Shamsher ALI Siddiquee: History

Shamsher ALI Siddiquee

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राजीव गांधी: आईये जानें उनसे जुड़े 15 रोचक तथ्य

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आज हम बात करेगे एक ऐसे शख़्स की जो सबसे कम उम्र का प्रधानमंत्री बना लेकिन उतनी ही जल्दी मर भी गया. जिसने आज की जरूरतों को बहुत पहले समझ लिया था. जी, हम बात कर रहे है राजीव गांधी की.
1. राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ. इनका नाम राजीव इसलिए रखा गया क्योकिं नेहरू की पत्नी का नाम था कमला. और राजीव का मतलब होता है कमल. कमला की यादें ताजी बनी रहे इसलिए नेहरू ने इनका नाम राजीव रखा।
2. बचपन में राजीव गांधी ने खेल-खेल में महात्मा गांधी के पैरों में फूल चढ़ा दिए तो महात्मा गांधी ने कहा बेटा ऐसा किसी की मृत्यु होने पर करते है. संयोग देखिए, अगले ही दिन गोली मारकर महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई।
3. राजीव गांधी हायर एजुकेशन के लिए लंदन गए. यहाँ उन्होनें एक के बाद एक दो काॅलेज में एडमिशन लिया. लेकिन दोनों जगह किसी न किसी कारण से पढ़ाई पूरी न कर सके।
4. लंदन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए राजीव की मुलाकात एक लड़की से हुई जो इटली की रहने वाली थी और नाम था एडविग एन्टोनिया एल्बीना माइनो. यही वो लड़की है जो शादी के बाद सोनिया गांधी बनकर भारत आई. भारत आने के बाद सोनिया गांधी दिल्ली में अमिताभ बच्चन के घर रही थी।
5. सोनिया गांधी कैम्ब्रिज़ यूनिवर्सिटी में पढ़ती जरूर थी लेकिन पैसों के लिए एक रेस्टोरेंट में वेटर का काम भी करती थी।
6. राजीव गांधी पेशे से पायलट थे उन्होनें एयर इंडिया में नौकरी भी की. लेकिन बाद में दबाव बनाने के बाद राजनीति में आए. ये दबाव माँ इंदिरा ने 1980 में संजय गांधी की मौत के बाद बनाया था।
7. माँ इंदिरा की मौत के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोकसभा की सबसे बड़ी जीत हासिल की थी. 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने 533 में से 404 सीट हासिल की। इसी जीत के साथ राजीव गांधी भारत के 7th प्रधानमंत्री बन गए।
8. राजीव गाँधी को टेक्नोलाॅजी से बहुत प्यार था. इनके कार्यकाल के दौरान ही MTNL का गठन हुआ था।
9. 21 मई 1991, रात 10 बजकर 15 मिनट पर तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में लिट्टे के मानव बम ने राजीव गाँधी को मार दिया।
10. राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन दोनों खास़ दोस्त थे. राजीव की मृत्यु के दिन अमिताभ बच्चन और राहुल गाँधी अमेरिका में थे. दोनों एक ही प्लेन से भारत आए थे।
11. राजीव गाँधी की मौत की फुल तैयारी हुई थी जैसे परेड की रिहर्सल होती है ना, वैसे ही लिट्टे की धनु ने भी 12 मई 1991 को रैली को संबोधित करने आए पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल के नेता वी.पी. सिँह के पैर छुए थे. ठीक उसी तरह जैसे 9 दिन बाद राजीव गाँधी के छुए थे. ये सब रिहर्सल के तौर पर किया गया था. फर्क बस इतना था कि कुर्ते के नीचे बम नही था।
12. लिट्टे की राजीव गाँधी से क्या दुश्मनी थी ?
 श्रीलंका में गृहयुद्ध चल रहा था तो राजीव गाँधी ने श्रीलंका के राष्ट्रपति जे आर जयवर्धने के साथ एक समझौता किया था यानि एक जुबान दी थी. अपने कहे अनुसार, राजीव गांधी ने युद्ध रोकने के लिए भारतीय सेना को श्रीलंका में तैनात कर दिया. लेकिन इस समझौते के बीच में एक अड़चन बनी हुई थी जिसका नाम था लिट्टे. लिट्टे नही चाहता था कि भारत की शांति सेना को श्रीलंका भेजा जाए. शांति सेना भेजे जाने से पहले लिट्टे प्रमुख वी प्रभाकरन दिल्ली में राजीव गांधी से मिलने आया था. राजीव उसके साथ सख्ती से पेश आए. प्रभाकरन ने तमिल हितों की खातिर राजीव की बात मानने से इंकार कर दिया तो राजीव ने प्रभाकरन को 5 स्टार होटल अशोका में बात मानने तक नज़रबंद करा दिया. प्रभाकरन ने भी मन मारकर झूठ-मूठ की हाँ भर दी. जब प्रभाकरन सारी बातें मान गया तो उसे श्रीलंका जाने की इजाजत दी गई. इस घटना के बाद प्रभाकरन राजीव का जानी दुशमन बन गया और अब तो बस राजीव को मारने के मौके का इंतजार करने लगा।
13. जब वी प्रभाकरन राजीव से मिलने दिल्ली आए थे तो चलते समय राजीव गांधी ने उन्हें एक पर्सनल गिफ्ट दिया था, अपनी बुलेट प्रूफ जैकेट।
14. राजीव गांधी ने लिट्टे को सपोर्ट क्यों नही किया ?
 ट्रेनिंग लेने के लिए 5 संगठन भारत आए थे PLOTE, TELO, EPRLF, EROS, LTTE. ये सभी संगठन वो काम करते थे जो भारत कहता था लेकिन कुछ दिनों बाद LTTE ने भारत की बातें मानने से मना कर दिया. लिट्टे अपने सैनिकों के साथ वापिस श्रीलंका चला गया. अब लिट्टे से लड़ने के लिए भारत ने IPKF जवान श्रीलंका भेजे लेकिन कुछ सफलता नही मिली और लिट्टे के कारण भारत ने अपने 1200 IPKF जवान खो दिए. यही दो प्रमुख वजह थी।
15. राजीव गाँधी की मौत की पूरी कहानी....
 चुनाव का प्रचार जोर-शोर से हो रहा था. 21 मई 1991 को राजीव गांधी एक रैली को संबोधित करने के लिए चेन्नई से 30 किलोमीटर दूर श्रीपेरंबुदूर में पहुंचे. हाथों में माला लिए हजारों लोग खड़े थे. इन्हीं में एक लिट्टे की सुसाइड हमलों के लिए बनी काली बाघिन विंग की मेंबर धनु भी थी. सलवार सूट पहने नजर के चश्में लगाएँ, ये लड़की अपने देश की नही थी बल्कि श्रीलंका की थी. स्टेज के सामने डी शेप का घेरा बना हुआ था जहाँ सिर्फ VIP को आने की इजाजत थी. हाथ में चंदन की माला लिए धनु आगे बढ़ती है तो तमिलनाडु की सब इंस्पेकटर अनसुइया (जिसकी ड्यूटी रैली ग्राउंड में लगी हुई थी) धनु को हाथ पकड़कर आगे बढ़ने से रोकती है. धनु पलटने ही वाली थी कि राजीव गांधी की आवाज आती है कि सबको आने दो. फिर आगे बढ़कर धनु जैसे ही राजीव गांधी के पैर छूती है तो इसी के साथ बम फट जाता है और राजीव गांधी समेत 17 लोगो की मौत हो जाती है. यही थीं राजीव गाँधी की मौत की असली कहानी…

जंग-ए-आज़ादी का सफर

    


