Shamsher ALI Siddiquee: Facts

Shamsher ALI Siddiquee

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"हिंदू किसी भी कीमत पर भगवा ध्वज के सिवा किसी और ध्वज को सलाम नहीं कर सकते: सावरकर"

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देशभक्तों की नई फौज 26 जनवरी, 15 अगस्त जैसे मौक़ों पर भगवा और तिरंगा झंडे साथ लेकर मोटरसाइकिलों पर निकलने लगी है. ये 'न्यू इंडिया' की नई परंपरा है.
उनका कहना है कि वे देशभक्ति फैलाने के लिए ऐसा करते हैं. मई 2014 के बाद से देशभक्ति की अधिकता हुई है या कमी, यह समझना ज़रा कठिन है. बहरहाल, जिनके पास देशभक्ति की अधिकता है, वे इसे उन लोगों में ज़बर्दस्ती बाँटना चाहते हैं जिनमें इसकी कमी खोज ली गई है.
इसे परम सत्य की तरह स्थापित किया जा रहा है कि देशभक्ति की स्वाभाविक अधिकता हिंदुओं में है, और कमी मुसलमानों में है. न जाने ये किस ब्लड-टेस्ट के बाद पता चला है. इन युवाओं ने उन मुहल्लों पर ध्यान केंद्रित किया है जहाँ देशभक्ति की कमी है.
'प्रोजेक्ट देशभक्ति फैलाओ' में एक ख़ास तरह का उत्साह है क्योंकि इसे चलाने वाले लोगों को तब देशभक्ति दिखाने का अवसर नहीं मिल पाया था जब भारत आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था. 1925 में बने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ये सवाल अनेक बार पूछा गया है कि उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में क्या किया था?
सवाल करने वाले लोगों से सोशल मीडिया पर अक्सर पूछा जाता है कि जब फलाँ ने फलाँ हरकत की थी, 'तब तुम कहाँ थे?' देशभक्ति पर अपना एकाधिकार जताने वालों से ये वाजिब सवाल है कि 'तब तुम कहाँ थे जब आज़ादी की लड़ाई चल रही थी?'
टीपू सुल्तान की तस्वीर दिल्ली विधानसभा में लगाए जाने पर भाजपा विधायकों की आपत्ति के बाद, आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता ने यही सवाल पूछा है कि आपके किसी भी नेता की तस्वीर लगाई जा सकती है जिसने आज़ादी की लड़ाई लड़ी हो, उस एक व्यक्ति का नाम तो बताइए.

तिरंगा और भगवा साथ-साथ

स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे, जो लाठियाँ खा रहे थे और जेल जा रहे थे उनके हाथों में तिरंगा था, जिन्होंने घोषित तौर पर आज़ादी की लड़ाई को 'क्षणिक आवेग' बताकर इससे दूर रहने की सलाह दी थी उनका झंडा भगवा था.
आज़ादी की लड़ाई में हर तरह के लोग शामिल थे, वो जिनकी अपने धर्म में गहरी आस्था थी और वो भी जो भगत सिंह की तरह नास्तिक थे. नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ शाहनवाज़, ढिल्लों और लक्ष्मी सहगल थे. आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों का नारा जय हिंद था, जय श्रीराम या हर हर महादेव या अल्लाह ओ अकबर नहीं.
ये कासगंज की बात नहीं है, कासगंज का सच सामने आने में समय लगेगा. मुस्लिमों ने क्या किया पता नहीं, हिंदुओं ने क्या किया, ये पता नहीं. या शायद जेएनयू की तरह पता न चल सके देशविरोधी नारे किसने लगाए थे. बहरहाल मुस्लिमों के मोहल्ले में जाकर नारे लगाने और तिरंगा फहराना का नया चलन शुरू हुआ है.
मुसलमान मुहल्लों में तिरंगे के साथ, भगवा ध्वज लेकर जाने वाले जय हिंद नहीं, जय श्रीराम का नारा लगा रहे हैं. उनकी नज़र में देशभक्ति, वंदेमातरम, हिंदू, मोदी, जयश्री राम सब पर्यायवाची हैं, दूसरी ओर, पाकिस्तान, मुसलमान, आतंकवादी, देशद्रोही भी उनके लिए पर्यायवाची हैं.

तिरंगा और भगवा में किसे ऊपर रखेंगे?

इसको ऐसे समझिए, भारत में रहना होगा तो वंदेमातरम कहना होगा, योगी योगी कहना होगा, मोदी मोदी कहना होगा, जयश्रीराम कहना होगा, ये सभी नारे हम सुन चुके हैं, नारे लगाने वालों की नज़र में सब एक ही बात है.
भगवा झंडे में कोई बुराई नहीं है, जयश्रीराम में भी कोई बुराई नहीं है, बुराई जोर-जबर्दस्ती में है, बुराई ख़ुद को देशभक्त और जिन्हें ग़ैर बना दिया गया है उन्हें देशद्रोही साबित करने में है, बुराई संख्याबल को अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ बदतमीज़ी से इस्तेमाल करने में है.
भारत, श्रीराम, भाजपा, हिंदू धर्म एक नहीं हैं, भगवा और तिरंगा को साथ लेकर चलना इन्हें जबरन एक बनाने की कोशिश है. अगर आप भगवा झंडे की राजनीति से सहमत नहीं हैं तो इसका मतलब ये है कि आप तिरंगे के भी ख़िलाफ़ हैं क्योंकि दोनों साथ चलाए जा रहे हैं. ये यही साबित करने की कोशिश है कि मुसलमान हमारे साथ नहीं हैं, देख लो देशद्रोही हैं.
यह वंदेमातरम विवाद के आगे की कड़ी है, कुछ मुसलमान धर्मगुरूओं ने विशुद्ध धार्मिक आधार पर वंदेमातरम को अनिवार्य बनाये जाने की कोशिश पर एतराज़ किया था, अगर आप भूल गए हों तो उनका कहना था कि वंदे का अर्थ वंदना या पूजा है, मुसलमान अल्लाह के सिवा किसी और पूजा नहीं कर सकते इसलिए वंदेमातरम गाना धर्मसम्मत नहीं होगा. वैसे बहुत सारे मुसलमान हैं जो ख़ुशी-ख़ुशी वंदेमातरम गाते हैं, और वैसे भी हैं जो धर्मगुरुओं के निर्देशों का पालन करते हैं.
संघ और उससे जुड़े संगठनों ने वंदेमातरम को देशभक्ति का एकमात्र पैमाना बनाने की कोशिश की. वे मुसलमानों से देशभक्ति की अपेक्षा नहीं कर रहे थे, वे उन्हें देशद्रोही साबित करने का अभियान चला रहे थे.
सवाल ये है कि मुसलमान ऐसी किसी कोशिश में क्यों शामिल होना चाहेंगे जिसमें ये साफ़ नहीं है कि वे तिरंगे के नीचे खड़े हो रहे हैं या भगवा झंडे के?
मुसलमान ही क्यों, दूसरे ग़ैर-हिंदू या भगत सिंह की तरह नास्तिक देशभक्त ही क्यों इस घालमेल में शामिल होंगे? क्या हिंदुत्ववादी जवाब दे सकते हैं कि तिरंगा और भगवा में वो किसे ऊपर रखते हैं?
जिस तरह से 'देशभक्ति फैलाओ प्रोजेक्ट' में लोग तिरंगे के साथ भगवा झंडा लेकर निकल रहे हैं, उम्मीद करनी चाहिए कि तिरंगे के साथ इस्लामी झंडा लेकर अगर मुसलमान चलें तो उन्हें कोई एतराज़ नहीं होगा. ये बुरी स्थिति नहीं होगी कि देशभक्ति और अपने धर्म को मुसलमान बराबर तवज्जो दें, जिस तरह हिंदुत्ववादी दे रहे हैं.

