गर्मी में ऐसे काम करता है शरीर! ~ Shamsher ALI Siddiquee

Shamsher ALI Siddiquee

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गर्मी में ऐसे काम करता है शरीर!

    


इंसान का शरीर एक बेहद जादुई
किस्म की जीवित मशीन है। इसने अपने आप को कुछ इस तरह से
ढाला है कि शरीर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस या 98.6
डिग्री फारनहाइट होने पर यह अच्छी तरह काम कर सकता है। इस
तापमान पर शरीर की कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने वाले
एंजाइम उत्कृष्टता के साथ काम करते हैं।
...और इसलिए हो जाती है मौतः दुर्भाग्यवश शरीर द्वारा गर्मी
सह सकने का स्तर काफी कम है। इसका तापमान यदि इसके मूल
ताप से एक डिग्री सेल्सियस भी बढ़ जाता है तो इसे परेशानी
होने लगती है। इंसान हर मौसम में रह सकने वाला प्राणी है और इसके
लिए खून का गर्म होना एक जरूरी चीज है। हालांकि खून को गर्म
रखने के लिए बड़ी कीमत अदा करनी पड़ती है। मानव शरीर की यह
मशीन खुद को गर्म रखने के लिए बहुत सी ऊर्जा लेती है। वहीं,
इंसान बाहरी मदद के बिना अत्यधिक तापमान को बर्दाश्त नहीं
कर सकता और नतीजा यह होता है कि गर्मी के प्रकोप से बडी
संख्या में लोग मारे जाते हैं।
मानव शरीर का मूल तापमान दरअसल शरीर के अंदर का तापमान
होता है और इसे मुंह में थर्मामीटर लगाकर मापा जाता है। आमतौर
पर यह तापमान 37 डिग्री सेल्सियस रहता है। वहीं हाथ की त्वचा
का तापमान अपेक्षाकृत कम यानी लगभग 33 डिग्री सेल्सियस
रहता है। तो शरीर के अंदर से त्वचा तक एक तरह का उष्मा क्षरण
होता है और यह शरीर का ठंडा रहना सुनिश्चित करता है।
हमें ऐसे लगती है ठंड और गर्मीः जब आसपास का तापमान लगभग
45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है, तो एक विपरीत प्रक्रिया शुरू
हो जाती है और शरीर ऊष्मा को एकत्र करना शुरू कर देता है। फिर
भी प्रकृति ने मानव शरीर की त्वचा से होकर जाने वाली पसीने
वाली ग्रंथियों के जरिए एक ऐसी प्रभावी शीतक प्रणाली बनाई
है। जब शरीर गर्म होने लगता है तो शरीर से पसीना निकलने लगता
है। जब जल वाष्पित होता है तो शरीर ठंडा होने लगता है। यह
भौतिकी के उसी मूल सिद्धांत के अनुरूप है, जो कि मिट्टी के
घड़ों में पानी को ठंडा रखता है।
दिमाग में है गर्मी का कंट्रोलरः शरीर में आंतरिक गर्मी को
नियंत्रण करने वाली प्रणाली मुख्यत: मटर के आकार के
हाइपोथैल्मस द्वारा नियंत्रित की जाती है। हाइपोथैल्मस
मस्तिष्क में होता है। यह शरीर की ताप नियत प्रणाली है। यह
नसों से फीडबैक तो लेता ही है, साथ ही इसके अपने भी गर्मी
संसूचक होते हैं। ये शरीर में गर्मी का प्रबंधन करते हैं।
यदि शरीर को सर्दी लगती है तो हाइपोथैल्मस कंपकंपी शुरू करने
का संकेत भेजता है। मांसपेशियां इस प्रक्रिया में फड़कनी शुरू हो
जाती हैं, जिससे गर्मी पैदा होती है। यदि शरीर को गर्मी लगती
है तो त्वचा के पास रक्त नलिकाओं को फैलने का संकेत भेजा
जाता है, ताकि ज्यादा खून सतह तक पहुंच सके। इसके बाद पसीने
के जरिए गर्मी निकलेगी।
यह इंसानों के लिए एक तरह का प्राकृतिक वातानुकूलन है। गर्मी के
संपर्क में जरूरत से ज्यादा आ जाने के शुरुआती संकेतों में सिरदर्द
शामिल है। यदि इसपर गौर नहीं किया जाता तो एक तरह की
बेचैनी अंदर बैठ जाती है। इसके बाद चक्कर और उबकाई आने लगते हैं।
अगर इस पर भी ध्यान नहीं दिया जाता तो मरोड़ भी उठ सकते हैं।