भारत की स्वतंत्रता के लिए आज़ादी का संघर्ष छेड़ा गया। यह संघर्ष 1857 से लेकर 1947 तक चला। स्वाधीनता संग्राम की चिनगारी 1857 में तब भड़की जब ब्रिटिश कंपनी में काम करने वाले सिपाहियों ने अंग्रजों के खिलाफ विद्रोही बिगुल फूंक दिया। 34वीं नेटिव इन्फैंट्री के जवान मंगल पांडे ने अपने सारजंट मेजर पर गोली चला दी। लक्ष्मीबाई , कुंवर सिंह , नाना साहब और खान बहादुर के नेतृत्व में हुई क्रांति पर काबू पाने के लिए ब्रिटिश सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ी
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन सही मायने में मास आंदोलन तब बना जब महात्मा गांधी साउथ अफ्रीका से लौटे और आंदोलन की कमान संभाली। साउथ अफ्रीका में अजमाए सत्याग्रह का गांधीजी ने यहां भी बखूबी प्रयोग किया। 1857 की महान क्रांति पर काबू पा लेने वाली अंग्रेजी सरकार गांधीजी के अहिंसक आंदोलन के सामने पस्त नजर आने लगी। इसका कारण था कि कांग्रेस जो पहले सिर्फ एलीट क्लास का संगठन थी, उससे बड़े पैमाने पर आम भारतीय नागरिक जुड़ने लगे। लोगों को लगने लगा कि कांग्रेस द्वारा चला जा रहा आंदोलन उनके हित में है।
तिलक वह पहले शख्स थे जिन्होंने 'स्वराज का नारा' दिया। तिलक ब्रिटिश शिक्षा का जबर्दस्त विरोध करते थे, जिसमें भारतीय मूल्यों को दरकिनार कर दिया गया था। उनका मशहूर नारा- स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा- भारतीय जनमानस का नारा बन गया।
लाल, बाल, पाल यानी लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल कांग्रेस के गरम दल के 3 स्तंभ थे। इनका मानना था कि आजादी याचना से नहीं मिलती, बल्कि इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है।
देश में बह रही परिवर्तन की हवा को दबाने के लिए 1919 में रॉलेट ऐक्ट लाया गया। रॉलेट ऐक्ट को काले कानून के नाम से भी जाना जाता है। इस कानून में वायसरॉय को प्रेस को नियंत्रित करने, किसी भी समय किसी भी राजनीतिज्ञ को अरेस्ट करने के साथ-साथ बिना वांरट किसी को भी गिरफ्तार करने का अधिकार देने का प्रावधान था। इसका पूरे भारत में विरोध किया गया।
1919 में जलियांवाला बाग में रॉलेट कानून का विरोध करने के लिए जमा हुए निहत्थे भारतीयों पर जनरल डायर ने गोलियां बरसाईं। 10 मिनट तक निहत्थी भीड़ के सीने छलनी होते रहे। सबसे बड़ी बात यह कि डायर ने गोली चलाने का आदेश देने से पहले कोई चेतावनी देना भी उचित नहीं समझा। इस नरसंहार में 379 लोगों की जान गई। इस दौरान डायर ने करीब 1650 राउंड फायर करवाए। 3 मार्च 1940 को ऊधम सिंह ने डायर को लंदन में गोली मार दी।
गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार के दांत खट्टे कर दिए। देश स्तर पर होने वाला यह पहला आंदोलन था। इसके पहले जितने भी आंदोलन थे, वे देश के किसी न किसी भाग तक सीमित थे, लेकिन असहयोग आंदोलन ऐसा आंदोलन था जिसमें पूरे देश की जनता ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। ब्रिटिश सरकार समझौते के लिए तैयार हो ही रही थी कि चौरी चौरा कांड हो गया और गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया।
भारत में क्रांति के नायक क्रांतिकारी अरबिंदो घोष ने जुगांतर नाम का क्रांति दल बनाया। इसके बाद अलीपुर बम केस, मुजफ्फरपुर की हत्याओं ने इस विद्रोह की शुरुआत की ओर इशारा किया। इन मामलों में शामिल रहे कई लोगों को उम्रकैद जबकि खुदीराम बोस को फांसी की सजा सुनाई गई। 1920 में आजाद ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन तैयार की। पब्लिक सेफ्टी बिल के विरोध में बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में बम फेंका। असेंबली बम केस में बाद में भगत सिंह , सुखदेव व राजगुरु को 1931 में फांसी पर लटका दिया गया।
12 मार्च 1930 को साबरमती से अपने 78 सहयोगियों के साथ गांधीजी ने दांडी यात्रा शुरू की। 240 मील लंबी यात्रा में हजारों लोग शामिल होते गए। गांधीजी ने दांडी पहुंचकर नमक कानून तोड़ा। इस नमक कानून के बारे में उन्होंने कहा था कि पानी से पृथक नमक नाम की कोई चीज नहीं है जिस पर कर लगाकर राज्य करोड़ों को भूख से मार सकती है, बीमार असहाय और विकलांगो को पीड़ित कर सकती है। इसलिए यह कर अत्यंत अमानवीय है, अविवेकपूर्ण है।
गांधीजी ने 3 बार यह आंदोलन छेड़ा। पहली बार यह आंदोलन 1930 में नमक कानून को तोड़कर प्रारंभ किया गया। गांधीजी ने यह आंदोलन अप्रैल 1934 में वापस ले लिया। सिविल नाफरमानी की ताकत को समझाते हुए गांधीजी ने कहा था- मान लें कि भारत के 7 लाख गांवों में से हर एक से 10 व्यक्ति सत्याग्रह में भाग लेकर नमक कानून तोड़ते हैं, वैसी स्थिति में आपके विचार में यह सरकार क्या कर सकती है।
26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया। हालांकि यह एक बड़ा आंदोलन था लेकिन इसी दौरान आजादी मांगने के सवाल पर कांग्रेस में तेजी से 2 दल उभरे। एक वह जो आजादी के लिए अहिंसा को ही एकमात्र सही तरीका मानता था। दूसरा वह जो इसे पाने के लिए हिंसात्मक विरोध का सहारा लेने को भी तैयार था।
1938 में सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। 1939 में भी उन्होंने इस पद के लिए खड़े होने का निर्णय किया लेकिन कांग्रेस ने पट्टाभि सीतारमैया को उम्मीदवार बनाया। बोस जीते और सीतारमैया की हार को गांधीजी ने अपनी हार बताया। गांधीजी से मतभेद होने के कारण बोस ने कांग्रेस छोड़ दी। युद्ध के दौरान बोस ने धुरी राष्ट्रों से समर्थन पाने की मुहिम भी चलाई। 1942 में बोस की इंडियन नैशनल आर्मी ने ब्रिटिश राज के खिलाफ जंग का ऐलान किया।
यह आंदोलन ऐसा आंदोलन था, जिसने ब्रिटिश सरकार की चूलें हिला दी। इस आंदोलन की खासियत यह थी कि जगह-जगह इसकी बागडोर स्थानीय नेताओं ने थामी और आंदोलन का नेतृत्व किया, क्योंकि आंदोलन शुरू होते ही ब्रिटिश सरकार ने सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। गांधीजी ने 'करो या मरो' का नारा दिया।
16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग द्वारा मनाए गए सीधी कार्यवाही दिवस में हजारों लोगों की हत्या कर दी गई। पूरा देश दंगे की आग में जल उठा। मुस्लिमबहुल इलाकों में हिन्दुओं का और हिन्दूबहुल क्षेत्रों में मुसलमानों का कत्ल-ए-आम हुआ। इसी बीच, 3 जून 1947 को ब्रिटेन के आखिरी वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने ब्रिटिश इंडियन एंपायर के विभाजन का ऐलान किया।
15 अगस्त 1947 की रात को भारत आजाद हो गया। हालांकि देश के विभाजन ने इस चमक को फीका कर दिया। जहां गांधीजी इन हालात का प्रतिकार कर रहे थे, वहीं नेहरू की आंखें क्षितिज पर उभर रहे प्रकाश पर टिकी थीं। लॉर्ड माउंटबैटन आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल बने।
जून 1948 में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने लॉर्ड माउंटबेटन की जगह ली। 565 रियासतों को देश में मिलाने का जिम्मा सरदार पटेल पर सौंपा गया। उन्होंने कुशलता के साथ सभी रियासतों को भारत में मिलाया। हां, जूनागढ़, जम्मू-कश्मीर और हैदराबाद स्टेट को देश में मिलाने के लिए बल प्रयोग भी करना पड़ा।

अकबर के सामने कहाँ टिकते हैं महाराणा प्रताप?

    


राजस्थान यूनिवर्सिटी ने एक बीजेपी विधायक के उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है जिसमें उन्होंने कहा था कि यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रमों यह लिखा जाए कि हल्दी घाटी की लड़ाई अकबर ने नहीं, बल्कि महाराणा प्रताप ने जीती थी.
राजस्थान में यूनिवर्सिटी के साथ स्कूलों में भी बच्चों को यही पढ़ाया जाएगा.
अभी हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि इतिहासकारों ने महाराणा प्रताप के साथ नाइंसाफी की है. उन्होंने कहा था कि अक़बर को द ग्रेट कहा जाता है लेकिन महाराणा प्रताप को महान क्यों नहीं कहा जाता है. राजनाथ सिंह ने कहा था कि महाराणा प्रताप राष्ट्रनायक थे.

अक़बर बाहरी आक्रांता थे?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा कि अकबर आक्रांता था और असली हीरो महाराणा प्रताप हैं. योगी ने कहा युवा जितनी जल्दी इस सच को स्वीकार कर लेंगे उतनी जल्दी देश को सारी समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा.
क्या हमारी सरकारें इतिहास को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़कर लिखवा रही हैं? क्या अक़बर आक्रांता थे? क्या महाराणा प्रताप अकबर से ज़्यादा महान थे? क्या हल्दी घाटी में अकबर की हार हुई थी? क्या अकबर और महाराणा प्रताप का संघर्ष हिंदुओं और मुसलमानों का संघर्ष था?

आईये जानते हैं विस्तार से इतिहासकारों की क्या राय है इसपर....

जॉर्ज ऑरवेल ने अपने उपन्यास 1984 में लिखा है कि जिसका वर्तमान पर नियंत्रण होता है उसी का अतीत पर भी नियंत्रण होता है. इसका मतलब यह हुआ कि अतीत को आप जैसा चाहें, वैसा तोड़-मरोड़ कर उल्टा-सीधा बना सकते हैं, क्योंकि वर्तमान में आपको इसकी ज़रूरत पड़ती है. वो तो एक उपन्यास की बात है लेकिन हमारे में देश में यही सच होता दिख रहा है.

इतिहास से छेड़छाड़

आज की तारीख़ में इनकी ज़रूरत यही है कि वो अपने मन का इतिहास पढ़ाएं. मतलब राजस्थान में उनको ऐसी ज़रूरत थी तो कर दिया. आने वाले दिनों में देश अन्य हिस्सों में भी ऐसा देखने को मिल सकता है. इतिहास को यहां हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.
इतिहास के तथ्यों से इन्हें कोई मतलब नहीं है. इनकी राजनीतिक ज़रूरतें झूठ से पूरी होती है तो वो झूठ को ही सच कहेंगे. ऐतिहासिक तथ्य तो यही है कि हल्दी घाटी में महाराणा प्रताप हारे थे. इस हार के बाद वो अपने चेतक घोड़े के साथ निकल गए थे. हल्दी घाटी के बाद उन्होंने बड़ी मुश्किल से जीवन व्यतीत किया. उन्होंने काफ़ी मुश्किलें झेली थीं लेकिन यह सच है कि वह अकबर से हल्दी घाटी की लड़ाई हारे थे.
मैं हल्दी घाटी जा चुका हूँ. मेरा उस मैदान को देखने का मन था जिसमें इतना प्रसिद्ध युद्ध हुआ था. मैं जानना चाहता था कि कितना बड़ा मैदान है. वो छोटा सा मैदान है. मेरा ख्याल है कि तीन या चार फुटबॉल मैदान के बराबर का वह मैदान है. ज़ाहिर सी बात है कि उसमें हज़ारों और लाखों की तादाद में सिपाही नहीं आ सकते हैं.

महाराणा प्रताप कितने महान?