संघ और तिरंगे का रिश्ता जगज़ाहिर

यह बताना ज़रूरी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को तिरंगे पर गहरा एतराज़ रहा है, संघ और हिंदू महासभा दोनों के बड़े नेताओं ने अनेक मौक़ों पर कहा है कि भारत का झंडा भगवा ही हो सकता है, कुछ और नहीं. सावरकर ने कहा था, "हिंदू किसी भी कीमत पर वफादारी के साथ अखिल हिंदू ध्वज यानी भगवा ध्वज के सिवा किसी और ध्वज को सलाम नहीं कर सकते."
गोलवलकर की राय तिरंगे के बारे में बिल्कुल स्पष्ट थी कि भारत का झंडा एक ही रंग का और भगवा होना चाहिए, उन्होंने कहा, "तीन का शब्द तो अपने आप में ही अशुभ है और तीन रंगों का ध्वज निश्चय ही बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालेगा और देश के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा."
नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पर पहली बार 2002 में झंडा फहराया गया, इसके पहले संघ ने कभी तिरंगा नहीं फहराया था.
गांधी की हत्या पर मिठाई बाँटने की बात कहते हुए तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल ने संघ पर बैन लगा दिया था. कई जानकारों का कहना था कि बैन हटाने की शर्त ये थी कि संघ तिरंगे को राष्ट्रध्वज मान ले. लेकिन हाल के सालों में संघ का कहना है कि ऐसी कोई शर्त नहीं थी.
बाबा मेंढे, रमेश कलम्बे और दिलीप चटवानी नाम के तीन युवकों ने 26 जनवरी 2001 को संघ मुख्यालय पर तिरंगा झंडा फहराने की कोशिश की थी, इनके ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज कर लिया गया था. 2013 में उन्हें इस मामले में बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया. इसे नागपुर केस नंबर 176 के नाम से जाना जाता है.
इसके बाद से संघ के मुख्यालय पर 15 अगस्त और 26 जनवरी को तिरंगा झंडा फहराया जाने लगा. संघ की नज़र में 'झंडा ऊँचा रहे हमारा' का मतलब भगवा ध्वज का ऊँचा रहना है, न कि तिरंगे का.

इतिहास में आख़िर क्या है राजपूतानी आन-बान-शान का सच?

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अभी एक साहित्यिक किरदार पद्मावती को लेकर सड़कों और टीवी चैनलों पर राजपूती शान की रक्षा की बात कही जा रही है.
सवाल उठता है कि क्या इतिहास में राजपूती शान जैसी कोई बात थी. अगर थी तो इसमें कितना मिथक है और कितनी हक़ीक़त है?
आम धारणा है कि राजपूत कभी युद्ध नहीं हारते हैं. वो पीठ नहीं दिखाते हैं. या तो युद्ध जीतकर आते हैं या जान देकर. अगर इसे सच्चाई की कसौटी पर देखें तो ऐसे कई प्रसंग हैं जिनसे ये धारणा मिथक बन जाती हैं.
1191 की तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को हराया था. 1192 में फिर वहीं पर लड़ाई हुई और पृथ्वीराज चौहान को हार का सामना करना पड़ा था.
उसके बाद तो राजपूतों के युद्ध मुग़लों के साथ, सुल्तानों के साथ, मराठों के साथ युद्ध होते रहे, लेकिन किसी में जीत नहीं मिली. यह ऐतिहासिक तथ्य है.
राजपूत युद्ध जीतकर लौटते थे या वीरगति प्राप्त करते थे ये हमेशा सच नहीं है. पृथ्वीराज चौहान जैसे महायोद्धा जिन्हें प्रतीक के तौर पर देखा जाता है, वो दूसरी लड़ाई हारे थे और उन्हें पकड़ा गया था.
मतलब पृथ्वीराज चौहान को भी वीरगति प्राप्त नहीं हुई थी. महाराणा प्रताप को भी हल्दीघाटी में अकबर से हार का सामना करना पड़ा था और उन्हें भी 'चेतक' घोड़े पर सवार होकर भागना पड़ा था.
औरंगज़ेब के जमाने में महाराजा जसवंत सिंह थे, उन्हें भी हार स्वीकार करनी पड़ी थी. तो यह पूरी तरह से मिथक है कि राजपूत या तो युद्ध जीतते हैं या वीरगति प्राप्त करते हैं.
एक दूसरा मिथक यह है कि राजपूत जिसे वचन देते हैं उसे हर हाल में पूरा करते हैं और किसी को धोखा नहीं देते हैं. इसकी मिसाल भी हमें इतिहास में नहीं मिलती है.
बल्कि इसके उलट एक मिसाल है. यह बड़ा ही दर्दनाक उदाहरण है. दाराशिकोह की पत्नी नादिरा ने 1659 के आसपास राजस्थान के राजा सरूप सिंह को अपने स्तन से पानी फेर दूध के तौर पर पिलाया था. नादिरा ने उन्हें बेटा माना था.
कहा जाता है कि उसी नादिरा को सरूप सिंह ने धोखा दिया. नादिरा के बेटे सुलेमान शिकोह को सरूप सिंह ने औरंगज़ेब के कहने पर मारा था. तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि राजपूत जो वचन देते हैं उसे निभाते ही हैं.

राजपूतों का योगदान

बाबर का कहना था कि राजपूत मरना जानते हैं पर जीतना नहीं जानते. इतिहास कभी मिथकों को सच साबित करने का कोशिश नहीं करता है और न ही मिथकों के आधार पर बात करता है. सच यह है कि इतिहास हमेशा मिथकों से हटकर बात करता है.
मिथक तो गढ़े जाते हैं. उसे जनमानस में बैठाया जाता है. राजपूत चूंकि शासक वर्ग था इसलिए मिथक का बनना हमें चौंकाता नहीं है. आधुनिक भारत के निर्माण में भी राजपूतों की कोई ऐसी भूमिका नहीं रही है.
अगर हम इतिहास में राजपूतों की किसी तरह की भूमिका का मूल्यांकन करें तो मुग़ल शासन को स्थायी बनाने और फैलाने में राजपूतों की बड़ी भूमिका रही है. अकबर के ज़माने से आख़िर तक राजपूतों ने मुग़लों के शासन को स्थिरता देने में अहम भूमिका अदा की.
राजपूत मुग़ल शासन के अटूट हिस्सा बन चुके थे. अकबर से पहले तो राजपूत लड़ाइयां ही करते रहे. लगभग 300 सालों तक राजपूतों ने सुल्तानों से लड़ाइयां की हैं.
अकबर ने नीति बनाई कि राजपूतों को मिलाकर चलो और इस नीति से उन्हें साम्राज्य के विस्तार और स्थिरता में फ़ायदा भी मिला. अकबर और औरंगज़ेब के शीर्ष कोटि के योद्धाओ में महाराजा जय सिंह और जसवंत सिंह शामिल थे.
ये आख़िर तक उनके साथ रहे. औरंगज़ेब ने 1679 में फिर से जजिया कर लगा दिया था जिसे बहादुर शाह ज़फ़र ने आते ही ख़त्म कर दिया था. औरंगज़ेब के ज़माने में तो केरल को छोड़कर पूरे पर भारत पर मुगलों का शासन था और इसमें राजपूतों की भी भूमिका रही है. इस बात को मुग़ल भी स्वीकार करते हैं.

तब राजपूतों को मुग़लों के साथ को लेकर शर्मिंदगी नहीं थी

राजपूतों का जो अपना साहित्य है उसमें वो बड़े गर्व के साथ मुग़लों से अपने संबंध को बताते हैं. उन्हें कोई शर्म नहीं है कि राजपूतों ने मुग़लों का साथ दिया. राजपूतों के साहित्य में तो यह बताया गया है कि देखिए हम कितने क़रीब हैं और बादशाहों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं.
मोहता नैनसी महाराजा जसवंत सिंह के सहायक थे. मोहता नैनसी की दो किताबें हैं. एक मारवाड़ विगत दूसरी नैनसी दी ख्यात. इन किताबों में कहीं भी शर्म का अहसास नहीं है कि हमने ये क्या किया और मुग़लों का साथ क्यों दिया. इन किताबों में कोई खेद या अफ़सोस नहीं है.
इस गर्व को शर्म में बदलना अंग्रेज़ ऑफिसर जेम्स टॉड ने शुरू किया. जेम्स टॉड ने ये धारणा बनाना शुरू की कि राजपूत मुग़लों के ग़ुलाम बन गए थे और अंग्रेज़ों ने इन्हें ग़ुलामी से मुक्त कराया.
मतलब मुग़लों से संबंधों को लेकर शर्मिंदगी के भाव को स्थापित करने का काम अंग्रेज़ों ने शुरू किया था. यहां तक कि पद्मावती की इज़्ज़त बचाने के लिए जौहर जैसी बातों को फैलाना टॉड ने ही शुरू किया था.
ये बातें बंगाल तक फैलाई गईं. पद्मावती के कथित जौहर की बात तो राजपूतों के साहित्य में भी नहीं थी.

