिजली के सिगनल में ढलती थी. ये बात पूरी स्पीड खा जाती थी.
ये उसी तरह का सीन है कि चमचमाते हाइवे पर 1000 किलोमीटर पर चलने के बाद आपको 100 किलोमीटर पैदल चलने को कहा जाए. समझ गए न क्या झोल है?
FTTH तकनीक में फाइबर होम तक आता है. माने बुआ के घर से सीधे आपके घर तक चौड़ा सा हाइवे होता है. जानकारी को बिजली में ढलने का झंझट पालना ही नहीं पड़ता. यही राज है FTTH की तेज़ी और तंदरुस्ती का.

महाभारत काल में


इतिहास के सबसे होनहार विद्यार्थी और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विपलव देव कहते हैं इंटरनेट का इतिहास महाभारत काल जितना पुराना है. हम उससे एक स्टेप और आगे की बात कहते हैं. इंटरनेट की ही तरह FTTH का इतिहास भी महाभारत काल जितना ही पुराना है. संजय नामक फाइबर धृतराष्ट्र और कुरुक्षेत्र के बीच बिछा हुआ था. चिपक कर इनफार्मेशन दे रहा था. यही तो FTTH है गुरू.
फिर से....
लगभग एक साल पहले, 15 अगस्त, 2018 को रिलायंस ने ‘जियो गीगा-फाइबर’ का बीटा-वर्ज़न लॉन्च किया था. बीटा-वर्ज़न मतलब मुंह-दिखाई. इतने दिन टेस्टिंग चली. कि चलाके देख लो कैसा है. फिर जो भी कमियां नज़र आएंगी, उनको दुरूस्त कर के बढ़िया से लॉन्च किया जाएगा टाइप. अब उस बढ़िया वाले लॉन्च का समय आ गया है. मोबाइल इंटनेट की दुनिया में जैसा प्राइस वॉर शुरु हुआ था, वैसा ही फिक्स्ड लाइन के मामले में भी हो सकता है. जियो के पास सस्ती और बढ़िया सेवाएं देने के लिए असीम संसाधन हैं. और मार्केट कैप्चर करने के लिए असीमित भूख.

ये पांच काम आपने किए हैं तो मूर्ख दिवस मुबारक हो

    



फर्स्ट अप्रैल को दिमाग के घोड़े दौड़ पड़ते हैं. मूर्ख दिवस कैसे सेलिब्रेट किया जाए. लोग अपने दोस्तों रिश्तेदारों को मूर्ख बनाने के लिए जितनी अक्ल लगाते हैं उतनी किसी और काम में लगाते तो राम जाने क्या होता. खैर ये तो एक दिन की बात है. लेकिन कुछ लोग हफ्तों, महीनों, सालों या जिंदगी भर मूर्ख बने रहने को अभिशप्त रहते हैं. ये किसी और ग्रह से नहीं आते. हमारे आपके बीच ही रहते हैं. बस ये मूर्खता वाली इस कैटेगरी को कुछ नायाब काम करके छू आते हैं. नीचे वो काम लिखे हैं. इनमें से दो मैंने भी किए हैं. तो अकेले गौरवान्वित न महसूस कर लेना.

1. पर्सनैलिटी डेवेलपमेंट कोर्स करने वाले:

भैये कौन है जो अपनी पर्सनैलिटी एकदम चुंबकीय नहीं बनाना चाहता. सब चाहते हैं कि सामने लड़का हो, लड़की हो, बॉस हो, कलीग हो, सब पर अपना भौकाल बना रहे. “90 घंटों में गारंटीड फर्राटे से इंगलिश बोलना” सिखाने वालों ने इस मार्केट को भांप लिया था. इसी प्लान के तहत वो अंगरेजी कोर्स के साथ पर्सनैलिटी डेवलपमेंट कोर्स फोकट में कराने लगे. लेकिन भैये पर्सनैलिटी ऐसी चीज तो है नहीं कि किसी के सिखाने से बन जाएगी. ये तो सबकी अलग अलग होती है. यही तो पर्सनैलिटी की खासियत है. सारे एक ही जैसे व्यवहार करेंगे तो पर्सन कहां रह जाएंगे, रोबोट नहीं हो जाएंगे. लेकिन फिर भी लोगों ने पर्सनैलिटी डेवलपमेंट कोर्स किया और जकड़ के किया.

2. मल्टी लेवल मार्केटिंग से ठगाने वाले:

कोई दूर का रिश्तेदार 10-15 साल आपके घर में आ धमकता है. और झट से अपना महंगा चश्मा, महंगे जूते और ब्रांडेड कपड़े दिखाने लगते हैं. ये भी बताते हैं कि अगले हफ्ते उनकी नई कार आने वाली है. फिर दिल्ली या लखनऊ के पॉश इलाके में घर लेने वाले हैं. आप प्याज जैसी आंखें फाड़कर देख रहे होते हैं कि ये क्या हो गया. ये कल का भिखारी इतना बड़ा आदमी कैसे बन गया. फिर वो खोलता है अपना असली प्लान. कि आप हमारे C बन जाओ फिर आपके नीचे A, B और C बनेंगे. फिर धकापेल कमाई होगी. असल में पूरा गेम सिर्फ C बनाने का होता है.