मतलब वहां पर बहुत बड़ी लड़ाई नहीं हुई थी. दूसरी बात यह है कि महाराणा प्रताप लगभग अकेले राजपूत शासक थे जिन्होंने अक़बर के सामने समर्पण नहीं किया. इस लड़ाई का कोई विशेष ऐतिहासिक महत्व नहीं था. 16वीं, 17वीं और 18वीं सदी में इस बात का महत्व न इस तरफ़ से था, न उस तरफ़ से था.
हालांकि लोकप्रिय कल्पनाओं में महाराणा प्रताप को एक हीरो की तरह से देखा गया. और देखा जाना भी चाहिए था क्योंकि वो अकेले राजपूत थे जिन्होंने घुटने नहीं टेके और आख़िरी दम तक लड़ते रहे. एक हीरो की तरह उनको याद किया गया. हम सभी जानते हैं कि नायकों को लेकर सबकी अपनी-अपनी यादें होती हैं.
दिक़्क़त यहां है कि महाराणा प्रताप को जो पोशाक पहनाई जा रही है कि उन्होंने भारत की सुरक्षा में विदेशियों से टक्कर ली और वो एक राष्ट्रीय हीरो थे, जिसने राष्ट्र की गरिमा के लिए लड़ाइयां लड़ीं, ये सच नहीं है. देश की कल्पना न केवल भारत में बल्कि संसार भर में 18वीं और 19वीं शताब्दी में आई है.
अंग्रेज़ी में देश को कंट्री कहते हैं लेकिन कंट्री क्या देश को कहा जाता था? कंट्री तो गांव को कहा जाता है. जो लंदन में बड़े-बड़े लोग रहते हैं उनके लिए कंट्री हाउस होता है. कंट्री का मतलब देश नहीं है. यह केवल अंग्रेज़ी में ही नहीं बल्कि फ्रेंच में भी ऐसा ही है. फ्रेंच में पेई कंट्री को कहते हैं और पेंजा किसान को कहते हैं.

देश की परिकल्पना

देश का मतलब हमारे यहां भी गांव हैं इसीलिए हम कहते हैं कि परदेस जा रहे हैं. आप पटना से कोलकाता चले गए तो परदेस चले गए. परदेस को लेकर कितनी कविताएं और लोककथाएं मौजूद हैं. देश का मतलब होता है कि जहां आप पैदा हुए हैं. देश और उसके बरक्स जो विदेश की परिकल्पना है ये 18वीं और 19वीं सदी की है. 16वीं सदी में देश, विदेश और विदेशी जैसी परिकल्पना कहीं नहीं थी. और राष्ट्र का तो बिल्कुल सवाल ही नहीं था.
ये सारी परिकल्पाएं बाद की हैं और इनका अपना महत्व है. समस्या तब होती है जब आप जब 19वीं सदी की परिकल्पना को 16वीं सदी में बैठा दें तो वैसे ही होगा जैसे हम मान लें कि हल्दी घाटी की लड़ाई में अकबर की फ़ौजें फाइटर प्लेन में बैठकर गई थीं. कोई ऐसा करने की ज़िद करे तो हम इसे बेवकूफी ही कहेंगे.
लेकिन उनको इस बेवकूफी से फ़ायदा हो रहा है और ये बेवकूफी उनकी ज़रूरत है. बीजेपी की वोट बैंक की राजनीति का राजस्थान बेहतरीन उदाहरण है. इतिहास को तोड़-मरोड़ कर लिखवाना केवल राइट विंग को ही रास नहीं आता है, बल्कि सोवियत रूस में ऐसा काम कम्युनिस्टों ने भी किया था.

इतिहास का कॉम्युनिस्ट नज़रिया

सोवियत रूस में जो इतिहास लिखा गया था वो इतना उटपटांग था कि इन्होंने भी जबर्दस्ती एक किस्म की राष्ट्रवादी परिकल्पना डाल दी थी. ऐसी छेड़छाड़ किसी भी तरफ़ से संभव है. हमारे में देश में राइट विंग यह काम इसलिए कर रहा है क्योंकि इसकी बुनियाद स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान ही बन गई थी.
कांग्रेस में हिन्दू और मुस्लिमों के अलग-अलग गुट बनने लगे थे. एक समुदाय के बरक्स दूसके समुदाय के रूप में सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद को जो स्वरूप दिया गया वह हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का एक चरित्र था. इसकी छाया इतिहास पर भी पड़ी. ऐसे में जो इतिहास पढ़ा जाता था वो हिन्दू बनाम मुस्लिम होता था. इसे धार्मिक इकाइयों में ही देखा जाता था. 1950 से 1970 के बीच इतिहास लेखन का रूप बदला. ये हिंदू बनाम मुस्लिम को छोड़कर नए वर्ग संघर्ष के रूप में आया जिसे मार्क्सवादी इतिहासकारों ने आगे बढ़ाया.
ये इतिहासकार संख्या में बहुत ज़्यादा नहीं थे. सबसे पहले डीडी कौशांबी, इरफ़ान हबीब, आरएस शर्मा और एआर देसाई जैसे इतिहासकरों ने लेखन को नई करवट दी. इन्होंने इतिहास लेखन का रुख बदल दिया. जहां धार्मिक इकाइयां थीं, वहां इन्होंने वर्ग संघर्ष को स्थापित किया. इससे इतिहास लेखन की प्रक्रिया पूरी तरह से बदल गई. 1980 के मध्य आते-आते ये इकाइयां भी कमज़ोर पड़ने लगीं. एक तो मार्क्सवाद की अपनी भी कमज़ोरियां थीं. नए-नए विषय उभरकर सामने आए जिनकी व्याख्या मार्क्सवाद के पास नहीं थी.

इतिहास लेखन का रुख

जैसे भावनाओं का इतिहास, व्यक्तियों के परस्पर संबंधों का इतिहास, हैबिटाट का इतिहास, पर्यावरण का इतिहास और जेंडर का इतिहास. ऐसे कई विषय आने लगे थे. ऐसे में इतिहास लेखन फिर से घिरा. 1985 आते-आते स्थिति बिल्कुल बदल चुकी थी. यह लेखन हिन्दू-मुस्लिम इकाइयों से बहुत दूर जा चुका था.
एक बदकिस्मती है कि राइट विंग इतिहासकार कोई है नहीं. पहले थे और बहुत अच्छे इतिहासकार थे. इनमें आरसी मजूमदार सबसे बड़ा नाम है. राधाकृष्ण मुखर्जी लखनऊ में थे. इन लोगों ने इतिहास को बिल्कुल हिंदू परिदृश्य में देखा. फिर भी ये बहुत योग्य इतिहासकार थे. उनसे बहस करने में मज़ा आता था. मैं तो उस वक़्त छोटा था इसलिए बहस नहीं कर पाता था लेकिन आरएस शर्मा और इरफ़ान हबीब बहुत तीखी बहस करते थे. आज तो कोई है ही नहीं जिसके साथ बहस की जा सके.
अब इतिहास के मुद्दे बदल चुके हैं. अब फिर से लोग हिंदू बनाम मुस्लिम इतिहास लिखना चाहते हैं जिसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है. लेकिन ये फिर से वहीं वापस जाना चाहते हैं. दरअसल, जेम्स मिल ने भारतीय इतिहास को तीन खांचों में बांटा था. मिल साहब ने ही हमें सिखाया कि भारतीय इतिहास का एक हिंदू काल है, मुस्लिम काल है और ब्रिटिश काल है.

हिन्दू और मुस्लिम इतिहास का सच

लेकिन जेम्स मिल के चश्मे वाले इतिहास को भारतीय इतिहासकारों ने बहुत पीछे छोड़ दिया है. उनको इतिहास इसलिए पसंद नहीं है क्योंकि वो उसमें हिंदू बनाम मुस्लिम की गोटी बैठा नहीं पाते हैं. महाराणा प्रताप का ही उदाहरण लीजिए. ज़ाहिर है वो अपनी फ़ौज के नेता थे लेकिन उनके बाद उनके सबसे बड़े सिपहसालार हाक़िम ख़ान थे, जो कि मुसलमान थे.
अकबर की ओर से राजा मान सिंह थे जो कि हिंदू थे. ऐसे में हम उसे हिंदू बनाम मुसलमान कैसे कर सकते हैं? उस ज़माने में हिंदू बनाम मुस्लिम जैसी कोई बात ही नहीं थी. आप देख रहे हैं कि महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा साथी मुसलमान है और दूसरी ओर हिंदू राजा मान सिंह उनसे लड़ाई लड़ रहे हैं तो आप इसे हिंदू बनाम मुस्लिम कैसे साबित कर देंगे? उस ज़माने में ऐसा नहीं किया गया था.
महाराणा प्रताप उस वक़्त हीरो की तरह थे और वो प्रसिद्ध भी हुए. लोकगीतों और लोकगाथाओं में महाराणा प्रताप की लोकप्रियता काफ़ी है. लेकिन एक हिंदू राष्ट्रवादी ने अपने राष्ट्र की रक्षा करने के लिए एक विदेशी से लड़ाई की, ये परिकल्पना तो थी ही नहीं और इसकी कोई प्रासंगिकता भी नहीं है. ऐसे में उनकी समस्या यह है कि अगर तथ्य उनके साथ नहीं जाते तो तथ्यों को मरोड़ दो और कह दो कि हल्दी घाटी में महाराणा प्रताप जीते थे. बच्चों का क्या, वो तो मान ही लेंगे.