आज़ादी की लड़ाई में कहां थे राजपूत

अगर हम आज़ादी की लड़ाई की भी बात करें तो राजपूतों की कोई ऐसी भूमिका नहीं थी. बल्कि राजपूत राजाओं ने अंग्रेज़ों का ही साथ दिया था. जितने राजा थे उनमें से दो चार को छोड़ दिया जाए तो किसी ने अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं लड़ी.
लक्ष्मीबाई भी तो आख़िर में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आईं. पहले तो लक्ष्मीबाई ने भी अंग्रेज़ों से समझौते करने की कोशिश की थी. बात नहीं बनी तो उन्होंने संघर्ष की राह चुनी. लक्ष्मीबाई शुरू से बाग़ी नहीं थीं.
हमने रूपक तैयार किए हैं कि लक्ष्मीबाई ने बहादुरी दिखाते हुए देश के लिए अपनी जान तक को दांव पर लगा दिया. ये सब रूपक आज़ादी की लड़ाई के दौरान गढ़े गए थे. दरअसल सभी राजा अपने-अपने राज के लिए लड़ रहे थे. ज़ाहिर है उस वक़्त देश की कोई अवधारणा भी नहीं थी.
हम जाति के आधार पर किसी को श्रेष्ठ या वीर नहीं कह सकते हैं. हम न तो राजपूतों को वीर कह सकते हैं और न ही ब्राह्मणों को विद्वान. सबका अपना निजी स्वार्थ होता है और उसी आधार शासक काम करता है. जातियों से जुड़ा मिथक हक़ीक़त से काफ़ी दूर होता है. और इन मिथकों के लिए इतिहास में कोई जगह नहीं होती है.

राजपूती ख़ून

मेडिकल साइंस की दुनिया में अब डीएनए जैसी चीज़ सामने हैं. भारत में कोई शुद्र हो, ब्राह्मण हो या राजपूत, 98 फ़ीसदी के ख़ून एक जैसे हैं. एक दो फ़ीसदी लोगों के अलग हो सकते हैं. राजपूती ख़ून और शुद्धता की बात तो बिल्कुल बेमानी है.
राजपूतों के मुग़लों से संबंध रहे हैं. दूसरी बात यह कि कोई एक जाति तो राजपूत बनी नहीं. कई जातियां राजपूत बनी थीं. राजपूत कई जातियों का समावेश हैं.मिक्स्चर ऑफ़ ब्लड और नस्ल तो शुरू से ही रहे हैं.
ये प्रक्रिया तो अब भी चली आ रही है और हमें तो इस पर गर्व करना चाहिए. नस्ल की शुद्धता की बात तो हिटलर करता था. शुद्धता की अवधारणा तो अब ख़त्म हो चुकी है.
राजपूतों की एक ख़ूबी हम इस रूप से रेखांकित कर सकते हैं उन्होंने वीरता की संस्कृति को स्थापित किया. राजपूतों ने मुग़लों की संस्कृति को प्रभावित किया.

औरंगज़ेब और मुग़लों की तारीफ़ क्यों करते थे महात्मा गांधी?

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1 नवंबर, 1931 की सुबह थी. लंदन में गुलाबी ठंड पड़ने लगी थी. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के पेम्ब्रोक कॉलेज में एकदम सुबह से ही भीड़ जुटने लगी थी. यहां महात्मा गांधी बोलने आनेवाले थे.
गांधी को यहां सुनने आनेवाले प्रमुख लोगों में ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स एलिस बार्कर, ब्रिटिश राजनीति-विज्ञानी और दार्शनिक गोल्ड्सवर्दी लाविज़ डिकिन्सन, प्रसिद्ध स्कॉटिश धर्मशास्त्री डॉ. जॉन मरे और ब्रिटिश लेखक एवलिन रेंच इत्यादि शामिल थे.
गांधी के सहयोगी महादेव देसाई के मुताबिक गांधी की यह वार्ता अपने तय समय से कई घंटे अधिक समय तक चली थी.
इस बैठक में गांधी खुलकर बोल रहे थे. बोलते-बोलते एक स्थान पर उन्होंने कहा, "मैं यह जानता हूं कि हर ईमानदार अंग्रेज़ भारत को स्वतंत्र देखना चाहता है, लेकिन उनका ऐसा मानना क्या दुःख की बात नहीं है कि ब्रिटिश सेना के वहां से हटते ही दूसरे देश उसपर टूट पड़ेंगे और देश के अंदर आपस में भी भारी मार-काट मच जाएगी? …आपके बिना हमारा क्या होगा, इसकी इतनी अधिक चिंता आपलोगों को क्यों हो रही है? आप अंग्रेज़ों के आने से पहले के इतिहास को देखें, उसमें आपको हिंदू-मुस्लिम दंगों के आज से ज्यादा उदाहरण नहीं मिलेंगे. ...औरंगज़ेब के शासन-काल में हमें दंगों का कोई हवाला नहीं मिलता."

अंग्रेज़ों ने औरंगज़ेब को खराब दिखाया

उसी दिन दोपहर को कैम्ब्रिज में ही 'इंडियन मजलिस' की एक सभा में गांधी ने और स्पष्ट तरीके से कहा- 'जब भारत में ब्रिटिश शासन नहीं था, जब वहां कोई अंग्रेज़ दिखाई नहीं देता था, तब क्या हिंदू, मुसलमान और सिख आपस में बराबर लड़ ही रहे थे?
हिंदू और मुसलमान इतिहासकारों द्वारा दिए गए विस्तृत और सप्रमाण विवरणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि तब हम अपेक्षाकृत अधिक शांतिपूर्वक रह रहे थे. और ग्रामवासी हिंदुओं और मुसलमानों में तो आज भी कोई झगड़ा नहीं है. उन दिनों तो उनके बीच झगड़े का नामो-निशान तक नहीं था.
स्वर्गीय मौलाना मुहम्मद अली, जो खुद एक हद तक इतिहासकार थे, मुझसे अक्सर कहा करते थे कि "अगर अल्लाह ने मुझे इतनी ज़िंदगी बख्शी तो मेरा इरादा भारत में मुसलमानी हुक़ूमत का इतिहास लिखने का है. उसमें दस्तावेज़ी सबूतों के साथ यह दिखा दूंगा कि अंग्रेज़ों ने गलती की है. औरंगज़ेब उतना बुरा नहीं था जितना बुरा अंग्रेज़ इतिहासकारों ने दिखाया है, मुग़ल हुक़ूमत इतनी खराब नहीं थी जितनी खराब अंग्रेज़ इतिहासकारों ने बताई है."
ऐसा ही हिंदू इतिहासकारों ने भी लिखा है. यह झगड़ा पुराना नहीं है. यह झगड़ा तो तब शुरू हुआ जब हम ग़ुलामी की शर्मनाक स्थिति में पड़े."
गांधी ने अपनी पहली किताब हिंद स्वराज में ही इसपर विस्तार से लिखा था कि भारत का इतिहास लिखने में तत्कालीन विदेशी इतिहासकारों ने दुर्भावना और राजनीति से काम लिया था. मुग़ल बादशाहों से लेकर टीपू सुल्तान तक के इतिहास को तोड़-मरोड़कर हिंदू-विरोधी दिखाने की कोशिशों का गांधी कई बार पर्दाफाश कर चुके थे.