इसके बाद भी यदि गर्मी के संपर्क में बने रहते हैं तो बेहोशी भी आ
सकती है।
ऐसे लगती है लूः यदि शरीर का मूल तापमान 40 डिग्री सेल्सियस
पहुंच जाने के बाद भी कोई व्यक्ति बिना रुके बेहद गर्म स्थितियों
में काम करता रहता है तो उसे लू लग जाती है और यह आमतौर पर
एक घातक स्थिति होती है। लू लग जाने के बाद शरीर से पसीना
आना बंद हो जाता है और तब सिर्फ आपात उपचार ही एकमात्र
हल रह जाता है। इस आपात उपचार में ड्रिप के जरिए द्रव उपलब्ध
करवाए जाते हैं।
ऐसे बचें लू सेः लू से बचने के लिए कुछ आसान उपाय करने चाहिए। जैसे
कि सुबह 11 बजे से दोपहर चार बजे तक गर्मी के संपर्क में आने से बचें।
दोपहर को आराम करना अच्छा रहेगा। भारत में छोटे शहर आज भी
दोपहर के समय बंद रहते हैं। हालांकि बडे शहरों के प्रतिस्पर्धी
माहौल के कारण प्रतिष्ठान दिनभर खुले रहते हैं। नई दिल्ली स्थित
डिफेंस इंस्टिट्यूट ऑफ फिजियॉलजी ऐंड अलाइड साइंसेज के हीट
फिजियॉलजी डिविजन में कार्यरत वैज्ञानिक डॉक्टर अभिषेक
भारद्वाज कहते हैं कि हर घंटे एक से दो गिलास पानी जैसे द्रव
पीकर लू लगने से बचने में मदद मिलती है।
यह संस्थान थार मरुस्थल में काम करने वाले भारतीय सैनिकों के
प्रशिक्षण एवं पर्यावरण के अनुकूल खुद को ढालने में मददगार चीजें
बनाता है। इसने एक छोटे से पैकेट में आने वाला 'डिपसिप' नामक एक
ऐसा 'पेय' बनाया है, जिसमें 14 पोषकतत्व होते हैं और जो बेहद गर्म
स्थितियों में काम करने वाले सैनिकों को तंदुरुस्त बनाए रखने में
मदद करता है।
भारद्वाज कहते हैं कि एक व्यक्ति को हर दिन औसतन चार से छह
लीटर पानी पीना चाहिए और जो लोग बाहर काम करते हैं, उन्हें
शरीर को गर्मी के प्रकोप से बचाने के लिए आठ से दस लीटर पानी
किसी 'इलेक्ट्रोलेट' के साथ पीना चाहिए।
हल्के रंग के ढीले-ढाले कपड़े भी गर्मी में अच्छे रहते हैं। गर्मी में
साड़ी पहनना अच्छा है, लेकिन तंग जीन्स बिल्कुल नहीं पहननी
चाहिए। राजस्थानी पुरुष लंबी पगड़ियां पहनते हैं, इसके पीछे
वैज्ञानिक वजह भी है। कई घुमावों वाली उनकी यह पगड़ी उनके
सिर को सूरज की सीधी गर्मी पड़ेन से बचाती है।
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के बी पी यादव ने कहा कि
आईएमडी ने पहली बार गर्मी के बारे में सावधान करने के लिए
'कोड रेड' चेतावनी जारी की है। इसका अर्थ यह है कि जब तक बहुत
जरूरी न हो, तब तक लोगों को बेहद गर्मी वाली अवधि में बाहर
निकलने से बचना चाहिए और छाया में रहना चाहिए।
उपमहाद्वीप में, मॉनसून एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है
क्योंकि यह पूरे देश में बारिश का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा इससे
ही आता है। यदि बारिश न हो तो भारत में जीवन नरक बन सकता
है। गर्मियों में भूभाग गर्म हो जाता है और वायु को पतला कर
देता है। तब हिंद महासागर से उठने वाली नमी युक्त भारी एवं ठंडी
हवा ऊपर उठ रही गर्म हवा की जगह ले लेती है।
इससे हवा का एक ऐसा प्रारूप बनता है, जिसे हम दक्षिणी-
पश्चिमी मॉनसून कहते हैं। आईएमडी के महानिदेशक लक्ष्मण सिंह
राठौड़ ने बताया कि भारत में जीवन को चलाने के लिए गर्मियां
या प्रचंड रूप से चमकता सूर्य जरूरी है। यहां तक कि आईएमडी के
चिह्न में भी संस्कृत में लिखा है, 'आदित्यात जयते वृष्टि।' इसका
अर्थ है कि बारिश सूर्य से आती है। वर्षा रितु में अच्छी बारिश
होना प्रचुर कृषि और प्रचुर भोजन के लिए महत्वपूर्ण है।