ऐतिहासिक तथ्यों से शर्मिंदगी

कई बार जनमानस में सच को छुपाने और फ़र्ज़ी गौरव को स्थापित करने के लिए सत्य को खंडित किया जाता है. ऐसा करना दोनों को अच्छा लगता है. लोग भी जिस जाति और मजहब से ताल्लुक रखते हैं उन्हें उनकी वीरता की कहानी ज़्यादा भाती है. उस वक़्त इसे एक हिंदू और मुसलमान की लड़ाई के रूप में नहीं देखा गया. वह लड़ाई एक बादशाह और एक वीर की तकरार के रूप में देखी जाती थी.
जिसमें निडर योद्धा की वीरगाथाएं और बादशाह का अपना इतिहास है. मध्यकालीन भारत का एक दिलचस्प तथ्य यह है कि मुगल बादशाहों में या उसके पहले सल्तनतों से राजपूतों की 300 साल तक लड़ाइयां चलती रहीं. कोई किसी से हारा नहीं. जब मुगल आए तो उन्होंने राजपूतों को अपने साथ मिला लिया. अकबर के सबसे बड़े विश्वासपात्र राजा मान सिंह थे.
औरंगजेब के जमाने में जो सबसे ऊंचे मनसबदार थे वो महाराजा जसवंत सिंह और महाराजा जय सिंह थे. मराठे भी भरे हुए थे. उस ज़माने में इसे हिंदू बनाम मुस्लिम कभी नहीं देखा गया. मुगलों में और राजपूतों में लड़ाइयां हुई हैं, मुगलों में और सिखों में हुईं, मुगलों और मराठों में हुई, मुगलों और जाटों में हुई हैं. इन लड़ाइयों में ख़ून-ख़राबा हुआ लेकिन पूरे 550 सालों में जिसको जेम्स मिल ने मुस्लिम शासनकाल कहा था उसमें एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ था.

सेक्युलर स्टेट में ज़्यादा दंगे

पहला दंगा जो हुआ वो 1713-14 में अहमदाबाद में हुआ. यह दंगा होली और एक गाय की हत्या को लेकर हुआ था. औरंगजेब की मृत्यु 1707 में हो चुकी थी उसके 6-7 साल बाद दंगा हुआ. सोचिए, औरंगजेब के जमाने में भी कोई दंगा नहीं हुआ. पूरी 18वीं सदी में महज पांच दंगे हुए थे. मध्यकाल में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए यानी हिंदू मुसलमान एक दूसरे की गर्दन काटने को आतुर नहीं थे. आज तो हमारा राज्य धर्मनिरपेक्ष है लेकिन देखिए कितने दंगे हो रहे हैं.
मैं इस तथ्य का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं कि उस काल का चरित्र अलग था. 18वीं सदी की शुरुआत में जब मुगल साम्राज्य का पतन शुरू हुआ तो फिर पहचान के लिए गोलबंदी शुरू हुई. मुस्लिम पहचान शाह हबीबुल्लाह ने उभारना शुरू किया कि कट्टर मुसलमान बनना चाहिए. उसका मानना था कि हम जिसे कंपोजिट कल्चर कह रहे थे उसमें बह गए थे और हमें इसका शुद्धीकरण करना चाहिए.
पहचान का निर्माण जो शुरू हुआ वो 18वीं सदी में हुआ है और 19वीं सदी में उसको ख़ास तौर पर बल मिला है. उसके बाद देखा गया कि मुसलमानों की शक्ति का बिल्कुल ख़ात्मा हो चुका था. लेकिन मुसलमानों की शक्ति का ख़त्म होना कहना अतार्किक व्याख्या है. क्या मध्यकाल में शासक मुसलमान थे?
मतलब जो शासक थे वो मुसलमान थे लेकिन ये कहना कि मुस्लिम शासन था या मुस्लिम संप्रदाय का शासन था और हिन्दू संप्रदाय शासित था ये तो अपने आप में बड़ी उल्टी सी बात है. संप्रदाय शासक नहीं होता है. संप्रदाय के एक ऊपर का जो स्तर होता है वो शासक होता है. मुसलमान का पतन हुआ, मुसलमानों की तबाही हुई ये भी अपने आप में एक ग़लत व्याख्या है.

पहचान की राजनीति

लेकिन फिर भी ये पहचान बननी शुरू हो गई थी. 19वीं शताब्दी में और ख़ासकर के बीसवीं शताब्दी में जब स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू हुई तो उसमें तो जनभावना धर्म और इलाक़े से परे थी. अभी तक जो मुगलों के साथ जाटों, सिखों, राजपूतों और मराठों की युद्ध होते रहे थे वो एक राजनीतिक और मिलिटरी कॉन्फ्लिक्ट थे. कहने में तो अजीब लगता है लेकिन सच यही है कि सांप्रदायिकता का उदय लोकतंत्र का एक पहलू है. पहले जनता को राजनीति में शामिल नहीं किया जाता था लेकिन लोकतंत्र में जनता सीधे राजनीति में शामिल होने लगी.
अब तक शासक वर्ग हुआ करता था. जब जनता शामिल होती है तो उसमें वह तरह-तरह से शामिल होती है. उनको हिंदू बनाम मुस्लिम शामिल किया जाता है. उनको बंगाली बनाम मराठी शामिल किया जाता है. उनको ग़रीब बनाम अमीर शामिल किया जाता है. उनको हिन्दी बनाम तमिल शामिल किया जाता है. इसमें सबसे बड़ा था हिन्दू बनाम मुस्लिम. कांग्रेस का जो राष्ट्रवादी चरित्र था वो धार्मिक इकइयां ही थीं. मतलब फर्क यह था कि कांग्रेस के लिए हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई और मुस्लिम लीग के लिए दुश्मन. जब देश का लोकतांत्रीकरण शुरू हुआ उसी में ये सारी पहचानें उभरकर सामने आईं.
इसी पहचान के सहारे लोगों को लामबंद किया जाता है. मतलब इस समस्या का लंबा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य है जो कि 19वीं और 20वीं शताब्दी में ये इकाइयां उभरकर आई हैं जिसका परिणाम हम आज देख रहे हैं, और अब यह लोकतंत्र का हिस्सा हो गया. नेहरू का ये विचार था कि आने वाले वक़्त में ये सारी चीज़ें ख़त्म हो जाएंगी लेकिन हुआ इसका उल्टा.


इसराइल का उदय: जिसने 6 दिन में बदल दिया मध्य पूर्व का नक्शा!

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50 साल पहले इसराइल और उसके पड़ोसी अरब देशों के बीच युद्ध छिड़ा था. यह युद्ध केवल छह दिन जारी रहा, लेकिन उसका असर आज भी देखा जा सकता है.

साल 1948 में इसराइल के अरब पड़ोसियों ने नए स्थापित हुए इस देश के वजूद को मिटाने के लिए एक नाकाम हमला किया था. मिस्र की फ़ौज को पीछे हटाना पड़ा, लेकिन ज़मीन के एक टुकड़े में चारों तरफ से घिर कर रह गई फौज की एक टुकड़ी ने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया था.
मिस्र और इसराइल के नौजवान अफ़सरों के एक ग्रुप ने इस गतिरोध को तोड़ने की कोशिश की.
उनमें इसराइल के एक सैनिक परिवार से ताल्लुक रखने वाले 26 वर्षीय यित्ज़ाक रॉबिन और मिस्र के 30 वर्षीय मेजर गमाल अब्दुल नासिर भी थे. रॉबिन दक्षिणी मोर्चे पर इसराइल की युद्ध कार्रवाई का नेतृत्व कर रहे थे.
नाज़ियों द्वारा 60 लाख यहूदियों के नरसंहार के कुछ साल बाद पवित्र भूमि पर यहूदी राज्य की स्थापना का सपना पूरा हो गया था.
फ़लस्तीनियों ने साल 1948 की इस घटना को 'अल-नकबा' या 'विनाश' का नाम दिया. साढ़े सात लाख फ़लस्तीनियों को उनकी ज़मीन से बेदखल करके इसराइल अस्तित्व में गया और उन फ़लस्तीनियों को कभी लौटने नहीं दिया गया.