अपनी टोपियां खुद बनाते थे औरंगज़ेब

लेकिन औरंगज़ेब के बारे में जो सबसे बड़ी बात महात्मा गांधी को खींचती थी, वह थी औरंगज़ेब की सादगी और श्रमनिष्ठा. 21 जुलाई, 1920 को 'यंग इंडिया' में लिखे अपने प्रसिद्ध लेख 'चरखे का संगीत' में गांधी ने कहा था, "पंडित मालवीयजी ने कहा है कि जब तक भारत की रानी-महारानियां सूत नहीं कातने लगतीं, और राजे-महाराजे करघों पर बैठकर राष्ट्र के लिए कपड़े नहीं बुनने लगते, तब तक उन्हें संतोष नहीं होगा. उन सबके सामने औरंगज़ेब का उदाहरण है, जो अपनी टोपियां खुद ही बनाते थे."
इसी तरह 20 अक्तूबर, 1921 को गुजराती पत्रिका 'नवजीवन' में उन्होंने लिखा, "जो धनवान हो वह श्रम न करे, ऐसा विचार तो हमारे मन में आना ही नहीं चाहिए. इस विचार से हम आलसी और दीन हो गए हैं. औरंगज़ेब को काम करने की कोई ज़रूरत नहीं थी, फिर भी वह टोपी सीता था. हम तो दरिद्र हो चुके हैं, इसलिए श्रम करना हमारा दोहरा फर्ज है."
ठीक यही बात वह 10 नवंबर, 1921 के 'यंग इंडिया' में भी लिखते हैं, "दूसरों को मारने का धंधा करके पेट पालने की अपेक्षा चरखा चलाकर पेट भरना हर हालत में ज्यादा मर्दानगी का काम है. औरंगज़ेब टोपियां सीता था. क्या वह कम बहादुर था?"
मुग़ल शासन में एक तरह का स्वराज था
लेकिन औरंगज़ेब के बारे में जो सबसे अद्भुत बात गांधी ने कही थी, वह कही थी उड़ीसा के कटक की एक सार्वजनिक सभा में जिसमें खासतौर पर वकीलों और विद्यार्थियों ने भाग लिया था.
इसमें गांधी ने इशारा किया था कि अंग्रेज़ों के शासनकाल में भारतीय मानसिक रूप से ग़ुलाम हो गए और उनकी निर्भीकता और रचनात्मकता जाती रही. जबकि मुग़लों के शासन में भारतीयों की स्वतंत्रचेतना और सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर कभी आंच नहीं आई.
24 मार्च, 1921 को आयोजित इस कार्यक्रम में महात्मा गांधी के शब्द थे, "अंग्रेज़ों से पहले का समय ग़ुलामी का समय नहीं था. मुग़ल शासन में हमें एक तरह का स्वराज्य प्राप्त था. अकबर के समय में प्रताप का पैदा होना संभव था और औरंगज़ेब के समय में शिवाजी फल-फूल सकते थे. लेकिन 150 वर्षों के ब्रिटिश शासन ने क्या एक भी प्रताप और शिवाजी को जन्म दिया है? कुछ सामंती देशी राजा जरूर हैं, पर सब-के-सब अंग्रेज़ कारिंदे के सामने घुटने टेकते हैं और अपनी दासता स्वीकार करते हैं."

आज़ाद भारत का सबसे दर्दनाक दंगा

अभी जब विपक्षी दल के भावी अध्यक्ष को लक्ष्य करके औरंगज़ेब का हवाला दिया गया, तो औरंगज़ेब के बारे में गांधी के ये विचार याद आ गए.
सादगी और श्रमनिष्ठा के प्रतीक वे औरंगज़ेब जिनके राज में कभी दंगे नहीं हुए. और औरंगज़ेब की सादगी के बरक्श हमारे कुछ नेताओं की सज-धज चीथड़ों में लिपटे भारत के फटेहाल ग़रीबों को मुंह भी चिढ़ाती हो सकती है.
क्या आज के हमारे शासकों के दरबार में बीरबल जैसा कोई मुंहफट दरबारी हो सकता है, हममें उतनी निर्भयता बची है क्या? जो सच बोलने में जरा भी घबराता न हो? क्या यह वही जनक और याज्ञवल्क्य का भारत है?

एक गरम चाय की प्याली हो!

    


चाय को चाय के पौधे की पत्तियों से बनाया जाता है।
वर्तमान समय में हमारे रोजमर्रा के जीवन में एक चाय के
कप की बहुत अहमीयत है। हम चाय तो रोज़ पीते हैं पर
चाय के बारे में कई मज़ेदार बातों से अनजान हैं। इस पोस्ट
में आपको ऐसी ही मज़ेदार बातों के बारे में बताते हैं–

1. चीन के लोगों ने सबसे पहले चाय पीना शुरू किया। ऐसा
कहा जाता है कि 4700 साल पहले चीन के एक राजा ‘ शैन
नुंग ‘ के सामने रखे गर्म पानी के प्याले में, चाय की कुछ सूखी
पत्तियाँ आकर गिरी जिससे पानी में रंग आ गया। जब राजा
ने उसको जरा सा पीया तो उन्हें स्वाद बहुत पसंद आया ओर
तभी से चाय का सफर शुरू होता है।

2. भारत में चाय की खेती की शुरूआत 1835 में हई थी। दरासल 1815 में कुछ ब्रिटिश यात्रियों का ध्यान असम में उगने वाली चाय की झाड़ियों पर गया था जिसे स्थानीय कबाइली लोग एक पेय बनाकर पीते थे। इसके बाद 1834 में अंग्रेज़ सरकार द्वारा एक समिति का गठन किया गया जिसका उद्देश्य भारत में चाय की परंपरा शुरू करने और उसका उत्पादन करने की संभावना तलाश करना था। तब जाकर भारत में 1835 में चाय के पहले बाग लगाए गए।

3. पहले की कुछ सदियों तक चाय का उपयोग एक दवाई के रूप में ही होता रहा था। इसे रोज पीने की परंपरा खास कर
भारत में पिछली सदी से शुरू हुई थी।

4. एक अनुमान के अनुसार चाय की 1500 से ज्यादा किस्में हैं। भले ही संसार में चाय की 1500 से ज्यादा किस्में हैं पर इनमें से मुख किस्में हैं – काली, हरी, सफेद और पीली। काली चाय
कुल चाय के उपयोग का 75 प्रतीशत होती है।

5. भारत लंम्बे समय तक चाय का सबसे बड़ा उत्पादक देश रहा, परंतु पिछले कुछ सालों से चीन इसे पछाड़ कर आगे निकल गया है। भारत में चाय का उत्पादन मुख्य रूप से आसाम और दारजलिंग में होता है। चाय आसाम का ‘राजकीय पेय’ भी है।

6. 1610 ईसवी में डच व्यापारी चाय को चीन से युरोप ले गए
और तभी से धीरे-धीरे चाय पूरी दूनिया का पसंदीदा पेय बन
गया।

7. पानी के बाद, चाय ऐसा पेय पदार्थ है जो सबसे ज्यादा
पीया जाता है।

8. यदि चाय की पत्तियों को अच्छी तरह से पानी में भिगो
के उसनी गंध(smell) को घर में फैलाया जाए तो यह
प्राकृतिक Allout का काम करती हैं, मतलब कि मच्छर दूर रहते हैं।

9. अफ़गानिस्तान और ईरान का राष्ट्रीय पेय (national
drink) चाय है।

10. इंग्लैंड के लोग रोजाना 16 करोड़ चाय के कप पीते हैं। इस तरह से एक साल में इंग्लैंड के लोग 60 अरब चाय के कप पी जाते हैं।

11. पूरी दुनिया में सालाना 30 लाख टन चाय का उत्पादन
होता है। मतलब कि 3000000000 (3 अरब) किलोग्राम।

12. काली चाय की सबसे ज़्यादा खपत भारत ने ही होती है।
13. भारत में हर व्यक्ति हर साल करीब 750 ग्राम चाय का सेवन करता है।
14. अमेरिका में 80% चाय की खपत “Ice-Tea ” के रुप में होती है।
15. 82% रशियन हर रोज़ चाय पिते है।
16. तूर्की का लगभग हर व्यक्ति हर रोज़ करीब 10 कप चाय पीता है।
17. खाली पेट ब्लैक टी पीने से पेट फूलता है।
18. स्ट्रांग चाय पीने वालों को अल्सर होने का खतरा रहता है।
19. चाय में कैफीन, एल-थायनिन और थियोफाइलिन होता है। इससे खाली पेट पीने से अपच हो सकती है।
20. एक दिन में 4-5 कप चाय पीने से पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर की संभावना हो सकती है।
21. चाय में एंटीऑक्सीडेंट शामिल होता है। चाय उम्र बढ़ने से आपके शरीर की रक्षा करती है।
22. रोज़ छह कप से अधिक चाय पीने से दिल की बीमारी होने का खतरा एक तिहाई तक कम हो सकता है।
23. चाय वास्तव में फ्लोराइड और में टैनिंन से बनी होती है जो प्‍लेग को दूर रखता है। इसीलिए स्वस्थ दांतों और मसूड़ों के लिए चाय लाभदायक है ।

शाहरुख़ ख़ान की 52 ख़ास बातें!