3. दिल्ली की चांदनी चौक से 100 रुपए की 32 जीबी पेन ड्राइव लेने वाले:

इनकी कोई गलती नहीं होती. ये बस सड़क से निकल रहे होते हैं. बगल में चटाई पर ढेर सारे मेमोरी कार्ड और पेन ड्राइव फैलाए कोई बंदा बैठा होता है. पहली बार दिल्ली आया शख्स उसे खरीद लेता है. भले जरूरत हो या न हो. इतनी सस्ती पेन ड्राइव कैसे छोड़ दे. फिर वो एक बार कंप्यूटर में लगती है तो 10 जीबी बताती है. दोबारा लगाओ तो 100 एमबी. तीसरी बार चलती ही नहीं.

4. न्यूज चैनल पर डिबेट और WWE इमोशनल होकर देखने वाले:

इन पर हम कुछ नहीं लिखेंगे. बस रब राखा. यही दुआ है कि आप जल्दी अपने इमोशन्स पर काबू रखना सीख जाएं. नहीं तो ये खेल बहुत दिन चलने वाला है.

5. बापू को रिहा कराने वाले:

सुबह पांच बजे ट्विटर खोलो तो एक चीज ट्रेंड कर रही होती है. बापू को रिहा करो. या बापू निर्दोष है. ये महात्मा गांधी की बात नहीं कर रहे हैं. बापू यानी आसाराम. वो जो बीसियों केस अपने ऊपर लिए जोधपुर जेल में बंद हैं. उन्होंने बेल के लिए इतने सियापे किए लेकिन कुछ नहीं हुआ. सलमान खान को देखकर उनकी उम्मीद बंधी हुई है लेकिन आशा अब कम ही है. लेकिन उनके चेले चपाटे गजब आशावादी हैं. उनको किसी के कहे पर भरोसा नहीं. झुट्ठे बाबाओं के चक्कर में पड़ने वालों के लिए भी आज का दिन बेहद खास है.

70th Republic Day 2019: 26 जनवरी को ही क्‍यों मनाया जाता है गणतंत्र दिवस?

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गणतंत्र दिवस (Republic Day) 26 जनवरी को मनाया जाता है. 1950 में 26 जनवरी (26 January) के दिन ही भारत सरकार अधिनियम (एक्ट) (1935) को हटाकर भारत का संविधान लागू किया गया था. 26 जनवरी 1950 को सुबह 10.18 बजे भारत एक गणतंत्र बना. इस के छह मिनट बाद 10.24 बजे राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी. इस दिन पहली बार बतौर राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद बग्गी पर बैठकर राष्ट्रपति भवन से निकले थे. इस दिन पहली बार उन्होंने भारतीय सैन्य बल की सलामी ली थी. पहली बार उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया था. बता दें कि एक स्वतंत्र गणराज्य बनने के लिए संविधान को 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा अपनाया गया. डॉ. भीमराव आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे. डॉ भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व में हमारे देश का संविधान लिखा गया, जिसे लिखने में पूरे 2 साल 11 महीने और 18 दिन लगे. बता दें कि पूर्ण स्वराज दिवस (26 जनवरी 1930) को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान 26 जनवरी को लागू किया गया था. गणतंत्र दिवस (Indian Republic Day) के अवसर पर राष्ट्रपति तिरंगा फहराते हैं और हर साल 21 तोपों की सलामी दी जाती है.