नासिर का उदय

अरबों की इसराइल के हाथों शिकस्त एक ऐसी राजनीतिक सूनामी जैसी घटना थी जिसके बाद से ये क्षेत्र अभी तक अस्थिर बना हुआ है.
हार से शर्मिंदा फ़ौज ने मुल्क की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया. सीरिया में सैन्य तख़्तापलट की घटनाएं लगातार होने लगीं. युद्ध के चार साल बाद नासिर के नेतृत्व में नौजवान अफ़सरों के एक गुट ने मिस्र के सुल्तान को सत्ता से बेदखल कर दिया.
साल 1956 में नासिर राष्ट्रपति बने. इसी साल उन्होंने ब्रिटेन, फ़्रांस और इसराइल की परवाह न करते हुए स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया और इस तरह वो अरब देशों के हीरो बन गए.
उधर, इसराइल में यित्ज़ाक रॉबिन का सेना का मिलिट्री करियर जारी रहा. 1967 वे फौज़ के सबसे आला ओहदे पर पहुंच गए.
अरब इस हार से तब तक उबर नहीं पाए थे. इसराइल यह कभी भूल नहीं सका कि उसके पड़ोसी देशों ने उसे जड़ से मिटाने की कोशिश की थी. दोनों ही पक्ष ये अच्छी तरह से जानते थे कि अगली लड़ाई अभी या बाद में कभी न कभी ज़रूर होगी.
ख़राब पड़ोसी
इसराइल और अरब पड़ोसियों के लिए आपसी नफ़रत और एक-दूसरे को संदेह की नज़र से देखने के लिए कई कारण मौजूद थे.
1950 और 1960 के दशकों में शीत युद्ध ने अविश्वास और तनाव के माहौल में आग में घी डालने का काम किया.
सोवियत संघ ने मिस्र को आधुनिक लड़ाकू विमान दिए. इसराइल की अमेरिका के साथ क़रीबी दोस्ती थी, लेकिन यह तब तक अमरीकी रक्षा सहायता प्राप्त करने वाला सबसे बड़ा देश नहीं बना था.
1960 में इसराइल ने फ़्रांस से विमान और ब्रिटेन से टैंक हासिल किए.
1948 के बाद इसराइल ने अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए अथक मेहनत की. उसने दस लाख से ज़्यादा यहूदी आप्रवासियों को आबाद किया. इसराइल आने वालों के लिए सेना में सेवा देना एक अनिवार्य शर्त थी.
इसराइल ने जल्दी ही एक घातक फ़ौज तैयार कर ली और 1967 में वह परमाणु हथियार हासिल करने के क़रीब पहुंच गया.
इसराइल में पैदा होने वाले नए इसराइली जिन्हें 'सब्रास' (हिब्रू में एक खट्टे फल का नाम) कहा जाता था, विभिन्न देशों में बसे यहूदियों की अतीत में की गई ग़लतियों को न दोहराने के लिए प्रतिबद्ध थे.
रॉबिन को इसराइली फ़ौज पर पूरा भरोसा था. उनका मिशन हर युद्ध जीतना था और इसराइल एक भी युद्ध में हार बर्दाश्त नहीं कर सकता था.
मिस्र की फ़ौज
मिस्र की सेना और उसके सहयोगी सीरिया की फ़ौज कम प्रशिक्षित थी. फिर भी वे बड़े-बड़े दावे करने लगे और ये भूल बैठे कि 1956 में स्वेज नहर संकट में मिली राजनीतिक जीत से पहले उन्हें सैन्य हार का भी सामना करना पड़ा था.
नासिर ने पूरे अरब जगत पर ध्यान केंद्रित रखा. उनका विचार था कि अरबों के राष्ट्रीय गौरव को बहाल कर इसराइल का बदला लिया जा सकता है.
उन्होंने अपने सबसे क़रीबी फ़ील्ड मार्शल अब्दुल हकीम आमिर को मिस्र की फ़ौज का कमांडर-इन-चीफ़ बना दिया.
मिस्र एक प्राचीन देश था जिसे इसराइल जैसे आक्रामक देश से असुरक्षा का कोई एहसास नहीं था.
अब्दुल हकीम आमिर का सबसे महत्वपूर्ण मिशन था नौजवान अफ़सरों को संतुष्ट रखकर सेना के लिए उनकी वफ़ादारी सुनिश्चित करना. इस रोल को उन्होंने बड़ी कुशलता के साथ निभाया भी.
सेना की लड़ने की क्षमता में सुधार उनकी प्राथमिकताओं में नहीं था.
साल 1967 तक मिस्र यमन की लड़ाई में शामिल हो चुका था जो उसका अपना वियतनाम बन गया. वे बेहतर ढंग से युद्ध नहीं कर सके, लेकिन नासिर आमिर की जगह कोई बेहतर जनरल नहीं ला सकते थे.
सीरिया की सेना भी राजनीति का शिकार हो चुकी थी और वह सोवियत संघ का परजीवी देश बन गया था और वहाँ कई जनरल फ़ौजी बग़ावतों के फलस्वरूप सत्ता में आए.
जॉर्डन की भूमिका
अरब लोग राष्ट्रीयता, समाजवाद और एकता की बहुत बात करते थे, लेकिन वास्तव में वह बुरी तरह बंटे हुए थे. सीरिया और मिस्र का शीर्ष नेतृत्व अपने ख़िलाफ़ षड्यंत्र की शिकायत करता था. उनका कहना था कि जॉर्डन और सऊदी अरब के सुल्तान ये साज़िश कर रहे हैं.
सऊदी अरब और जॉर्डन को ये संदेह था कि मिस्र और और सीरिया के लोकप्रिय सैनिक तानाशाह पूरी अरब दुनिया में क्रांतिकारी भावनाओं को भड़का सकते थे.
जॉर्डन के शाह हुसैन ब्रिटेन और अमरीका के क़रीबी सहयोगी थे. जॉर्डन वह एकमात्र इस्लामी देश है जो 1948 की लड़ाई में विजेता रहा था.
शाह हुसैन के दादा शाह अब्दुल्ला के यहूदी एजेंसी से ख़ुफ़िया रिश्ते थे. ये एजेंसी ब्रितानी प्रभुसत्ता वाले फ़लस्तीनी क्षेत्रों में यहूदियों का प्रतिनिधित्व करती थी.
1948 में ब्रिटेन की वापसी के बाद इस धरती को आपस में बांट लेने की योजना पर वे काम कर रहे थे.
साल 1951 में एक फ़लस्तीनी राष्ट्रवादी ने शाह अब्दुल्ला की अल अक्सा मस्जिद में हत्या कर दी.
15 साल के राजकुमार हुसैन ने अपने दादा की हत्या होते देखा और उसके अगले दिन पहली बार बंदूक उठाई. एक साल बाद वो सुल्तान बन गए.
साल 1948 के युद्ध के बाद जॉर्डन और इसराइल क़रीब तो आए, लेकिन इतने क़रीब नहीं आ सके कि शांति संभव हो सके.
शाह हुसैन के दौर में भी गुप्त वार्ता जारी रही. वो जॉर्डन की कमज़ोरियां जानते थे.
इसका अधिकांश क्षेत्र रेगिस्तान में शामिल था और उसकी बहुसंख्यक आबादी असंतोष पीड़ित फ़लस्तीनी शरणार्थियों में शामिल थी.
सीरिया का ख़ौफ़
साल 1967 का युद्ध अरब और इसराइली फ़ौज के बीच लंबे तनाव और भयानक सीमा-संघर्ष के बाद शुरू हुआ.
मिस्र और इसराइल के बीच सीमा आमतौर शांतिपूर्ण रही. इसराइल की उत्तरी सीमा पर स्थिति लगातार तनावपूर्ण बनी हुई थी. यहां विवादित क्षेत्रों और जॉर्डन नदी के पानी का रुख़ मोड़ने की मिस्री सेना की कोशिशों की वजह से झड़पें होती रहती थीं.
सीरिया ने फ़लस्तीनी गुरिल्ला लड़ाकों को पनाह दे रखी थी जो इसराइल के अंदर हमले करते रहते थे.
पश्चिमी ताकतों को ये अच्छी तरह से पता था कि मध्य पूर्व में 1967 की लड़ाई में किसका पलड़ा भारी रहेगा. अमरीका के जॉइन्ट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ का कहना था कि इसराइल कम से कम अगले पांच साल तक किसी भी अरब गठबंधन की फ़ौज का अकेले सामना कर सकता है.
1967 में तेल अवीव में तैनात एक ब्रिटिश सैनिक अफ़सर ने इसराइली सेना के बारे में एक रिपोर्ट में कहा था कि कमान, प्रशिक्षण, रक्षा उपकरणों और रसद के मामले में इसराइली सेना युद्ध के लिए उतनी तैयार है जितनी पहले कभी नहीं रही.
उच्च प्रशिक्षित, अनुशासित, सख़्त इसराइली सैनिकों में अपने देश की रक्षा के लिए लड़ने का जज़्बा ज़ोरों पर था और वे युद्ध में जाने के लिए तैयार थे.
सीमा पर हो रही झड़पों ने तनाव को भड़का दिया. फ़लस्तीनी गुरिल्ला लड़ाके बाड़ तोड़कर सीमा के अंदर आ गए. इसराइल ने इस हमले को 'आतंकवाद' करार देकर निंदा की और ऐसे हमले रोकने के लिए उसने भरपूर जवाबी कार्रवाई की.

इसराइल का धावा

जॉर्डन के कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक के सामुआ गांव में इसराइल ने नवंबर, 1966 में बड़ा धावा बोला. इसके बाद इसराइल के अंदर एक बारूदी सुरंग का धमाका हुआ.
वेस्ट बैंक के फ़लस्तीनी इलाके में इसराइली सैन्य कार्रवाई पर बहुत रोश था. शाह हुसैन भौचक्के रह गए. उन्होंने अमरीकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए को बताया कि वह तीन साल से इसराइल के साथ गुप्त बातचीत कर रहे हैं और उनके इसराइली वार्ताकार ने कार्रवाई के दिन वाली सुबह भी यह आश्वासन दिया था कि जवाबी कदम नहीं उठाया जाएगा.
अमरीका का रवैया सहानुभूतिपूर्ण था. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पेश किए गए इस संकल्प का भी समर्थन जिसमें समोआ हमले की निंदा की गई.
शाह हुसैन ने वेस्ट बैंक में मार्शल लॉ लागू कर दिया और उन्हें लगभग यह विश्वास हो गया था कि ग़म और गुस्से का शिकार फ़लस्तीनी उनका तख़्ता पलट कर देंगे.
उन्हें यह डर पैदा हो गया कि उनकी सेना में नासिर समर्थक सैन्य अफ़सर उनके ख़िलाफ़ विद्रोह कर देंगे और इसे बहाना बनाकर इसराइल वेस्ट बैंक को हड़प कर जाएगा.
वह मध्य पूर्व की दूसरी राजशाहियों जैसा अंजाम नहीं चाहते थे. इराक़ के सुल्तान शाह फ़ैसल को उनके ही राजमहल के अहाते में फ़ौजी बग़ावत के दौरान गोली मार दी गई थी. शाह फ़ैसल जॉर्डन के शाह हुसैन के भाई और दोस्त भी थे.
सीरिया और इसराइल की सीमा पर बढ़ते तनाव के चलते युद्ध के बादल गहरे होते दिख रहे थे. शाह हुसैन के बारे में अमरीकियों को भी भरोसा था कि वो फ़लस्तीनियों की छापामार कार्रवाई रोकने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सीरिया इन्हें बढ़ावा दे रहा था.