    


बॉलीवुड के बेताज बादशाह शाहरुख़ ख़ान आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. हर उम्र के लोगों में उनकी फैन फॉलोइंग है. 2 नवंबर 1965 को जन्मे शाहरुख़ खान से जुड़ी 52 खास बातें.
1. शाहरुख ख़ान का जन्म 2 नवंबर 1965 को ताज मोहम्मद ख़ान और लतीफ़ फ़ातिमा के घर हुआ था. लेकिन शुरुआती पांच सालों तक उनकी नानी ने पहले मैंगलोर और फ़िर बैंगलोर में उनका पालन किया.
2. शाहरुख अपने नाना नानी के साथ रहते थे. उनके नाना मैंगलोर पोर्ट के मुख्य अभियंता थे. हार्बर हाउस जहां मैंगलोर में वो रहे, आज उसे देखने टूरिस्ट पहुंचते हैं.
3. शाहरुख की मां हैदराबाद से, पिता पेशावर से और दादी कश्मीर से हैं.
4. दिल्ली में पले बढ़े शाहरुख सैंट कोलंबास स्कूल में पढ़ाई के दौरान खेलों में काफ़ी रूचि लेते थे. बाद में उन्होंने हंसराज कॉलेज से अर्थशास्त्र में बीए पास किया और जामिया मिलिया इस्लामिया में मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया लेकिन इसकी पढ़ाई को पूरा नहीं कर सके.
5. फ़ुटबॉल खेलने के दौरान घायल हुए शाहरुख़ से थियेटर डायरेक्टर बैरी जॉन ने एक बार अपनी एक नाटक के लिए ऑडिशन देने को कहा. इसमें उन्हें एक डायलॉग के साथ प्रमुख डांसर का किरदार मिला. हालांकि बैरी जॉन शुरुआत में उनकी गाने की काबिलियती से काफ़ी प्रभावित थे.
6. शाहरुख जब 15 साल के थे तब कैंसर से उनके पिता का निधन हो गया. उनके पिता वकील और स्वतंत्रता सेनानी थे. वो जब 14-15 साल के थे तो स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल गए. बाद में वो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के ख़िलाफ़ चुनाव भी लड़े लेकिन हार गए. उन्होंने कई बिजनेस में हाथ आजमाए लेकिन असफल रहे.
7. शाहरुख का नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के साथ नजदीकी रिश्ता रहा. उनके पिता 1974 तक एनएसडी में मेस चलाते थे और तब शाहरुख़ अपने पिता के साथ वहां जाया करते. वहां उन्हें रोहिणी हटंगड़ी, सुरेखा सिकरी, रघुवीर यादव, राज बब्बर जैसे कलाकार अभिनय करते दिखते. वो इब्राहिम अलकाज़ी के साथ रहते और 'सूरज का सातवां घोड़ा' जैसे नाटकों का रिहर्सल देखते. इस प्रकार अभिनय और सिनेमा से उनका जुड़ाव शुरू हुआ.
8. शाहरुख़ ख़ान की पहली कमाई 50 रुपये की थी जो उन्होंने पंकज उधास के कंसर्ट के दौरान कमाया. इस कमाई के पैसे से वो ट्रेन से आगरा गए.
9. दिल्ली में ये लेख टंडन थे जिन्होंने 1988 में उन्हें दिल दरिया सीरियल में काम दिया. उनकी शर्त थी कि शाहरुख़ को अपने बाल काटने होंगे.
10. हालांकि, उनका पहला टीवी सीरियल कर्नल कपूर द्वारा निर्देशित फ़ौजी (1989) था. कर्नल कपूर ने कुछ लड़कों को दौड़ा कर देखा. केवल कुछ ही लड़के वापस लौटे जिनमें शाहरुख़ भी एक थे. शाहरुख़ उनके साथ फ़ौजी के लिए चुन लिए गए.
11. शाहरुख़ जब छोटे थे तो उनकी सेना में जाने की तमन्ना थी और उन्होंने आर्मी स्कूल कोलकाता में एडमिशन भी लिया लेकिन उनकी मां इसके लिए राजी नहीं हुईं.
12. शाहरुख़ और उनके चार स्कूली दोस्तों के प्रसिद्ध गैंग थे जिसे वो सीगैंग कहते थे. प्रतिद्वंद्वी स्कूल गैंग जैसे पीएलओ गैंग, सरदार गैंग के जवाब में उसका एक लोगो था. बाद में उन्होंने ऐसा ही एक किरदार फ़िल्म जोश में निभाया जहां वो एक गैंग के हिस्सा हैं.
13. एक आर्मी वाले की बेटी गौरी छिब्बा के स्कूल के दौरान ही शाहरुख़ की उनसे मुलाकात हुई. एक डांस पार्टी के दौरान दोनों की आपस में बातचीत हुई और तब से दोनों में रिश्ता पनपने लगा. एक बार जब गौरी अपने दोस्तों के साथ छुट्टी मनाने मुंबई गई थीं तो शाहरुख़ ख़ान भी मुंबई पहुंच गए, बिना यह जाने की उन्हें कहां ढूंढेंगे. यह जानते थे कि उन्हें तैराकी पसंद है, वो मुंबई के सभी समुद्र तटों पर उन्हें ढूंढते रहे और अंत में एक बीच पर उन्हें तलाश लिया. उस दौरान रात को उन्हें रेलवे स्टेशन पर अपनी रात गुजारनी पड़ी. इन दोनों की शादी 25 अक्तूबर 1991 को हुई.
14. शाहरुख़ को गौरी से मुलाकात की तारीख़ 09.09.1984 याद है, ये वही तारीख़ है जब उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस भी मिला था.
15. वागले की दुनिया, दूसरा केवल सरीखे सीरियल में काम करने के बाद शाहरुख़ को टीवी सीरियल सर्कस (1989-90) में रेणुका शहाने के साथ काम मिला. तब उनकी मां बेहद बीमार थीं और उन्हें दिल्ली के बत्रा अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उन्होंने अपनी मां को सर्कस का एक एपिसोड दिखाने की ख़ास अनुमति ली, लेकिन वो इतनी बीमार थीं कि शाहरुख़ को पहचान तक नहीं सकीं. अप्रैल 1991 में उनकी मौत हो गई.
16. मां के निधन के दर्द के उबरने के लिए शाहरुख एक साल के लिए मुंबई आए और फ़िर कभी वापस नहीं लौटे.
17. शाहरुख़ ने 1991 में मणि कौल की टीवी फ़िल्म इडियट में नकारात्मक भूमिका निभाई. लेकिन पहली बार कैमरा प्रदीप किशन और अरुंधती रॉय की फ़िल्म 'इन विच एनी गिव्स इट दोज़ वन्स' के लिए फेस किया. हालांकि, फ़िल्म में उनका किरदार कम कर दिया गया.
18. 1991 में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म हेमा मालिनी 'दिल आसना है' साइन किया. जबकि मुख्य अभिनेता के रूप में उनकी पहली फ़िल्म 25 जून 1992 को 'दीवाना' आई.
19. राहुल नाम तो सुना होगा- डर, दिल तो पागल है, कुछ कुछ होता है, ज़माना दीवाना, यस बॉस, कभी खुशी कभी गम, चेन्नई एक्सप्रेस समेत 9 फ़िल्मों में शाहरुख़ का नाम राहुल था.