26 जनवरी को ही क्‍यों मनाया जाता है गणतंत्र दिवस?
26 जनवरी (26 January) का दिन भारत के इतिहास में विशेष महत्व रखता है. इस दिन कई ऐतिहासिक घटनाएं हुई थी. साल 1929 में दिसंबर में लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ. इस अधिवेशन में प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की गई कि यदि अंग्रेज सरकार द्वारा 26 जनवरी 1930 तक भारत को डोमीनियन का दर्जा नहीं दिया गया तो भारत को पूर्ण रूप से स्‍वतंत्र देश घोषित कर दिया जाएगा. जब अंग्रेज सरकार ने कुछ नहीं किया तब कांग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को भारत को पूर्ण स्वराज घोषित कर दिया. भारत की आजादी के बाद संविधान सभा की घोषणा की गई जिसने अपना कार्य 9 दिसम्बर 1947 से शुरु किया. संविधान सभा ने  2 साल, 11 महीने, 18 दिन में भारतीय संविधान का निर्माण किया.
26 नवंबर 1949 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारतीय संविधान सुपूर्द किया गया, इसी लिए हर साल 26 नवंबर को  संविधान दिवस (Constitution Day) के रूप में मनाया जाता है. बता दें कि अनेक सुधारों और बदलावों के बाद सभा के 308 सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को संविधान की दो हस्तलिखित कॉपियों पर हस्ताक्षर किये. इसके दो दिन बाद संविधान 26 जनवरी को देश भर में लागू हो गया. 26 जनवरी का महत्व बनाए रखने के लिए इसी दिन संविधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यूएंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई. इसलिए 26 जनवरी (26th January) को हर साल गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है.
ये संविधान क्या होता है?
भारत राज्यों का संघ : भारत राज्‍यों का एक संघ है। य‍ह संसदीय प्रणाली की सरकार वाला एक स्‍वतंत्र प्रभुसत्ता सम्‍पन्‍न समाजवादी लोकतंत्रात्‍मक गणराज्‍य है। यह गणराज्‍य भारत के संविधान के अनुसार शासित है, जिसे संविधान सभा द्वारा 26 नवम्‍बर 1949 को ग्रहण किया गया तथा जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
सबसे बड़ा संविधान : विश्व में भारत का संविधान सबसे बड़ा लिखित संविधान है। संविधान लागू होने के समय इसमें 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियां और 22 भाग थे, जो वर्तमान में बढ़कर 448 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियां और 25 भाग हो गए हैं। साथ ही इसमें पांच परिशिष्ठ भी जोड़ दिए गए हैं, जो कि प्रारंभ में नहीं थे।  
संविधान का मसौदा : 29 अगस्त 1947 को भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति की स्थापना हुई, जिसमें अध्यक्ष के रूप में डॉ. भीमराव अंबेडकर की नियुक्ति हुई। इसीलिए डॉ. अंबेडकर को संविधान निर्माता भी कहा जाता है। 
संविधान सभा के सदस्य : संविधान सभा के 284 सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए, जिनमें 15 महिलाएं भी शामिल थीं। इसके पश्चात 26 जनवरी को भारत का संविधान अस्तित्व में आया। इसे पारित करने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। 
संविधान की प्रस्तावना : भारतीय संविधान की प्रस्तावना अमेरिकी संविधान से प्रभावित तथा विश्व में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। प्रस्तावना के माध्यम से भारतीय संविधान का सार, अपेक्षाएं, उद्देश्य उसका लक्ष्य तथा दर्शन प्रकट होता है। प्रस्तावना यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है इसी कारण यह 'हम भारत के लोग' इस वाक्य से प्रारम्भ होती है।
संविधान की विशेषता : भारत के संविधान की विशेषता यह है कि वह संघात्मक भी है और एकात्मक भी। भारत के संविधान में संघात्मक संविधान की सभी उपर्युक्त विशेषताएं विद्यमान हैं। दूसरी विशेषता यह है कि आपातकाल में भारतीय संविधान में एकात्मक संविधानों के अनुरूप केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए प्रावधान निहित हैं।
तीसरी विशेषता यह है कि केवल एक नागरिकता का ही समावेश किया गया है तथा एक ही संविधान केंद्र तथा राज्य दोनों ही सरकारों के कार्य संचालन के लिए व्यवस्थाएं प्रदान करता है। इसके अलावा संविधान में कुछ अच्छी चीजें विश्व के दूसरे संविधानों से भी संकलित की गई हैं।
संसदीय स्वरूप : संविधान में सरकार के संसदीय स्‍वरूप की व्‍यवस्‍था की गई है जिसकी संरचना कतिपय एकात्‍मक विशिष्‍टताओं सहित संघीय हो। केन्‍द्रीय कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख राष्‍ट्रपति है। भारत के संविधान की धारा 79 के अनुसार, केन्‍द्रीय संसद की परिषद में राष्‍ट्रपति तथा दो सदन है जिन्‍हें राज्‍यों की परिषद (राज्‍य सभा) तथा लोगों का सदन (लोक सभा) के नाम से जाना जाता है। 
संविधान की धारा 74 (1) में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि राष्‍ट्रपति की सहायता करने तथा उसे सलाह देने के लिए एक मंत्री परिषद होगी जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा, राष्‍ट्रपति सलाह के अनुसार अपने कार्यों का निष्‍पादन करेगा। इस प्रकार वास्‍तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद में निहित है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री है।
संविधान के प्रमुख तीन बिन्दु : भारत का संविधान तीन प्रमुख बिंदुओं पर आधारित है। पहला राजनीतिक सिद्धांत, जिसके अनुसार भारत एक लोकतांत्रिक देश होगा। यह सार्वभौम, धर्मनिरपेक्ष्य राज्य होगा।
दूसरा भारत की सरकारी संस्थाओं के मध्य किस प्रकार का संबंध होगा। वे एक दूसरे के साथ किस प्रकार कार्य करेंगे। सरकारी संस्थाओं के क्या अधिकार होंगे, क्या कर्तव्य होंगे और किस प्रकार की प्रक्रिया संस्थाओं पर लागू होगी। तीसरा, भारतीय नागरिकों को कौन कौन से मौलिक अधिकार प्राप्त होंगे तथा नागरिकों के क्या कर्तव्य होंगे। इसके अलावा राज्य के नीति निर्देशक तत्व क्या होंगे।
संविधान संशोधन : संविधान सभा के मतानुसार देश चहुंमुखी विकास लिए समय-समय पर उपयुक्त प्रावधानों की आवश्यकता पड़ सकती है, जिसके लिए संविधान संशोधन की तीन विभिन्न प्रक्रियाएं दी गई हैं। संविधान में पहला संशोधन 18 जून 1951 को किया गया था, जबकि अब तक संविधान में 100 संशोधन किए जा चुके हैं। 
धर्मनिरपेक्षता : समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द संविधान के 1976 में हुए 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में जोड़े गए। इससे पहले धर्मनिरपेक्ष के स्थान पर पंथनिरपेक्ष शब्द था। यह अपने सभी नागरिकों को जाति, रंग, नस्ल, लिंग, धर्म या भाषा के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना सभी को बराबरी का दर्जा और अवसर देता है।

महात्मा गांधी को क्या वाक़ई ग़लत आंकते थे भीम राव आंबेडकर?