बड़े युद्ध की योजना

इसराइल विवादित क्षेत्रों पर अपने दावों को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रहा था. वह असैनिक क्षेत्रों में बख़्तरबंद ट्रैक्टरों से घास की कटाई कर रहा था.
सात अप्रैल 1967 को सीरिया और इसराइल में युद्ध शुरू हो गया. इसराइल की सेना ने सीरियाई सेना को भारी नुकसान पहुंचाया.
अगली सुबह एक ब्रिटिश राजनयिक के अनुसार येरूशलम में इसराइली फ़ौज की ताकत और अरबों की बेबसी पर हैरान फ़लस्तीनी नौजवान ये कहते दिखे कि मिस्र के लोग कहाँ हैं. नासिर पर कार्रवाई के लिए दबाव बढ़ रहा था.
इसराइल राष्ट्रीय गौरव की भावना से समर्पित था, लेकिन कुछ राजनीतिज्ञ और सैनिक अफ़सर परेशान थे. इसराइली संसद के गलियारे में सेना के पूर्व चीफ़ ऑफ आर्मी स्टाफ़ मोशे डेयान का आमना-सामना जनरल एज़र वाइज़मैन से हुआ. वाइज़मैन रॉबिन के नंबर दो थे. मोशे ने उनसे पूछा, 'आप होश में तो हैं? आप तो देश युद्ध में धकेल रहे हैं?'
सीरिया और फ़लस्तीनी गुरिल्ला लड़ाके इसराइल को भड़काने की हर मुमिकन कोशिश कर रहे थे और इसराइल हर उकसावे का भरपूर जवाब देने के लिए तैयार था.
मिस्र और सीरिया को दिख रहा था और ब्रिटेन और अमेरिका भी समझ रहे थे कि इसराइल बड़े युद्ध की योजना बना रहा है.
एक समाचार एजेंसी की रिपोर्ट में इसराइली सैनिक सूत्रों के हवाले से कहा गया कि अगर फ़लस्तीनियों द्वारा कार्रवाई जारी रही तो इसराइल सीमित सैन्य कार्रवाई करेगा जिसका उद्देश्य दमिश्क में सीरियाई सैनिक सत्ता का तख्तापलट होगा.
इस ख़बर का स्रोत सेना के ख़ुफ़िया प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल एहरोन ऐरो थे. रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने सीरियाई सरकार के तख्तापलट को एक अहम संभावित कदम करार दिया. इस ख़बर को सीरिया और इसराइली मीडिया, दोनों ने बड़ी गंभीरता से लिया.

रूस की दखल

और फिर सोवियत संघ के हस्तक्षेप ने सब कुछ बदल गया. 13 मई को मॉस्को ने काहिरा को साफ़ शब्दों में चेतावनी दी कि इसराइल सीरिया से लगी अपनी सीमा पर सैनिक एकत्रित कर रहा है और वह एक हफ्ते के भीतर सीरिया पर हमला कर देगा.
इस सवाल पर उस दिन से चर्चा हो रही है कि आखिर सोवियत संघ ने इस युद्ध में पहली गोली क्यों चलाई थी.
दो इसराइली इतिहासकारों इसाबेला गिनोर और गिडयोन रेमेज़ का मानना ​​है कि सोवियत संघ ने जानबूझ कर विवाद शुरू किया था.
इन दोनों का कहना है कि वास्तव में सोवियत संघ इसराइल के परमाणु हथियारों की परियोजना को रोकना चाहता था और इस लड़ाई में अपनी सेनाएं भेजने तक के लिए तैयार था.
इस समय मध्यम स्तर के एक सोवियत अधिकारी ने अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए को बताया था कि सोवियत संघ अरबों को उकसा रहा था कि वह अमरीका के लिए समस्याएं पैदा करें. तब अमरीका को वियतनाम में एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा था और यदि मध्य पूर्व में एक नई जंग छिड़ जाती तो अमरीका के लिए एक नया सिरदर्द पैदा हो सकता था.
सच तो यह है कि इन दिनों इसराइल और अरब पड़ोसियों को किसी के भड़काने की ज़रूरत भी नहीं थी. इसलिए दोनों पक्षों ने इस लड़ाई में छलांग लगा दी जिसकी उम्मीद दोनों एक समय से कर रहे थे.

नासिर का जुआ

सोवियत संघ की ओर से चेतावनी दिए जाने के महज़ 24 घंटे बाद मिस्री सेना के कमांडर फ़ील्ड मार्शल आमिर ने अपनी सेना को युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार रहने का आदेश दिया.
सेना के चीफ़ ऑफ ऑपरेशन जनरल अनवर अल-कादी ने अपने कमांडर बताया कि देश की आधी से अधिक सेना यमन में उलझी हुई है और इस समय उनकी फ़ौज इसराइल के साथ लड़ने में बिल्कुल असमर्थ है.
इस पर आमिर ने जनरल अनवर को एक बार फिर आश्वासन दिया कि लड़ाई योजना का हिस्सा है ही नहीं, बल्कि सीरिया को मिल रही इसराइली धमकियों के जवाब में केवल शक्ति 'प्रदर्शन' करना चाहते हैं.
दो दिन बाद मिस्र ने इसराइल से जुड़ी सीमा पर 1956 से तैनात संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षकों को निकाल कर और अपनी सेना को सिनाई में तैनात कर खुद को आने वाले संकट के जाल में फंसा लिया.
इस समय इसराइली फ़ौज के सिर पर सीरिया सवार था, इसलिए उन्होंने मिस्र के साथ धैर्य दिखलाया.
इस समय श्लोमो गाज़ित सेना के ख़ुफ़िया प्रमुख थे. उन्होंने अमरीकी राजनयिकों को बताया कि इसराइल को मिस्र के आक्रामक व्यवहार पर बहुत आश्चर्य हुआ है.
लेकिन ये महज़ एक 'झांसा' था. इसराइल मिस्र की धमकियों को तभी गंभीरता से लेता जब मिस्र सागर लाल सागर के रास्ते को इसराइल के लिए बंद नहीं कर देता.

यहूदी राज्य

मिस्र में इसराइल के ख़िलाफ भावनाओं को हवा देने में नासिर के पसंदीदा रेडियो स्टेशन 'वॉल्यूम अल अरब' ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
काहिरा के इस रेडियो स्टेशन का प्रसारण पूरे मध्य पूर्व में सुना जाता था और यह नासिर की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण औज़ार बन गया था.
इसराइल ने नासिर के संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षकों को निकालने और सिनाई में अधिक सेना भेजने के फ़ैसले पर कोई विशेष प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. इसलिए नासिर ने इसराइल को और उकसाने के लिए 22 मई को तिरान के रास्ते से इसराइली जहाज़ों का आना-जाना बंद कर दिया. एलात बंदरगाह तक इसराइल की पहुंच पर लगी रोक इससे पहले 1956 में हटाई गई थी.
सिनाई रेगिस्तान के हवाई अड्डे पर भाषण देते हुए गमाल नासिर ने घोषणा की, 'अगर इसराइल हमें युद्ध की धमकी देता है तो हम इसका स्वागत करेंगे.'
नासिर की इच्छा थी कि दुनिया भर में उनकी पहचान एक ऐसे अरब नेता की बन जाए जो यहूदी राज्य के सामने खड़ा होने की हिम्मत रखता है.
इसलिए आधुनिक लड़ाकू विमान उड़ाने वाली वायुसेना के पायलटों के बीच खड़े नासिर की तस्वीर का दुनिया भर में खूब प्रचार किया गया.
इस तस्वीर में वह एक ऐसे बच्चे की तरह खुश दिखाई दे रहे थे जिसने कोई ऐसी रेखा पार कर ली हो जिसकी उम्मीद किसी बच्चे से नहीं की जाती.

हमले के लिए दबाव

मिस्र की ओर से इस घोषणा के केवल 42 मिनट बाद ही अमरीकी उपराष्ट्रपति ह्यूबर्ट हम्फ़्रे ने मिस्र के दौरे की उम्मीद दिलाकर कहा कि अगर इस विवाद को बढ़ने न दिया जाए तो उनकी यात्रा संभव हो सकती है. तब तक अमरीकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन सारी स्थिति पर ख़ासे नाराज़ हो गए थे.
दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र महासचिव यू थांट शांति मिशन पर मध्य पूर्व की ओर यात्रा शुरू कर चुके थे. इस मौके पर नासिर ने अपने इस वादे को दोहराया कि मिस्र पहली गोली नहीं चलाएगा.
लेकिन अपनी यात्रा के अंत में यू थांट ने ये अंदाज़ा लगाया कि अगर एलात बंदरगाह की घेराबंदी समाप्त नहीं की गई तो युद्ध निश्चित है.
गमाल नासिर ने जिस दिन जलडमरूमध्य का रास्ता बंद किया था, उसके केवल एक दिन बाद ही इसराइली प्रधानमंत्री लेवी एक्शोल ने अपनी सेनाओं को सीमा की ओर पहुंचने का अग्रिम आदेश दे दिया. इस आदेश के 48 घंटे के भीतर 50 साल तक की उम्र के दो लाख 50 हजार सैनिक और अर्धसैनिक बल मैदान में उतरने के लिए तैयार थे.
जनरल रॉबिन पर दबाव बढ़ता जा रहा था. तमाम फ़ौजी सबूतों के ख़िलाफ़ होने के बावजूद. लेकिन जनरल रॉबिन खुद को समझा चुके थे कि वह इसराइल को युद्ध की आग में झोंकने जा रहे हैं.
वह इस कदर मानसिक तनाव का शिकार हुए कि सिगरेट के कई पैकेट खत्म करने के बाद वो थक हार कर बिस्तर पर गिर गए. वे लगभग 24 घंटे सोते रहे और फिर जागे तो वापस दफ़्तर लौट गए.

तिरान जलडमरूमध्य

जहां तक ​​युद्ध रुकवाने का सवाल था, अंतरराष्ट्रीय कोशिशें शुरू हो गई थीं. इसराइल के विदेश मंत्री अब्बा एबान ने भी पहली उड़ान पकड़ी और राष्ट्रपति जॉनसन से मुलाकात के लिए वॉशिंगटन रवाना हो गए.
इससे पहले जब 1956 में इसराइल ने ब्रिटेन और फ्रांस के साथ एक गुप्त समझौते के तहत मिस्र पर हमला किया था तो उस समय अमरीका ने न केवल इसराइल को आक्रामक देश करार दिया था बल्कि उसे उन क्षेत्रों से बाहर जाने पर मजबूर कर दिया था जिन पर इसराइल कब्जा कर चुका था. इसीलिए इस बार इसराइल की कोशिश थी कि उसे अमरीका का समर्थन हासिल हो.
राष्ट्रपति जॉनसन ने इसराइल को चेतावनी दी कि पहली गोली उसकी तरफ़ से नहीं चलनी चाहिए. उन्होंने इसराइल के विदेश मंत्री को कहा, 'आप मिस्र की चिंता न करें. मिस्र से युद्ध की संभावना कम ही है और अगर ऐसा होता है तो मुझे पता है कि आप मार-मार के उसकी हालत ख़राब कर देंगे.'
राष्ट्रपति जॉनसन ने बैठक में ये संकेत भी दिया कि अगर उपयुक्त हुआ तो अमरीका शायद अपने सहयोगियों की नौसेना के साथ तिरान जलडमरूमध्य खोलने के लिए हमला कर सकता है.
एब्बा एबान ने निर्णय लिया कि वे उसी गति से चलेंगे जिस पर अमरीका चल रहा है, लेकिन इसराइल सेना हमले के लिए तैयार थी और उनके जनरल भी राजनेताओं की देरी से निराश हो रहे थे.
इसराइली सेना एबान के रुख से चिढ़ी हुई थी. उन्हें विदेश मंत्री के शहरी तौर तरीके रास नहीं आ रहे थे.