20. राज नाम भी शाहरुख़ ख़ान को प्रिय रहा. राजू, डीडीएलजे, बादशाह, मोहब्बतें, रब ने बना दी जोड़ी में उनका यही नाम था.
21. रुपहले पर्दे पर शाहरुख़ की कई फ़िल्मों में मौत हो जाती है. बाज़ीगर, डर, अंजाम, दिल से, राम जाने, डुप्लीकेट, देवदास, शक्ति, कल हो ना हो, ओम शांति ओम, रा-वन, करण अर्जुन (इसमें पुनर्जन्म भी हुआ).
22. शाहरुख़ कठिन मेहनत के लिए जाने जाते हैं, वो केवल 4-5 घंटे सोते हैं. उनका फेवरेट लाइन है कि सोना जीवन को बर्बाद करना है.
23. शाहरुख़ अपनी बेटी के लिए एक किताब लिख रहे हैं, जिसमें वो अभिनय पर अपना नजरिया बताएंगे. अनुपम खेर के टीवी शो में उन्होंने अपनी किताब के नाम का खुलासा किया- टू सुहाना, ऑन एक्टिंग, फ्रॉम पापा. उन्होंने इस शो में यह भी बताया कि वो अपनी बेटी को एक अभिनेत्री के रूप में देखना चाहते हैं.
24. शाहरुख़ एक दशक से भी अधिक समय से अपनी जिंदगी पर एक किताब लिख रहे हैं. उन्होंने इसे निर्माता-निर्देशक महेश भट्टे के अनुरोध पर लिखना शुरू किया.
25. शाहरुख़ और सलमान ने 1996 में महमूद की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म दुश्मन दुनिया में साथ काम किया था. इसमें उनका स्पेशल अपियरेंस था.
26. पत्नी और बच्चों के अलावा शाहरुख़ के साथ उनकी बड़ी बहन लालारुख़ रहती हैं. वो एमए, एलएलबी हैं.
27. दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे की कहानी सुनने के समय अधिकतर क्रू को लगा कि शाहरुख़ ने फ़िल्म के लिए ना कह दिया है. वो सैफ़ अली ख़ान को लेने की सोच रहे थे. तब शाहरुख़ एक रोमांटिक फ़िल्म नहीं करना चाहते थे. लेकिन उन्होंने हां कहा और फ़िल्म में एक्शन और फ़ाइट के सीन जोड़े.
28. डीडीएलजे की शूटिंग खेतों में किए जाने का जब किसानों ने विरोध किया तो शाहरुख़ ख़ान ने ख़ास हरियाणवी लहजे में उन्हें इसके लिए राजी किया, तब जा कर 'तुझे देखा तो ये जाना सनम...' शूट की गई.
29. डीडीएलजे की शूटिंग का कुछ हिस्सा शूट करने के दौरान ही वो त्रिमूर्ति की भी शूटिंग में भाग ले रहे थे.
30. शाहरुख़ ने फ़िल्म जोश में 'अपुन बोला...' गाना भी गाया है.
31. एक युवा के रूप में शाहरुख़ ख़ान कुमार गौरव से मिलना चाहते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वो कुमार गौरव के जैसे दिखते हैं.
32. शाहरुख़ को फ़ौजी के दौरान पहली बार अपने फैन का सामना करना पड़ा. एक बार वो दिल्ली के पंचशील पार्क इलाके में थ्रीव्हिलर में जा रहे थे तभी दो महिलाएं चिल्लाईं 'देख अभिमन्यु राय'. फ़ौजी में उनके किरदार का यही नाम था.
33. शाहरुख़ का पेशावर से भी संबंध है. वो 1978-79 के दौरान वहां गए थे. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उनकी चचेरी बहन नूर जहां ने बताया कि वो यहां आकर बहुत खुश थे क्योंकि यह पहला मौका था जब वो अपने पिता के परिवार से मिल रहे थे. भारत में केवल उनकी मां के परिवार से संबंधी रहते हैं.
34. शाहरुख़ रामलीला में भी काम कर चुके हैं. छाबरा रामलीला नई दिल्ली के साथ. वो वानर सेना में हुआ करते थे.
35. रामलीला में ब्रेक के दौरान वो उर्दू की शायरी कहा करते और इसके एवज में उन्हें 1 रुपये का ईनाम मिला करता था.
36. अपने फैन से बचने के लिए शाहरुख़ को एक बार कार की डिक्की में भी सवारी करनी पड़ी थी.
37. लॉस एंजिल्स में एक स्टेज शो के दौरान मैडोना देखने पहुंची तो शाहरुख़ अपनी स्टेप्स भूल गए.
38. बॉलीवुड की एक कॉमेडी है 'आमिर सलमान शाहरुख़' जिसमें आमिर, सलमान और शाहरुख़ ख़ान के डुप्लिकेट ने काम किया.
39. शाहरुख़, आमिर और सैफ़ ने एक साथ 1993 में फ़िल्म पहला नशा में एक कैमियो की भूमिका निभाई.
40. बेंगलुरु में अपने नाना नानी के साथ रहने के दौरान शाहरुख़ के पड़ोसी अभिनेता महमूद थे.
41. शाहरुख़ को खिलौनों से अब भी बहुत लगाव है.
42. शाहरुख़ के पिता घर पर हिन्दको भाषा बोलते थे, यह पाकिस्तान में बोली जाने वाली एक पंजाबी बोली है.
43. स्कूल के दौरान शाहरुख़ हिंदी में कमजोर थे. जब एक बार उन्हें 10 में दस अंक मिले तो उनकी मां उन्हें देवानंद की फ़िल्म जोशीला दिखाने ले गईं.
44. एक टीवी शो में शाहरुख़ ने बताया कि जन्म के बाद उन्होंने पहला शब्द चम्पा बोला था. ये उस महिला का नाम था जो उनके पड़ोस में रहती थीं.
45. शाहरुख़ को उनके जन्म पर चांदी का टब उपहार में दिया गया था.
46. शाहरुख़ के ट्विटर पर लगभग तीन करोड़ फॉलोवर हैं.
47. शाहरुख़ को फ़िल्मों में घुड़सवारी और किसिंग सीन से डर लगता है.
48. शाहरुख़ के पापा और बहन घुड़सवारी किया करते थे. दोनों भाई बहन का नाम उनके पिता के घोड़े के नाम पर रखा गया है.
49. 1998 में जी सीने अवार्ड के लिए सर्वेश्रेष्ठ अभिनेता चुने जाने पर उन्होंने स्टेज पर सलमान ख़ान को बुलाया और उनकी ओर से सभी का शुक्रिया अदा करने को कहा क्योंकि सलमान को लगता है कि सारे अवार्ड्स शाहरुख़ को मिल जाते हैं उन्हें नहीं.
50. शाहरुख़ ऐसे पहले बॉलीवुड एक्टर हैं जिन्हें मलेशिया के (नाइटहुड के समान) प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा गया है. 2014 में उन्हें फ्रांस के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार लिजन ऑफ़ ऑनर दिया गया. 2005 में उन्हें पद्म श्री मिला. यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबर्ग से डॉक्टरेट की उपाधि भी मिली.
51. 2004 में शाहरुख़ ख़ान टाइम मैगज़ीन के कवर पर भी आए.
52. फोर्ब्स मैगज़ीन ने शाहरुख़ ख़ान को दुनिया के 10 सर्वाधिक कमाई करने वाले अभिनेताओं में आठवें नंबर पर रखा है.