    


26 फ़रवरी, 1955 को बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में महात्मा गांधी के व्यक्तित्व की तीखी आलोचना की थी.
आंबेडकर का महात्मा गांधी के प्रति नज़रिया तब और अब, दोनों वक़्तों में बहस का विषय रहा है. इंटरनेट की वजह से आज हम उस इंटरव्यू को सुन पा रहे हैं.
डॉक्टर आंबेडकर की रिकॉर्डिंग बहुत कम है, ऐसे में बीबीसी का इंटरव्यू एक महत्वपूर्ण आर्काइव है.
इस इंटरव्यू में डॉक्टर आंबेडकर ने गांधी के बारे में कई तीखी बातें कही हैं. गांधी को ख़ारिज करने वालों के लिए ये इंटरव्यू एक संगीत की तरह है, जो उनके कानों को अच्छा लगेगा. हालांकि ये उन लोगों को चकित नहीं करेगा जो गांधी-आंबेडकर के रिश्तों के बारे में जानते हैं.
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी नई किताब 'गांधीः द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड' ने इस इंटरव्यू का यह कहते हुए जिक्र किया है कि "1930 और 1940 के दशक में लिखे उनकी विवादित रचनाओं में भी उन्होंने (डॉक्टर आंबेडकर) गांधी की निंदा की है."
63 साल पहले की गई उनकी आलोचनाओं में उन्होंने अपनी राय, ऐतिहासिक दावों और विश्लेषण को शामिल किया था.

गांधी को ऐतिहासिक शख़्सियत के रूप में याद किया जाता है

छह दशक बाद कड़वाहट और ख़ारिज करने के दृष्टिकोण भरे उस इंटरव्यू को दोबारा पढ़ना ज़रूरी है.
आंबेडकर के मुताबिक, "गांधी भारत के इतिहास में एक प्रकरण थे, वो कभी एक युग-निर्माता नहीं थे. गांधी पहले से ही इस देश के लोगों के ज़ेहन से ग़ायब हो चुके हैं. उनकी याद इसी कारण आती है कि कांग्रेस पार्टी उनके जन्मदिन या उनके जीवन से जुड़े किसी अन्य दिन सालाना छुट्टी देती है. हर साल सप्ताह में सात दिनों तक एक उत्सव मनाया जाता है. स्वाभाविक रूप से लोगों की स्मृति को पुनर्जीवित किया जाता है."
गांधी एक युग निर्माता थे या नहीं, यह एक खुला सवाल है और इसका सही जवाब पाना और उसे सभी के लिए स्वीकार करना मुश्किल है.
यह तब और मुश्किल है जब गांधी को इस दुनिया से गए हुए महज सात दशक हुए हैं. और जहां तक बात रही छुट्टियों के जरिए उन्हें लोगों की स्मृति में बनाए रखने का तो यह कल की बात है. गांधी आज भी जिंदा हैं और हम उन्हें आने वाले समय में भी याद रखेंगे.( हम गांधी को एक ऐतिहासिक शख़्सियत की बात कर रहे हैं न कि उनके विचारों की)

एक ही दृष्टिकोण से गांधी को देखा

आंबेडकर ने कहा कि वो गांधी से हमेशा एक प्रतिद्वंद्वी की हैसियत से मिलते थे. इसलिए वो गांधी को अन्य लोगों की तुलना में बेहतर जानते थे.
आंबेडकर ने इंटरव्यू मे कहा था, "आमतौर पर भक्तों के रूप में उनके पास जाने पर कुछ नहीं दिखता, सिवाय बाहरी आवरण के, जो उन्होंने महात्मा के रूप में ओढ़ रखा था. लेकिन मैंने उन्हें एक इंसान की हैसियत से देखा, उनके अंदर के नंगे आदमी को देखा, लिहाज़ा मैं कह सकता हूं कि जो लोग उनसे जुड़े थे, मैं उनके मुक़ाबले गांधी को बेहतर समझता हूं."
आंबेडकर के नज़रिए से ये दावे शायद सही हों, पर उनके बयान से यह स्पष्ट है कि उन्होंने गांधी को केवल एक दृष्टिकोण और एक तरह के नज़रिए से ही देखा था और इसी की बदौलत उन्होंने गांधी के बारे में अपनी राय बनाई थी.
राजनीतिक ज़रूरतों के लिए उन्होंने गांधी के लिए शालीनता और कोमलता का भी प्रदर्शन कई बार किया. जैसे, 6 सितंबर 1954 को डॉक्टर आंबेडकर ने नमक पर टैक्स लगाने की सलाह दी और इसका नाम 'गांधी निधि' रखने का सुझाव दिया. वो चाहते थे कि इसमें जमा राशि का खर्च दलितों के उत्थान के लिए किया जाए.
उन्होंने कहा था, "मेरे मन में गांधीजी के प्रति आदर है. आप जानते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, गांधीजी को पिछड़ी जाति के लोग अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारे थे. इसलिए वह स्वर्ग में से भी आशीर्वाद देंगे."