जॉर्डन की दुविधा

इसीलिए जब 28 मई को इसराइली मंत्रिमंडल ने दो हफ्ते और इंतज़ार करने का फ़ैसला किया तो जनरल बहुत नाराज़ हुए. उनके विचार में यह समस्या केवल तिरान स्ट्रेट खोलने से नहीं जुड़ी है बल्कि उनकी नज़र इलाके की बड़ी तस्वीर पर थी.
इसराइली जनरलों के विचार में नासिर पूरी अरब दुनिया को इसराइल के ख़िलाफ़ एकजुट कर रहे थे और इसी उद्देश्य की खातिर उन्होंने अपनी सेना सिनाई भेज दी थी ताकि वहाँ से इसराइली सीमा पर सीधे हमला किया जा सके.
नासिर साल 1956 तक अरब दुनिया के एकमात्र सर्वसम्मत नेता बन चुके थे और जब वो इसराइल को लेकर अरबों की नफ़रत के झंडाबरदार बने तो अरबों में उनकी राजनीतिक स्थिति और अधिक मजबूत हो गई.
उन्होंने 28 मई को काहिरा में विदेशी पत्रकारों से एक बैठक की जिसमें उन्होंने सिनाई और तिरान स्ट्रेट में संकट की तुलना फ़लस्तीन के ख़िलाफ़ इसराइल की 'आक्रामक नीति' से की.
नासिर का कहना था कि चूंकि इसराइल ने 1948 में फ़लस्तीन पर डाका डाल कर उनके इलाके छीन लिए हैं, इसलिए अब इसराइल के साथ शांति और सहअस्तित्व के साथ रहना संभव नहीं रहा.
नासिर के इस भरोसे ने जॉर्डन के शाह हुसैन को हाशिये पर धकेल दिया. हुसैन नासिर पर विश्वास नहीं करते थे. उन्होंने ओमान में सीआईए के चीफ़ को बताया कि उनके विचार में इसराइल का मूल लक्ष्य वेस्ट बैंक पर कब्ज़ा करना है.
उनके सीनियर सहयोगी उन पर नासिर से समन्वय बनाने के लिए दबाव डाल रहे थे.

डर और धमकी

शाह हुसैन के सबसे बड़ा मुद्दा उनका अपना अस्तित्व और सत्ता थी. इसीलिए उन्होंने न चाहते हुए भी नासिर के साथ समझौता करने का फैसला कर लिया.
युद्ध के कुछ साल बाद उन्होंने इतिहासकार एवी श्लैम को बताया, 'मुझे पता था कि युद्ध हो कर रहेगा. मुझे पता था कि हम यह लड़ाई हार जाएंगे. मुझे पता था कि जॉर्डन ख़तरे में है. हमें दोनों से ख़तरा था, तो एक समाधान तो यह था कि हम वही करते जो हमने किया, और अगर हम इस विवाद से बाहर रहते तो हमारा देश दो भागों में विभाजित हो जाता.'
अगर इसराइली जनरलों को वह करने दिया जाता जो वे चाहते थे तो उन्हें भरोसा था कि वो इसराइल को भारी जीत दिला सकते थे. लेकिन इसराइल में सेना के अंदरूनी मामलों पर सख्त सेंसर कारण जनरलों की बातें बाहर नहीं आ सकती थीं.
और दूसरी ओर अरब रेडियो स्टेशनों और इसराइली अख़बारों में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ भयानक धमकियां रुकने का नाम नहीं ले रही थीं. इसका नतीजा यह निकला कि पूरे इसराइल पर निराशा के बादल छा गए.
सरकार ने ताबूत इकट्ठे करने शुरू कर दिए और धार्मिक नेताओं ने इमरजेंसी मानते हुए सार्वजनिक पार्कों को क़ब्रिस्तान में बदलने की तैयारी शुरू कर दी.
इन स्थितियों में प्रधानमंत्री लेवी एश्कोल के 28 मई के भाषण ने रही-सही कसर भी निकाल दी. भाषण के दौरान उनकी भाषा लड़खड़ा रही थी और वे अपने शब्द ठीक से चुन नहीं पा रहे थे.
भाषण के बाद एक बैठक में इसराइल के जनरलों ने प्रधानमंत्री की खूब आलोचना की. जब सभी जनरल उन्हें अपशब्द कह रहे थे तो ब्रिगेडियर जर्नल एरियल शेरॉन ने चीख़ कर कहा कि प्रधानमंत्री जी 'हमने अपना सबसे बड़ा हथियार खो दिया है और वह हथियार है हमारा डर.'

युद्ध से पहले अंतिम दिन

इस बैठक में मौजूद कई कमांडरों ने बहुत सख्त और उपहास वाले अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया और अपनी सरकार की तुलना उन यहूदी नेताओं से करनी शुरू कर दी जो यूरोप से निर्वासन के बाद गुलाम की तरह दया की भीख मांगने पर मजबूर हो गए थे.
यूरोप से आए हुए अपने राजनीतिक नेताओं के विपरीत 1950 और 60 के दशकों में इसराइल में पैदा होने वाले लोगों की परवरिश इस तरह से हुई थी कि वह यूरोपीय यहूदियों को कमजोर समझते थे कि ये लोग नाज़ी अत्याचार के ख़िलाफ़ खड़े नहीं हुए और उनका हर ज़ुल्म सहा.
अन्य इसराइली प्रधानमंत्रियों की तरह ही एश्कोल के प्रधानमंत्री के साथ-साथ रक्षा मंत्रालय भी था. लेकिन जल्द ही उन्हें मजबूरन रक्षा मंत्रालय का पद इसराइल के एक युद्ध नायक, एक आंख वाले जनरल मोशे डेयान को देना पड़ गया.
मोशे डेयान की प्रतिष्ठा थी कि वह हर समय युद्ध के लिए तैयार रहने वाले व्यक्ति हैं.
नासिर एक बड़ा जुआ खेल रहे थे. हालांकि मिस्र के पास एक आधुनिक वायुसेना थी, लेकिन उसकी थलसेना कमजोर थी. नासिर के जनरलों को भी पता था कि नासिर की खतरों से खेलने की आदत उन्हें एक विनाशकारी युद्ध के कगार पर ले आई है.
दूसरी ओर युद्ध को रोकने की अंतरराष्ट्रीय कोशिशें भी नाकाम हो चुकी थीं. ब्रिटेन और अमरीका कि पास ले दे कर यही समाधान बचा था कि तिरान स्ट्रेट को मिस्र के कब्जे से छुड़ा ले, लेकिन ब्रिटिश और अमरीकी नौसेना के प्रमुखों को यह समाधान बिल्कुल पसंद नहीं था. उन्हें चिंता थी कि अगर वो तीरान स्ट्रेट छुड़वा न सके तो यह नासिर की एक और जीत साबित होगी.

अमरीकी कोशिश

और फिर शुक्रवार दो जून को इसराइल जनरलों ने अपने रक्षा कैबिनेट में युद्ध की पुरज़ोर वकालत की. उन्होंने नेताओं को बताया कि वह मिस्र को धूल चटा सकते हैं, लेकिन वे इसमें जितनी देरी करेंगे यह काम उतना ही कठिन हो जाएगा.
इससे कुछ दिन पहले इसराइली ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद के प्रमुख मियर एमिट भी एक नकली पासपोर्ट पर वॉशिंगटन यात्रा कर चुके थे. वह युद्ध का अधिक इंतज़ार नहीं करना चाहते थे क्योंकि उन्हें आशंका थी कि 50 साल तक की उम्र के लोगों की एक बड़ी संख्या को लंबे समय के लिए सेना में बुलाने के बाद देश की अर्थव्यवस्था नष्ट हो जाएगी.
अमरीकियों ने भी इसराइल को स्पष्ट संकेत दे दिया. अमरीकियों को बता दिया गया था कि अब इसराइल युद्ध करने जा रहा है और वे (अमेरिकी) इस युद्ध को रोकने की कोशिश नहीं करेंगे.
मोसाद के प्रमुख मियर एमिट जब विमान में वापस इसराइल आए तो अमरीका में इसराइल के राजदूत एबे हरमन भी उनके साथ थे और विमान में सभी यात्रियों के लिए गैस मास्क भी मौजूद था. वह शनिवार तीन जून को तेल अवीव हवाई अड्डे पर उतरे.
एक कार इन दोनों को लेकर सीधे प्रधानमंत्री एश्कोल के निवास पर पहुंची जहां वह अपने मंत्रियों के साथ इन दोनों का इंतजार कर रहे थे. मियर एमिट की इच्छा थी कि तुरंत युद्ध शुरू कर दिया जाए जबकि एबे हरमन चाहते थे सप्ताह भर इंतज़ार किया जाए.
मोशे इससे सहमत नहीं थे. उनका कहना था कि, ''अगर हम सात, नौ दिन तक इंतजार करते हैं तो हज़ारों लोग मर चुके होंगे. पहला हमला हमें करने देना चाहिए और जहां तक ​​राजनीतिक पहलू का संबंध है, वह हम हमले के बाद देख लेंगे.''
कमरे में मौजूद किसी भी व्यक्ति को अब यह संदेह नहीं रहा था कि युद्ध का फ़ैसला हो चुका है. इसराइल युद्ध करने जा रहा है.
अगली ही सुबह कैबिनेट ने भी इस निर्णय की पुष्टि कर दी.
नासिर की भविष्यवाणी थी कि इसराइल चार या पाँच जून को हमला कर देगा. उनकी इस भविष्यवाणी का आधार जॉर्डन घाटी और इसराइल की तरफ़ इराकी सेना का कूच करना था.