इस्लामोफोबिया और हम

    


जब भारत अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, उस वक्त देश में सामाजिक स्थिति बहुत बुरी थी. सती प्रथा जैसी क्रूरता समाज में मौजूद थी जिसे देखकर अंग्रेजों ने भारत को बहुत पिछड़ा घोषित कर दिया था. फिर जाति प्रथा को देखकर उन्होंने समां बांधा कि भारत को सुधारना हमारी जिम्मेदारी है. सुधारने लगे. तमाम कानून लगाने लगे. लोगों को बेइज्जत करने लगे. इसके तमाम उदाहरण हैं. वो अपने सामने हिंदुस्तानियों को कुछ समझते ही नहीं थे. तो हिंदुस्तानियों ने क्या किया?

#. कॉलोनियल शासकों नीतियों से हम आज तक नहीं उबर पाए हैं
हथियार उठाया. कभी छोटी तो कभी बड़ी लड़ाइयां लड़ीं. कॉलोनियल शासकों ने लड़ने वाले हिंदुस्तानियों को क्या कहा? आतंकवादी. भगत सिंह को भी ब्रिटेन आज भी टेररिस्ट ही लिखता है. इसको लेकर भारत में कई बार बवाल भी हो चुका है.
ये बात जरूर थी कि भारतीय समाज में बहुत कमियां थीं जो यूरोपियन समाज की आधुनिकता के आगे नहीं ठहरती थीं. पर इसका क्या मतलब था कि हिंदुस्तानियों को हर जगह बेइज्जत किया जाए? यहां का धन लूटकर ब्रिटेन ले जाया जाए? अपने हक के लिए लड़नेवालों को आतंकवादी कहा जाए? जलियांवाला बाग जैसी घटनाएं की जाएं? और विक्टिम इसका जवाब अहिंसा से दे तभी बेहतर है? तभी वो उनकी गुड बुक्स में आ।
जब भारत अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, उस वक्त देश में सामाजिक स्थिति बहुत बुरी थी. सती प्रथा जैसी क्रूरता समाज में मौजूद थी जिसे देखकर अंग्रेजों ने भारत को बहुत पिछड़ा घोषित कर दिया था. फिर जाति प्रथा को देखकर उन्होंने समां बांधा कि भारत को सुधारना हमारी जिम्मेदारी है. सुधारने लगे. तमाम कानून लगाने लगे. लोगों को बेइज्जत करने लगे. इसके तमाम उदाहरण हैं. वो अपने सामने हिंदुस्तानियों को कुछ समझते ही नहीं थे. तो हिंदुस्तानियों ने क्या किया?
#. कॉलोनियल शासकों नीतियों से हम आज तक नहीं उबर पाए हैं
हथियार उठाया. कभी छोटी तो कभी बड़ी लड़ाइयां लड़ीं. कॉलोनियल शासकों ने लड़ने वाले हिंदुस्तानियों को क्या कहा? आतंकवादी. भगत सिंह को भी ब्रिटेन आज भी टेररिस्ट ही लिखता है. इसको लेकर भारत में कई बार बवाल भी हो चुका है.
ये बात जरूर थी कि भारतीय समाज में बहुत कमियां थीं जो यूरोपियन समाज की आधुनिकता के आगे नहीं ठहरती थीं. पर इसका क्या मतलब था कि हिंदुस्तानियों को हर जगह बेइज्जत किया जाए? यहां का धन लूटकर ब्रिटेन ले जाया जाए? अपने हक के लिए लड़नेवालों को आतंकवादी कहा जाए? जलियांवाला बाग जैसी घटनाएं की जाएं? और विक्टिम इसका जवाब अहिंसा से दे तभी बेहतर है? तभी वो उनकी गुड बुक्स में आ पाएगा?
कॉलोनियल शासकों ने भारत पर कैसे शासन किया और जब छोड़ के गए तो कैसे छोड़ कर गए? फूट डालो और राज करो. साधारण परंतु बेहद ताकतवर नीति. जाते समय भी देश को दो क्या बल्कि तीन हिस्सों में बांट के गये. इसके मुख्य जिम्मेदार वही थे. हिंदुस्तानी नेता तो लाचार थे.
भारत  में आज तक कॉलोनियल शासन को यहां की कमियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है. ये सच भी है. कोई भी समाज खुद से विकास करे तभी आत्मसम्मान रह पाता है. अगर उसे मजबूर किया जाए तो हीनता का बोध होता है. जो गुस्से के रूप में कहीं ना कहीं निकलता है. ये हिंदुस्तान में भी होता है.
#. उस वक्त के इस्लामिक क्षेत्रों की स्थिति देखते हैं
1798 में फ्रांस के शासक नेपोलियन ने इजिप्ट को अपने कब्जे में कर लिया. सोचा कि स्वेज के पास ताकत मिलने पर ब्रिटिश लोगों को इंडिया जाने से रोका जा सकेगा. ज्ञात रहे कि ब्रिटेन ने इंडिया के दम पर ही पूरी दुनिया की नाक में दम कर रखा था. नेपोलियन ने इसके लिए इजिप्ट में फ्रेंच पढ़ाई और कल्चर को थोपना शुरू कर दिया था. फिर सीरिया में भी कोशिश की. पर उसके दोनों प्रयास असफल रहे. फिर ब्रिटेन ने ईरान समेत बाकी जगहों पर नजर भिड़ानी शुरू कर दी.
पूरा यूरोप ही उस समय पूरी दुनिया को तरबूज की तरह काटकर आपस में बांट रहा था. फ्रांस ने 1830 में अल्जीरिया पर कब्जा किया. दस साल बाद ब्रिटेन ने अदन पर. इसी तरह 1880 के बाद ट्यूनीशिया, इजिप्ट, सूडान, लीबिया और मोरक्को सब पर कब्जा कर लिया गया. इसी वक्त रूस ने भी सेंट्रल एशिया के देशों पर नजर जमानी शुरू कर दी. उधर 1915 में साइक्स पाइकोट एग्रीमेंट हुआ और मुसलमानों के महान ओटोमन साम्राज्य को आपस में बांट लिया गया. ख्याल रहे कि उस वक्त ईरान और इराक में तेल की खोज नहीं हुई थी. सिर्फ राजनीतिक वजहों से ये चीजें हो रही थीं. किसी और देश को एशिया में फायदा नहीं उठाने दिया जाएगा. एशिया बोले तो मुख्यतया इंडिया और चीन.
फिर दो विश्वयुद्ध हुए. ये यूरोपियन देशों ने ही लड़ा. एशिया और इस्लामिक देश तो मजबूरी में लड़े. ये लड़ाई कॉलोनियलिज्म का ही रिजल्ट थी. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ही भारत समेत ये सारे मुस्लिम देश आजाद हुए.
अब सोचिए कि भारत को आजाद करते वक्त ये शासक दो भागों में बांटकर गए, तो बाकी देशों के साथ क्या किया? 56 मुस्लिम देश हैं पूरी दुनिया में. इनमें से ज्यादातर में दो या दो से अधिक समुदायों में जर-जमीन और ताकत को लेकर झगड़ा है. ये बिल्कुल वही स्थिति है, जो भारत के साथ हुई थी.
#. अमेरिका ने कॉलोनियां तो नहीं बनाई पर इस्लामिक देशों में तानाशाही और आतंकवाद इसकी ही देन है
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद कई मुस्लिम देशों में तेल की खोज हो गई और तेल का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा. अब दुनिया की व्यापारिक लड़ाई समुद्र के रास्तों पर कब्जे से हटकर तेल पर आ गई थी. अमेरिका अब ब्रिटेन की जगह नया दादा बना था. अमेरिका ने कभी भी किसी देश को कॉलोनियल सत्ता के अधीन लाने की कोशिश नहीं की. पर तेल पर नियंत्रण के लिए उसने तकरीबन हर इस्लामिक देश में तानाशाही को फंड किया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण ईरान है. ईरान में 60 के दशक में लड़कियां हाफ पैंट पहन के घूमती थीं. 1979 में वहां इस्लामिक क्रांति हुई और सत्ता कठमुल्लों के हाथ जा पहुंची. अमेरिका ही इसका सूत्रधार था. बाकी देशों में भी ऐसा ही हुआ. अफगानिस्तान पर कब्जे को लेकर अमेरिका और रूस ने वहां का बंटाधार कर दिया. अब सोचिए कि क्या वहां के मुसलमान इन देशों से खुश होंगे?
दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात. यूरोपियन देशों और अमेरिका ने इन इस्लामिक देशों को टेक्नॉल्जी से मरहूम रखा. अपनी जरूरत की रेल बिछाई बस. मतलब विकास भी इन देशों में सिर्फ तेल के दम पर हो रहा था. जब टेक्नॉल्जी नहीं आएगी तो समाज में सुधार कैसे होगा? टेक्नाॉल्जी आने से ही तो औरत और मर्द में बराबरी आती है.