गांधी की 'दोहरी भूमिका' एक ग़लतफहमी

आंबेडकर ने इंटरव्यू में गांधी पर आरोप लगाया है, "गांधी हर समय दोहरी भूमिका निभाते थे. उन्होंने युवा भारत के सामने दो अख़बार निकाले. पहला 'हरिजन' अंग्रेज़ी में, और गुजरात में उन्होंने एक और अख़बार निकाला जिसे आप 'दीनबंधु' या इसी प्रकार का कुछ कहते हैं. अंग्रेज़ी समाचार पत्र में उन्होंने ख़ुद को जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता का विरोधी और ख़ुद को लोकतांत्रिक बताया. लेकिन अगर आप गुजराती पत्रिका को पढ़ते हैं तो आप उन्हें अधिक रूढ़िवादी व्यक्ति के रूप में देखेंगे. वो जाति व्यवस्था, वर्णाश्रम धर्म या सभी रूढ़िवादी सिद्धांतों के समर्थक थे. दरअसल किसी को गांधी के 'हरिजन' में दिए गए बयान और गुजराती अख़बार में दिए उनके बयानों का तुलनात्मक अध्ययन करके उनकी जीवनी लिखनी चाहिए."
इस इंटरव्यू के बाद के सालों में बहुत कुछ हुआ. गांधी के सभी लेख मूल रूप में आज उपलब्ध हैं. इनके अनुवाद भी किए गए हैं, जो 100 खंडों में हमारे बीच मौजूद हैं.
किसी के लिए आज गांधी के गुजराती लेखों को अंग्रेज़ी में प्राप्त करना आसान है. गांधी की विरासत को समेटे वेबसाइट पोर्टल ( gandhiheritageportal.com) पर भी हरिजन (अंग्रेजी), 'हरिजन सेवक' (हिंदी) और 'हरिजन बंधु' (गुजरात) के लगभग सभी अंक उपलब्ध हैं.
कोई भी आसानी से उनके गुजराती और अंग्रेज़ी के लेखों की तुलना कर सकता है और अपनी ग़लतफहमी को दूर कर सकता है.
इन लेखों के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि गांधी ने अपने अंग्रेज़ी लेखों में जाति-व्यवस्था का जोरदार समर्थन किया और गुजराती लेखों में सख्त शब्दों में छूआछूत का विरोध किया है.
गांधी को ख़ारिज नहीं किया जा सकता
डॉक्टर आंबेडकर ने छूआछूत के उन्मूलन के साथ समान अवसर और गरिमा पर जोर दिया था और दावा किया कि गांधी इसके विरोधी थे.
उनके मुताबिक गांधी छूआछूत की बात सिर्फ़ इसलिए करते थे ताकि अस्पृश्यों को कांग्रेस के साथ जोड़ सकें. वो चाहते थे कि अस्पृश्य स्वराज की उनकी अवधारणा का विरोध न करें.
गांधी एक कट्टरपंथी सुधारक नहीं थे और उन्होंने ज्योतिराव फूले या फिर डॉक्टर आंबेडकर के तरीके से जाति व्यवस्था को खत्म करने का प्रयास नहीं किया.
फिर भी, कांग्रेस या राष्ट्रीय राजनीति में उतरने से पहले गांधी ने 1915 में अपने आश्रम में एक दलित परिवार को रहने दिया. उनके इस फ़ैसले का काफी विरोध हुआ और आश्रम बंद होने की संभावना बढ़ने लगी थी, लेकिन वो अपने फैसले से पलटे नहीं.
ऐसे कई उदाहरण हैं. और अगर बात की जाए दलित अधिकारियों की तो उन्होंने अपने कैबिनेट में जगजीवन राम और खुद डॉक्टर आंबेडकर को जगह दी थी.
डॉक्टर आंबेडकर ने सही कहा था कि अंग्रेजों ने भारत को आज़ादी देने पर सहमति गांधी के आंदोलनों की वजह से नहीं बल्कि अन्य दूसरे कारणों से दी थी.
गांधी और आंबेडकर के बीच दलितों के लिए अलग मतदाता सूची और पूना पैक्ट विवाद का मुद्दा था. आंबेडकर का दावा भी सही था. मुंबई इलाक़े में डॉक्टर आंबेडकर की पार्टी के समर्थित 17 में से 15 उम्मीदवारों ने आरक्षित सीट पर जीत हासिल की थी. बाकी अन्य 151 आरक्षित सीटों पर कांग्रेस ने आधी से ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की थी.
डॉक्टर आंबेडकर ने जो कुछ भी इंटरव्यू में कहा है, उसके आधार पर वर्तमान समय में गांधी को खारिज नहीं किया जा सकता है और यह सही भी नहीं है.

विश्व थैलेसिमिया दिवस - अस्थि मज़्ज़ा ट्रांसप्लांटेशन ही ईलाज़!