अचानक हमला

पांच जून सुबह सात बजकर 40 मिनट पर तेल अवीव में रक्षा मंत्रालय के कार्यालय में प्रत्येक व्यक्ति सांस रोके बैठा था क्योंकि हमले के क्षण क़रीब आ चुका था. इसराइली युद्धक विमानों की बमबारी की सफलता इस बात पर निर्भर करती थी कि वह दुश्मन को सोचने का मौका ही न दें और बहुत जल्दी मिस्र से शुरुआत करके अरब वायुसेना के सभी ठिकानों को नष्ट कर दें.
इसराइली वायुसेना इन हमलों की तैयारी कई वर्षों से कर रही थी. इस उद्देश्य के लिए जासूसी विमानों की मदद से उन्होंने अरब वायुसेना के सभी ठिकानों को पहले से समझ लिया था.
मिस्र और अन्य अरब देशों के विपरीत इसराइलियों ने अपनी पूरी तैयारी की थी. उन्होंने मिस्र, जॉर्डन और सीरिया के हवाई अड्डों की पूरी तस्वीर प्राप्त करने के लिए सैकड़ों जासूसी मिशन भेजे.
प्रत्येक पायलट के पास टारगेट की एक किताब थी जिसमें उसकी लोकेशन और सुरक्षा संबंधी विवरण मौजूद थे. गोलीबारी के दौरान उन्होंने रेडियो कॉल सुनकर बड़े अरब कमांडरों की आवाज़ों को पहचान करने के लिए एक सिस्टम बना लिया था.
ये एक बड़ी सफलता थी. फ़ील्ड मार्शल आमिर और मिस्र का सैन्य शीर्ष नेतृत्व बीर तमादा के हवाई अड्डे पर बैठक कर रहे थे. सत्र शुरू होने को था कि इसराइली युद्धक विमानों ने बम गिराना शुरू कर दिया.
फ़ौजी जनरल इतने हैरान थे कि उनके मन में पहला विचार ये आया कि किसी ने मिस्र से बगावत कर दी.
आमिर अपना जहाज़ उड़ाने में सफल हो गए, लेकिन एक ऐसा समय भी आया कि उन्हें विमान उतारने के लिए कोई जगह नहीं मिल रही थी क्योंकि मिस्र के सभी हवाई अड्डों पर हमला किया गया था.
उधर तेल अवीव में एज़ेर वाइज़मैन बहुत खुश थे. हमले उनकी उम्मीद से अच्छे जा रहे थे. उन्हें दुश्मन के ख़िलाफ़ आश्चर्यजनक सफलता मिली थी. उन्होंने अपनी पत्नी को फ़ोन पर चिल्लाकर कहा, 'हम लड़ाई जीत गए.'
उस दिन इसराइल ने जॉर्डन और सीरिया की सेना के ज़्यादातर हवाई अड्डे नष्ट कर दिए थे. आसमान पर इसराइल का कब्ज़ा था.

मिस्र की वायुसेना का विनाश

इसराइल ने शाह हुसैन को चेतावनी दी कि युद्ध में शामिल न हों, लेकिन उन्होंने मन बना लिया था इसलिए उन्होंने जॉर्डन की काबिल सेना को मिस्र के एक अपेक्षाकृत साधारण अफ़सर की कमान में दे दिया.
यरूशलम में लड़ाई की शुरुआत के आधे दिन बाद ही जॉर्डन सेना ने गोलीबारी शुरू कर दी. शाह हुसैन ने इसराइल से युद्ध में दूर रह कर जान बचाने के संकेतों को टाल दिया.
1966 में समोआ रेड के बाद उन्होंने इसराइल के आश्वासन पर भरोसा नहीं किया क्योंकि उनका मानना ​​था कि अगर वह मिस्र के साथ सैन्य गठबंधन से निकले तो वह अपनी सत्ता खो देंगे.
दक्षिण में इसराइल की ज़मीनी सेना सिनाई में तेज़ी से आगे बढ़ रही थी. उधर मिस्र की सेना भी बहादुरी से लड़ रही थी, लेकिन वो इसराइली सैनिकों की तरह प्रशिक्षित, लचीली और फ़ुर्तीली नहीं थी.
काहिरा में सेना मुख्यालय में कमांडर डरे हुए थे. जनरल सलाहुद्दीन हदिदी मान चुके थे कि युद्ध आधा हारा जा चुका है और यह मिस्र के लिए सबसे ख़राब हार थी.
लेकिन बाहर सड़कों पर लोग जश्न मना रहे थे. सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से मुहैया कराई बसों पर लोग शहर में आ रहे थे. 'वॉइस ऑफ़ अरब' ख़बरों का एक विश्वसनीय स्रोत था और वो भ्रम फैला रहा था.
रात आठ बजकर 17 मिनट पर वो ये ख़बर दे रहा था कि 86 इसराइली विमान मार गिराए गए और मिस्र के टैंक इसराइल में घुस गए हैं.
सिनाई में मौजूद जनरल मोहम्मद अब्दुल ग़नी बढ़ते ख़तरे के साथ ये ख़बर सुन रहे थे और वे जानते थे कि यह सब बकवास है.
बरसों बाद मैंने अहमद से पूछा कि उन्होंने ये झूठ क्यों बोला. उन्होंने अपना बचाव किया, 'आप लोगों से लड़ने के लिए कह रहे थे. डांस करने के लिए नहीं, हम समझते हैं कि प्रसारण हमारा सबसे शक्तिशाली हथियार था. हमारे कई श्रोता अनपढ़ थे इसलिए रेडियो उन तक पहुँच का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत था.'
1967 में जब हार की सही ख़बर सामने आई नासिर और आमिर अपने आवास पर लौट आए. अनवर सादात ने बतौर राष्ट्रपति इसराइल के साथ ऐतिहासिक शांति समझौता किया जिसके बाद उन्हीं के रक्षकों ने उनकी हत्या कर दी.

एक नया दृश्य

पांच दिनों में इसराइल ने मिस्र, जॉर्डन और सीरिया की सेनाओं को उखाड़ फेंका. उसने मिस्र से गज़ा पट्टी और सिनाई, सीरिया से गोलन पहाड़ियों और जॉर्डन से वेस्ट बैंक और पूर्वी येरूशलम के इलाके छीन लिए.
दो हज़ार साल में पहली बार यहूदियों के पवित्र स्थान यरूशलम पर यहूदियों का कब्ज़ा हुआ था. जिसके बाद फ़लस्तीनियों को बड़े पैमाने पर यहां से बेदखल होना पड़ा, उनकी हत्याएं हुईं हालांकि यहां 1948 जैसा मंज़र नहीं था.
नासिर ने इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन लाखों लोगों के विरोध के बाद उन्हें यह फ़ैसला वापस लेना पड़ा. इसके बाद वह 1970 में अपनी मृत्यु तक वो पद पर बने रहे.
फ़ील्ड मार्शल आमिर की मौत रहस्यमय परिस्थितियों में हुई. उनके परिवार का कहना है कि उन्हें ज़हर दिया गया.
जॉर्डन के शाह हुसैन ने पूर्वी येरूशलम खो दिया, लेकिन उनकी सत्ता बनी रही. उन्होंने इसराइल के साथ गुप्त वार्ता जारी रखी और दोनों देशों में वर्ष 1994 में शांति समझौता हुआ.
सीरिया की वायु सेना के कमांडर ने 1970 में सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया. उनका नाम हफीज़ असद था और वर्ष 2000 में उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे बशर अल-असद उनके उत्तराधिकारी बने.
इसराइल में प्रधानमंत्री एश्कोल का 1969 में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. उनकी विधवा मरियम का कहना था कि वह युद्ध की शाम रक्षा मंत्रालय से जबरन निकाले जाने के सदमे से कभी निकल ही नहीं पाए.
एश्कोल के उत्तराधिकारी गोल्डा मेयर को वर्ष 1973 में चेतावनी दी गई कि सीरिया और मिस्र अचानक हमले की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन इसराइल अब तक 1967 में विरोधियों को दी गई मात पर इतरा रहा था.
इस युद्ध में अमेरिका ने इसराइल की काफ़ी मदद की. 1967 के बाद अमरीकियों ने इसराइल को एक नई दृष्टि से देखना शुरू किया. उन्हें नौजवान इसराइलियों से प्यार हो गया जिन्होंने अरब देशों की तीन सेनाओं को हराया था.
इसराइल और फ़लस्तीन में वर्ष 1967 के युद्ध के प्रभाव हुए और इसराइल ने फ़लस्तीनी ज़मीन पर कब्ज़ा शुरू कर दिया जो आज आधी सदी के बाद भी जारी है.
इसराइल ने पूर्वी येरूशलम और गोलन पहाड़ी तक को मिला लिया जिसे दुनिया स्वीकार नहीं करती.
युद्ध खत्म होते ही इसराइल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन ने जीत की चमक को लेकर चेतावनी दी. एक थिंक टैंक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा , ''इन क्षेत्रों में रहना यहूदी राज्य को बिगाड़ देगा या शायद इसे नष्ट कर देगा. इसराइल यरूशलम को पास रखते हुए बाकी क्षेत्र अरबों को लौटा दे, चाहे यह शांति समझौते के तहत हो या उसके बिना ही.'
नक्शे पर गोलन से स्वेज तक फैले और जॉर्डन नदी से लगे इसराइली राज्य के नक्शे को देखकर विदेश मंत्री एब्बा एबोन उसे शांति की गारंटी के बजाय युद्ध के निमंत्रण के रूप में देख रहे थे.