ऐसा नहीं है कि ये पहली बार इस्लाम के साथ ही हो रहा था. पूरे यूरोप में यहूदियों को प्रताड़ित किया जा रहा था पिछले 2000 सालों से. बाद में हिटलर ने इस प्रताड़ना की इंतिहा कर दी. अपने अपराध से मुक्ति पाने के लिए यूरोप ने यहूदियों को इजराइल दे दिया. वो जगह जहां अरब रहते थे. ये मुस्लिम समाज के आत्मसम्मान पर बहुत बड़ा दाग था. इस चीज से वो आजतक मुक्त नहीं हो पाए हैं. अमेरिका और इंग्लैंड भी आज भी अपने अपने क्षेत्रों को लेकर इमोशनल रहते हैं. रूस ने तो 3 साल पहले क्रीमिया को हड़प लिया. चीन सबको धमकी देते रहता है जमीन को लेकर. तो अरब कहां गलत हैं?
#. अब बात आती है इस्लाम के पूरी दुनिया का दुश्मन बनने की
ये सही है कि इस्लामिक देशों में सामाजिक बुराइयां बहुत हैं. पर इसका मतलब ये नहीं है कि उनके साथ कुछ भी कर दिया जाए. अमेरिका ने अफगानिस्तान में रूस को हराने के लिए जिन मुजाहिदीनों को बढ़ावा दिया उन्होंने ही 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर गिरा दिया. ये अमेरिका पर इस्लाम का हमला नहीं था. ये हमला था उन आतंकवादियों का जिनको अमेरिका ने बढ़ावा दिया था और बाद में पैसा देना बंद कर दिया था
इसके बाद शुरू हुआ प्रोपेगैंडा का दौर. इस्लामोफोबिया एक नया शब्द गढ़ा गया. मतलब लोग इस्लाम से डरने लगे. क्योंकि रोज ही नई खबरें आतीं कि इस्लामिक देशों के लोग कितने क्रूर होते हैं. पर इसमें एक चीज छुपा ली जाती कि लोग क्रूर नहीं होते, बल्कि सैनिक क्रूर होते हैं. वो सैनिक जो तानाशाहों और गैंग के लीडरों के अंडर काम करते हैं. जैसे कि अमेरिका के सैनिक जिन्होंने इंटरोगेशन के नाम पर ग्वांटानामो बे में प्रताड़ना की सीमा पार कर दी. पर इस्लामिक देशों के पास उतनी पावरफुल मीडिया नहीं थी. क्योंकि ज्यादातर देश या तो तानाशाही में थे या फिर गरीब थे. उनके यहां पुराने जमाने की विद्वत्ता तो थी पर आधुनिकता के हिसाब से विद्वत्ता नहीं आ पाई थी. कोई बोलने वाला भी नहीं था.
#. अब 2017 में इस्लाम को समझने के लिए इन 5 घटनाओं का सहारा लेंगे:
1.  
जॉर्ज बुश का कहना कि या तो आप हमारे साथ हैं या फिर उनके साथ हैं
अफगानिस्तान पर हमला करने से पहले बुश ने ये कहा था. पर ये आतंकवादियों के खिलाफ था. प्रोपेगैंडा मीडिया ने इसे इस्लाम के खिलाफ बना दिया. तुरंत चारों ओर संदेश गया कि मुसलमान यूरोप के खिलाफ हैं. लेकिन ऐसा नहीं था.
2. ISIS  का उदय
इस संगठन के उदय ने ये जताया कि सारे मुसलमान इतने हिंसक होते हैं. लोगों को मुसलमान सुनते ही इस संगठन का खयाल आने लगा. पर ऐसा भी नहीं था. दुनिया के हर देश के मुसलमानों ने कहा है कि ये लोग इस्लाम के प्रतिनिधि नहीं हैं. इन लोगों के पास हथियार कहां से आते हैं, ये अलग उत्सुकता का विषय है. क्योंकि इन देशों में हथियार नहीं बनते, यूरोपीय और अमेरिकी देशों में ही बनते हैं. लेकिन मीडिया ने बाकी मुसलमानों को दिखाने के बजाय इस संगठन को ही इस्लाम के प्रतिनिधि के तौर पर दिखाना शुरू किया.
3. शार्ली हेब्दो हमला
फ्रांस की मैगजीन शार्ली हेब्दो ने मुहम्मद का कार्टून छापा. छापने वाले भी अल्जीरियाई मूल के थे, जहां कभी फ्रांस का कब्जा हुआ करता था. उनको मारने वाले भी अल्जीरियाई मूल के ही थे. तो ये इस्लाम का मामला नहीं था. ये बस उसी पुराने झंझट की पैदाइश थी जिसे कॉलोनियलिज्म ने पैदा किया था. पर तुरंत कोई शिकार मिला तो वो था इस्लाम.
4. फ्रांस का बुर्कीनी मोमेंट
फ्रांस ने दुनिया को फ्रीडम से जुड़ी बहुत चीजें दी हैं. पर अपने यहां बीच पर एक औरत का बुर्का पहन के बैठना उनको भारी पड़ गया. पुलिस ने बुर्का उतरवा दिया. इससे ये संदेश गया  कि इस्लाम की औरतें भी कट्टर हैं और वो उन्हीं प्रथाओं का पालन करती हैं जिनको वेस्ट का समाज पिछड़ा मानता है. पर ये घटना इस्लाम के बजाय पुलिस शासन की कट्टरता दिखाती है. फ्रांस यहां पर गलती कर बैठा. लेकिन ताकतवर प्रोपेगैंडा ने इसे भी इस्लाम की कमी ही बना दिया.
5. रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या
इस समस्या को बौद्ध बनाम इस्लाम बनाने की कोशिश की जा रही है. इसको चीन में हो रहे मुस्लिम समस्या और श्रीलंका की मुस्लिम माइनॉरिटी समस्या से जोड़ा जा रहा है. पर लोग ये भूल रहे हैं कि तीनों ही जगहों पर इस्लाम माइनॉरिटी में है. और तीनों का आपस में कोई संबंध नहीं है. पर दुनिया में तेजी से फैल रहे इस्लामोफोबिया ने तीनों को जोड़ने का काम किया है.
#. पहले जो हाल कॉलोनियों का था, अब वही हाल इस्लाम का हो गया है
इस लेख का मतलब ये नहीं कि इस्लाम के नाम पर किया जाने वाला आतंकवाद सही है. ये बिल्कुल ही गलत है. पर इस गलती को सही करने के नाम पर जो किया जा रहा है, वो और भी गलत है. ये वही गलती है जो कॉलोनियलिज्म ने 200 सालों तक दुनिया के साथ किया था. और अब इस्लाम को टार्गेट बनाकर कर रहे हैं. क्योंकि ये 56 देश अभी भी वहीं फंसे हैं, जहां 19वीं शताब्दी के देश फंसे हुए थे.  ये सारे देश अपनी कोशिशों से आगे आ सकते हैं. लेकिन लगातार इनकी भर्त्सना करने और इनपर हमले करने से तो कुछ नहीं होगा. अभी तो ऐसा हो गया है कि मुसलमान पर कोई भी ब्लेम लगाया जा सकता है. तमाम तरह की फेक न्यूज़ एजेंसीज़ आ चुकी हैं. जो उनपर नित नये आरोप लगाती हैं. लगातार ऐसा प्रचारित किया जाता है जैसे सारे मुसलमान दिन रात नमाज पढ़ते हैं और बाकी वक्त बॉम्ब ब्लास्ट की प्लानिंग करते हैं. उनके बारे में सही चीजें बताई ही नहीं जातीं.
#. बहस करने वाले आधे से ज़्यादा लोगों को मुद्दो की पूरी समझ भी नहीं है
अगर हिंदुस्तान की बात करें तो सच्चर कमिटी की ही रिपोर्ट पढ़ लें. इससे साफ साफ पता चलता है कि मुस्लिम समाज का शैक्षणिक स्तर इतना नीचे है कि बामियान में बुद्ध के गिरने की ये भर्त्सना ही नहीं कर सकते. क्योंकि इनको समझ ही नहीं आएगा. ये थोड़ी क्रूर बात लग सकती है. लेकिन ये सच्चाई है कि मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर, ये किसी को समझ नहीं आएगा.
हिंदू समाज के साथ भी यही हाल है, बाबरी मुद्दे का सच किसको समझ आया है? ठीक इसी तरह रोहिंग्या मुसलमान और भी नीचे हैं. उस स्तर पर कोई खाने, पीने और सोने के अलावा कुछ और सोच ही नहीं पाएगा. उनके यहां कोई विद्वान नहीं बैठा है, जो हर चीज की आलोचना कर सके.  अगर वाकई में कोई मुसलमानों का भला चाहता है तो सबसे पहले उनपर आरोप लगाना बंद कर दे. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है बॉलीवुड. यहां कोई जजमेंट पास नहीं किया गया और भारत को तीन खान मिले. सोचिए कि इस्लाम के नाम पर प्रताड़ित किया जाता तो क्या होता? रोज कहा जाता कि तुम्हारे समाज में तो ये होता है, वो होता है तो क्या आमिर खान तीन साल मेहनत करके एक फिल्म बना सकते?