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"हँसने-खेलने और मस्ती करने की उम्र में बच्चों को लगातार अस्पतालों के, ब्लड बैंक के चक्कर काटने पड़ें तो सोचिए उनका और उनके परिजनों का क्या हाल होगा! सूखता चेहरा, लगातार बीमार रहना, वजन ना ब़ढ़ना और इसी तरह के कई लक्षण बच्चों में थेलेसीमिया रोग होने पर दिखाई देते हैं। माता-पिता से अनुवांशिकता के तौर पर मिलने वाली इस बीमारी की विडंबना है कि इसके कारणों का पता लगाकर इससे बचा नहीं जा सकता।"

क्या है थेलेसीमिया:- यह एक ऐसा रोग है जो बच्चों में जन्म से ही मौजूद रहता है। तीन माह की उम्र के बाद ही इसकी पहचान होती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इसमें बच्चे के शरीर में खून की भारी कमी होने लगती है, जिसके कारण उसे बार-बार बाहरी खून की जरूरत होती है। खून की कमी से हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है एवं बार-बार खून चढ़ाने के कारण मरीज के शरीर में अतिरिक्त लौह तत्व जमा होने लगता है, जो हृदय में पहुँचकर प्राणघातक साबित होता है।

आनुवांशिक बीमारी :- प्रत्येक वर्ष 8 मई को मनाया जाता है। थैलेसिमिया रोग के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। यह बीमारी आनुवांशिक है, रिश्तेदारी के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। बीमारी का जन्म शिशु के साथ होता है, जो उम्रभर साथ नहीं छोड़ती। इसका सिर्फ एक समाधान है, रिश्तों में सावधानी। यह बीमारी कुछ विशेष समुदायों में है। उन समुदायों के रिवाज ही इस बीमारी को रोक सकते हैं। थैलेसिमिया एक आनुवांशिक बीमारी है, जो माता-पिता से संतान को होती है। इस रोग के होने पर शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है जिसके कारण रक्तक्षीणता के लक्षण प्रकट होते हैं। इसकी पहचान तीन माह की आयु के बाद ही होती है। इसमें रोगी बच्चे के शरीर में रक्त की भारी कमी होने लगती है जिसके कारण उसे बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। इस बीमारी से ग्रस्त शरीर में लाल रक्त कण बनने बंद हो जाते हैं। इससे शरीर में रक्त की कमी आ जाती है। बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। रंग पीला पड़ जाता है। इस रोग से बच्चों में जिगर, तिल्ली और हृदय की साइज बढ़ने, शरीर में चमड़ी का रंग काला पड़ने जैसी विकट स्थितियां पैदा होती हैं। इस रोग को लेकर महिला के प्रसव से पूर्व ध्यान रखने की जरूरत है। एक शोध के मुताबिक भारत में प्रति वर्ष लगभग 8 से 10 थैलेसिमिया रोगी जन्म लेते हैं। वर्तमान में भारत में लगभग 2,25,000 बच्चे थैलेसिमिया रोग से ग्रस्त हैं। बच्चे में 6 माह, 18 माह के भीतर थैलेसिमिया का लक्षण प्रकट होने लगता है। बच्चा पीला पड़ जाता है, पूरी नींद नहीं लेता, खाना-पीना अच्छा नहीं लगता है, बच्चे को उल्टियां, दस्त और बुखार से पीड़ित हो जाता है। आनुवांशिक मार्गदर्शन और थैलेसिमिया माइनर का दवाइयों से उपचार संभव है। थैलेसिमिया रोग से बचने के लिए माता-पिता का डीएनए परीक्षण कराना अनिवार्य होता है। साथ ही रिश्तेदारों का भी डीएनए परीक्षण करवाकर रोग पर प्रभावी नियंत्रण संभव है। विवाह से पूर्व जन्मपत्री मिलाने के साथ-साथ दूल्हे और दुल्हन का एचबीए- 2 का टेस्ट कराना चाहिए। सावधानियाँ रोगी को बार-बार खून चढ़ाने से शरीर में लौह तत्त्व की मात्रा बढ़ जाती है। इसलिए रोगी को हरी पत्तेदार सब्जी, गुड़, मांस, अनार, तरबूज, चीकू कम देना चाहिए। बोन मेरो ट्रांसप्लांट(Bone Marrow Transplantation) से इसका इलाज संभव है। इलाज की यह पद्धति काफी महंगी है। अब वैज्ञानिक नई तकनीक पर प्रयोग कर रहे हैं, जिसका नाम स्टेम सैल थैरेपी है।
दो प्रकार:- थैलासीमिया दो प्रकार का होता है। यदि पैदा होने वाले बच्चे के माता-पिता दोनों के जींस में माइनर थेलेसीमिया होता है, तो बच्चे में मेजर थेलेसीमिया हो सकता है, जो काफी घातक हो सकता है। किन्तु पालकों में से एक ही में माइनर थेलेसीमिया होने पर किसी बच्चे को खतरा नहीं होता। यदि माता-पिता दोनों को माइनर रोग है तब भी बच्चे को यह रोग होने के 25 प्रतिशत संभावना है। अतः यह अत्यावश्यक है कि विवाह से पहले महिला-पुरुष दोनों अपनी जाँच करा लें।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत देश में हर वर्ष सात से दस हजार थैलीसीमिया पीडि़त बच्चों का जन्म होता है। केवल दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ही यह संख्या करीब 1500 है। भारत की कुल जनसंख्या का 3.4 प्रतिशत भाग थैलेसीमिया ग्रस्त है। इंग्लैंड में केवल 360 बच्चे इस रोग के शिकार हैं, जबकि पाकिस्तान में 1 लाख और भारत में करीब 10 लाख बच्चे इस रोग से ग्रसित हैं। थेलेसीमिया से पी‍डि़त अधिकांश गरीब बच्चे 8-10 वर्ष से ज्यादा नहीं जी पाते है। बिहार में पी‍डि़त की संख्या 700 है। बीमारी के कारण अब तक 300 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। वर्ष 2016 में पटना शहर में 76 थेलेसीमिया पी‍डि़त बच्चों ने जन्म लिया है। 2018 में 30 से ज्यादा पी‍डि़त बच्चों की मौत हुई है। अन्य राज्यों की अपेक्षा थेलेसीमिया पी‍डि़त बच्चों के प्रति बिहार सरकार उदासीन है, इसकी रोकथाम हेतु सरकारी योजनाओं की जरूरत है।
इस रोग का फिलहाल कोई ईलाज नहीं है। हीमोग्लोबीन दो तरह के प्रोटीन से बनता है अल्फा ग्लोबिन और बीटा ग्लोबिन। थैलीसीमिया इन प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी होने से होता है। जिसके कारण लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से नष्ट होती है। रक्त की भारी कमी होने के कारण रोगी के शरीर में बार-बार रक्त चढ़ाना पड़ता है। रक्त की कमी से हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है एवं बार-बार रक्त चढ़ाने के कारण रोगी के शरीर में अतिरिक्त लौह तत्व जमा होने लगता है, जोहृदय, यकृत और फेफड़ों में पहुँचकर प्राणघातक होता है। मुख्यतः यह रोग दो वर्गों में बांटा गया है:

1.मेजर थैलेसेमिया:-यह बीमारी उन बच्चों में होने की संभावना अधिक होती है, जिनके माता-पिता दोनों के जींस में थैलीसीमिया होता है। जिसे थैलीसीमिया मेजर कहा जाता है।
2.माइनर थैलेसेमिया:-थैलीसीमिया माइनर उन बच्चों को होता है, जिन्हें प्रभावित जीन माता-पिता दोनों में से किसी एक से प्राप्त होता है। जहां तक बीमारी की जांच की बात है तो सूक्ष्मदर्शी यंत्र पर रक्त जांच के समय लाल रक्त कणों की संख्या में कमी और उनके आकार में बदलाव की जांच से इस बीमारी को पकड़ा जा सकता है।
पूर्ण रक्तकण गणना (कंपलीट ब्लड काउंट) यानि सीबीसी से रक्ताल्पता या एनीमिया का पता लगाया जाता है। एक अन्य परीक्षण जिसे हीमोग्लोबिन इलैक्ट्रोफोरेसिस कहा जाता है से असामान्य हीमोग्लोबिन का पता लगता है। इसके अलावा म्यूटेशन एनालिसिस टेस्ट (एमएटी) के द्वारा एल्फा थैलीसिमिया की जांच के बारे में जाना जा सकता है। मेरूरज्जा ट्रांसप्लांट से भी इस बीमारी के उपचार में मदद मिलती है।

लक्षण:-सूखता चेहरा, लगातार बीमार रहना, वजन ना ब़ढ़ना और इसी तरह के कई लक्षण बच्चों में थेलेसीमिया रोग होने पर दिखाई देते हैं। बार-बार बीमारी होना, सर्दी, जुकाम बने रहना, कमजोरी और उदासी रहना, आयु के अनुसार शारीरिक विकास न होना, शरीर में पीलापन बना रहना व दाँत बाहर की ओर निकल आना, साँस लेने में तकलीफ होना और कई तरह के संक्रमण होना होता है।

बचाव एवं सावधानी:- अस्थि मज़्ज़ा ट्रांसप्लांटेशन (एक किस्म का ऑपरेशन) इसमें काफी हद तक फायदेमंद होता है, लेकिन इसका खर्च काफी ज्यादा होता है। मप्र और छत्तीसग़ढ़ में थेलेसीमिया, सिकल सेल, सिकलथेल, हिमोफेलिया आदि से पी‍डि़त बच्चों की संख्या 30 हजार से ज्यादा है।
थेलेसीमिया पी‍डि़त के इलाज में काफी बाहरी रक्त चढ़ाने और दवाइयों की आवश्यकता होती है। इस कारण सभी इसका इलाज नहीं करवा पाते, जिससे 12 से 15 वर्ष की आयु में बच्चों की मृत्य हो जाती है। विवाह से पहले महिला-पुरुष की रक्त की जाँच कराएँ,गर्भावस्था के दौरान इसकी जाँच कराएँ, मरीज की हीमोग्लोबिन 11 या 12 बनाए रखने की कोशिश करें और समय पर दवाइयाँ लें और इलाज पूरा लें। सही इलाज करने पर 25 वर्ष व इससे अधिक जीने की आशा होती है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, रक्त की जरूरत भी बढ़ती जाती है। विवाह से पहले महिला-पुरुष की रक्त की जाँच कराएँ। गर्भावस्था के दौरान इसकी जाँच कराएँ,रोगी की हीमोग्लोबिन 11 या 12 बनाए रखने की कोशिश करें और समय पर दवाइयाँ लें और इलाज पूरा लें। विवाह पूर्व जांच को प्रेरित करने हेतु एक स्वास्थ्य कुण्डली का निर्माण किया गया है, जिसे विवाह पूर्व वर-वधु को अपनी जन्म कुण्डली के साथ साथ मिलवाना चाहिये। स्वास्थ्य कुंडली में कुछ जांच की जाती है, जिससे शादी के बंधन में बंधने वाले जोड़े यह जान सकें कि उनका स्वास्थ्य एक दूसरे के अनुकूल है या नहीं। स्वास्थ्य कुंडली के तहत सबसे पहली जांच थैलीसीमिया की होगी। एचआईवी, हेपाटाइटिस बी और सी। इसके अलावा उनके रक्त की तुलना भी की जाएगी और रक्त में RH फैक्टर की भी जांच की जाएगी। इस प्रकार के रोगियों के लिए कितनी ही संस्थायें रक्त प्रबंध कराती हैं। इसके अलावा बहुत से रक्तदान आतुर सज्जन तत्पर रहते हैं।

शोध और विकास :-थैलेसीमिया पर विश्व भर में शोध अनुसंधान अन्वरत जारी हैं। इन प्रयासों से ही थैलीसीमिया पीड़ितों के लिए एक दवाई अविष्कृत हुई थी। इस दवाई से बच्चों को अब इंजेक्शन के दर्द को नहीं झेलना पड़ेगा। जल्दी ही भारतीय बाजार में ये दवा आने वाली है, जिसे खाने से ही शरीर में लौह मात्रा नियंत्रित हो जाएगी। असुरां नाम की यह दवा पश्चिमी देशों में एक्स जेड नाम से पहले से ही प्रयोग हो रही है। इससे इलाज का खर्च भी कम हो जाएगा, किंतु इसके दुष्प्रभावों (साइड एफ़ेक्ट्स) में इससे किडनी प्रभावित होने का एक परसेंट खतरा बना रहता है। दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के थैलीसीमिया इकाई के अध्यक्ष डॉ॰ वीरेंद खन्ना के अनुसार भारत में अतिरिक्त लौह निकालने के लिए दो तरीके प्रचलन में हैं। पहले तरीके में डेसोरॉल (इंजेक्शन) के जरिए आठ से दस घण्टे तक लौह निकाला जाता है। यह प्रक्रिया बहुत महंगी और कष्टदायक होती है। इसमें प्रयोग होने वाले एक इंजेक्शन की कीमत 164 रुपए होती है। इस प्रक्रिया में हर साल पचास हजार से डेढ़ लाख रुपए तक खर्च आता है। दूसरी प्रक्रिया में कैलफर नामक दवा (कैप्सूल) दी जाती है। यह दवा सस्ती तो है लेकिन इसका इस्तेमाल करने वाले 30 प्रतिशत रोगियों को जोड़ों में दर्द की समस्या हो जाती है। साथ ही इनमें से एक प्रतिशत बच्चे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। ऐसे में नई दवा असुरां काफ़ी लाभदायक होगी। यह दवा फलों के रस के साथ मिलाकर पिलाई जाती है और इसकी कीमत 100 रुपये प्रति डोज है। 
मेरु रज्जू ट्रांस्प्लांट :-थैलेसीमिया के लिये स्टेम सेल से उपचार की भी संभावनाएं हैं। इसके अलावा इस रोग के रोगियों के मेरु रज्जु (बोन मैरो) ट्रांस्प्लांट हेतु अब भारत में भी बोनमैरो डोनर रजिस्ट्री खुल गई है। मैरो डोनर रजिस्ट्री इंडिया (एम.डी.आर.आई) में बोनमैरो दान करने वालों के बारे में सभी आवश्यक जानकारियां होगी जिससे देश के ही नहीं वरन विदेश से इलाज के लिए भारत आने वाले रोगियों का भी आसानी से उपचार हो सकेगा। यह केंद्र मुंबई में स्थापित किया जाएगा। ऐसे केंद्र वर्तमान में केवल अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशो में ही थे। ल्यूकेमिया और थैलीसीमिया के रोगी अब बोनमैरो या स्टेम सेल प्राप्त करने के लिए इस केंद्र से संपर्क कर मेरुरज्जु दान करने वालों के बारे में जानकारी के अलावा उनके रक्त तथा लार के नमूनों की जांच रिपोर्ट की जानकारी भी ले पाएंगे। जल्दी ही इसकी शाखाएं महानगरों में भी खुलने की योजना है।
थैलेसीमिया चिल्ड्रन सोसायटी, जयपुर के तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय थैलेसीमिया दिवस 8 मई को दो स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। अध्यक्ष नरेश भाटिया ने बताया कि पहला कार्यक्रम सुबह 9 बजे जेके लोन अस्पताल के सभाग्रह में थैलेसीमिया रोग संबंधित समस्याओं और निदान पर जेके लोन एसएमएस अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा व्याख्यान दिया जाएगा। दूसरे कार्यक्रम के तहत दोपहर 3 बजे संतोकबा दुर्लभजी के हेमलता दुर्लभजी सभाग्रह में थैलेसीमिया बच्चों की निशुल्क शारीरिक जांच, शरीर में लोहे की मात्रा की जांच आदि के लिए रक्त के सैम्पल लिए जाएंगे। सायं 6 बजे से थैलेसीमिया बच्चों अन्य कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।